बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्यों में स्वामी विवेकानंद के साथ-साथ डॉ. दुर्गा चरण नाग गिने जाते हैं। स्वामी विवेकानंद तो संन्यासी थे, लेकिन डॉ. दुर्गा चरण नाग गृहस्थ थे। डॉ. नाग अपने समय के प्रसिद्ध चिकित्सक थे, लेकिन वह रहते बड़े सादगी से थे। उनकी वेशभूषा से लोग यह अंदाजा नहीं लगा पाते थे कि वह इतने बड़े चिकित्सक हैं।स्वामी विवेकानंद और डॉ. नाग एक दूसरे के मित्र भी थे। दोनों का मानना था कि धर्म को सिद्धांतों से निकालकर व्यावहारिक जीवन में अपनाया जाना चाहिए। एक बार की बात है। कोलकाता में डॉ. नाग साधारण कपड़ों में अपनी क्लीनिक की ओर पैदल जा रहे थे। ज्यादातर वह पैदल ही चलना पसंद करते थे। उनके क्लीनिक के रास्ते में एक व्यक्ति ने छत डालने के लिए एक मजदूर को बुला रखा था, लेकिन काफी देर के बाद भी वह नहीं आया था।
उसे अपने घर की छत डालनी थी। उसने जब डॉ. नाग को उधर से गुजरते देखा, तो वह उनके पास गया और बोला, मुझे अपने घर की छत डालनी है। मैंने एक मजदूर को सहायता के लिए बुला रखा था, लेकिन अभी तक वह आया नहीं है। अगर जल्दी छत डालने का काम शुरू नहीं किया गया, तो काम पूरा होते-होते रात हो जाएगी। क्या आप हमारी मदद करेंगे। मैं आपको मजदूरी भी दूंगा। डॉ. नाग मान गए। दोपहर में संयोग से उस रास्ते से एक बड़ा व्यापारी गुजरा।
उसने डॉ. नाग को एक मजदूर की तरह काम करते देखा, तो कहा कि अरे डॉक्टर साहब, आप यहां क्यों काम कर रहे हैं। डॉ. नाग ने कहा कि मेरा मित्र विवेकानंद कहता है कि धर्म को व्यावहारिक जीवन में अपनाना चाहिए। आज मौका मिला है, तो उसे क्यों गंवा दूं।
व्यापारी की बात सुनकर मकान का मालिक बड़ा शर्मिंदा हुआ। उसने डॉ. नाग से माफी मांगी। डॉ. नाग ने कहा कि आपको माफी मांगने की जरूरत नहीं है। फिर पूरे दिन डॉ. नाग ने काम किया और मजदूरी भी नहीं ली।

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