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Tuesday, May 26, 2026

सौंदर्य तो एक दिन मिट जाएगा, गुण रहेंगे

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जब संपूर्ण प्रकृति चिरस्थायी नहीं है तो फिर किसी व्यक्ति, वस्तु या प्रकृति की सुंदरता स्थायी कैसे हो सकती है। यह प्रकृति हमेशा से परिवर्तन शील रही है, भविष्य में भी रहेगी। ऐसी स्थिति में किसी को अपने रूप और सौंदर्य का अभिमान नहीं करना चाहिए। 

एक बार की बात है। चंद्रगुप्त और चाणक्य कहीं जा रहे थे। कहा जाता है कि चंद्रगुप्त बहुत ही सुदर्शन थे। उनके रूप की प्रशंसा करते हुए कविगण नहीं अघाते थे। अपने रूप पर चंद्रगुप्त को भी थोड़ा बहुत अभिमान था। वहीं चाणक्य असुंदर थे। रंग भी श्यामवर्ण था। ऊपर से संघर्ष ने उनकी काया को थोड़ा बहुत क्षीण भी कर दिया था। जब किसी काम के लिए दोनों एक साथ निकलते थे, तो लोग चंद्रगुप्त को ही देखते रह जाते थे। 

एक दिन की बात है। किसी समस्या पर विचार विमर्श करते हुए चाणक्य और चंद्रगुप्त वाटिका में टहल रहे थे। उसी समय चंद्रगुप्त ने कहा, गुरुदेव! आप में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। आप जैसा विद्वान शायद ही कोई हो, लेकिन यदि भगवान ने आपको रूप दिया होता तो कितना अच्छा होता। चाणक्य समझ गए कि चंद्रगुप्त को अपने रूप का अभिमान हो गया है। 

चंद्रगुप्त को राजा भी चाणक्य ने बनाया था। मुंह से बात निकलने के बाद चंद्रगुप्त भी समझ गए कि उन्होंने गलत बात कह दी है। चाणक्य ने सेवक को बुलाकर मिट्टी और सोने के पात्र में पानी लाने को कहा। थोड़ी देर बाद जब चंद्रगुप्त को प्यास लगी, तो चाणक्य ने मिट्टी के पात्र का जल पीने को दिया। 

पानी पीकर चंद्रगुप्त ने कहा कि इस पात्र का जल मीठा और ठंडा है। उसके बाद स्वर्ण पात्र का जल उन्हें पीने को दिया गया। चंद्रगुप्त ने कहा कि इस पात्र का जल कोई विशेष नहीं है। तब चाणक्य ने कहा कि पात्र की खूबसूरती से जल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। गुणों का प्रभाव ही मायने रखता है। यह सुनकर चंद्रगुप्त ने लज्जा से अपना सिर झुका लिया।