अशोक मिश्र
अरावली पर्वतमाला की जो वर्तमान स्थिति है, वह वास्तव में चिंताजनक है। सुप्रीम कोर्ट का अरावली में होने वाले वैध या अवैध खनन को लेकर चिंता जाहिर करना, साबित करता है कि यदि अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र से खिलवाड़ किया गया तो इसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं।शुक्रवार को अरावली मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं को फिर से परिभाषित नहीं कर देती, तब तक अरावली के एक इंच हिस्से को भी खनन के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अरावली पहाड़ियों के लिए विवादास्पद सौ मीटर की ऊंचाई की परिभाषा को स्वीकार करने वाले अपने फैसले पर रोक लगाने के पांच महीने बाद सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई हो रही थी।
न्यायालय ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में इसके दायरे में आने वाले क्षेत्रों में विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट कहना है कि पर्यावरण से जुड़े इस संवेदनशील मामले पर वह पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही कोई अंतिम फैसला लेगा।
गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लिए अरावली पर्वत शृंखलाओं का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि यह केवल धरती पर उगी पत्थरों की केवल एक श्रृंखला भर नहीं है। यह उत्तर भारत में रहने वाले लोगों के लिए प्राकृतिक प्राणदायिनी भी है। अरावली एक बड़े भूभाग में रहने वाले लोगों को आक्सीजन प्रदान करने का सबसे बड़ा माध्यम भी है। अरावली पर्वत माला थार के रेगिस्तान को हरियाणा और दिल्ली तक पहुंचने से हजारों वर्षों से रोक रही है।
अरावली पर्वत मामला दिल्ली और हरियाणा की उर्वरा भूमि को सदियों से रेगिस्तान बनने के खिलाफ एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी है। इस पर्वत शृंखला पर उगे लाखों पेड़ थार के रेगिस्तान से उठने वाले रेत के कणों को आगे बढ़ने से रोक देते हैं। अरावली में पिछले कई दशकों से हो रहे खनन और विस्फोटों के चलते न जाने कितने कई पहाड़ पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अवैध खनन या अवैध पेड़ों की कटाई वाले क्षेत्रों में भूजल स्तर काफी हद तक गिर गया है।
इन इलाकों में जमीन में जल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है। इससे इन इलाकों में रहने वाली आबादी को पानी की समस्या झेलनी पड़ रही है। खनन और पेड़ों की कटाई के चलते वन्यजीवों का स्वाभाविक आवास छिन रहा है। यही वजह है कि वनों में रहने वाले जानवर अब मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। वन्यजीवों और मानव में संघर्ष बढ़ रहा है।

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