अशोक मिश्र
हरियाणा, खासकर फरीदाबाद, पलवल, रेवाड़ी और गुरुग्राम बेल्ट में पटाखा उद्योग केवल दिवाली का कारोबार नहीं है। यह हजारों परिवारों की रोजी रोटी है। छोटे कारखाने, पैकेजिंग यूनिट, ट्रांसपोर्ट और खुदरा दुकानदार, सब इसी त्यौहारी सीजन पर टिके हैं। जब दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर पूर्ण बैन की तलवार लटकती है, तो सबसे पहला असर इन जिलों के गोदामों पर पड़ता है, माल जब्त होता है। लाइसेंस रद्द होने का डर रहता है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से कि बैन नहीं, बल्कि रेगुलेशन होना चाहिए, पटाखा उद्योग को कानूनी स्थिरता मिलेगी।
समयबद्ध बिक्री और ग्रीन पटाखों को बढ़ावा मिलने से उद्योग बंद नहीं होगा बल्कि रूप बदलेगा। इससे हरियाणा में ग्रीन पटाखा निर्माण की नई इकाइयां लग सकती हैं, जो कम धुएं वाले और वैज्ञानिक फॉर्मूले से बने होंगे। इससे रोजगार भी बचेगा और प्रदूषण का तर्क भी कमजोर होगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में ही टिप्पणी की है कि पटाखों पर चौबीस घंटे का पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। इसके लिए समय तय करना सरकार का काम है। सुप्रीमकोर्ट ने ऐसा कहकर एक बड़े संवैधानिक संतुलन को साफ किया है।
अदालत ने माना है कि पर्यावरण संरक्षण जरूरी है लेकिन आजीविका और व्यापार के अधिकार को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता है। प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से पांच कारक जिम्मेदार हैं। सबसे पहले नंबर पर वाहनों का धुआं, खासकर डीजल वाहन और पुराने वाहन आता है। उद्योगों और ईंट भट्टों से निकलने वाला धुआं भी प्रदूषण के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। सड़क और निर्माण की धूल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित होती है। कूड़ा जलाना और घरेलू ईंधन भी प्रदूषण को फैलाने में अपनी अहम भूमिका निभाता है। पराली जलाना भी प्रदूषण के लिए कम खतरनाक नहीं है। इनमें से कोई भी कारक अकेले दिवाली जैसा नहीं दिखता इसलिए उस पर उतना शोर नहीं मचता, लेकिन ये बारह महीने जहर घोलते हैं।
पराली जलाने के लिए केवल किसान को दोषी ठहराकर हम समस्या से बच नहीं सकते। किसान पराली इसलिए जलाता है क्योंकि उसके पास अगली फसल बोने के लिए 15-20 दिन का ही समय होता है और पराली हटाने की मशीन महंगी है। यदि इस समस्या से निजात मिल जाए तो उसे पराली जलाने का कोई शौक नहीं है। हरियाणा सरकार इस दिशा में पिछले कुछ वर्षों से कई उपाय कर रही है, जिसे मानना होगा।
पराली न जलाने पर प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि, कस्टम हायरिंग सेंटर के जरिए हैप्पी सीडर और सुपर सीडर मशीनों पर 80 प्रतिशत तक सब्सिडी, पराली से बायो-सीएनजी और बिजली बनाने के प्लांट लगाना, और पराली खरीद की व्यवस्था शुरू करना। इसके अलावा वाहनों के लिए इलेक्ट्रिक वाहन नीति, पुराने डीजल वाहनों पर सख्ती, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के लिए एंटी स्मॉग गन अनिवार्य करना और ग्रैप के नियमों को लागू करना भी शामिल है। फरीदाबाद और गुरुग्राम में प्रदूषण हॉटस्पॉट की पहचान कर वहां विशेष निगरानी भी की जा रही है।
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