Friday, October 2, 2026

ज्ञानी का अपराध क्षम्य नहीं है, वत्स!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने लोगों को धर्म दीक्षा दी। उन्होंने लोगों को मुक्ति के मार्ग बताए। वह अपने शिष्यों को भी समय-समय पर परखते रहते थे। उनके दैनिक जीवन पर निगाह रखते थे। अगर उनसे कोई गलती होती थी तो वह बड़े प्रेम से उदाहरण देकर समझाते थे कि उनसे कहां गलती हुई और क्यों हुई? शिष्य भी बुद्ध की बात को इस तरह आसानी से समझ जाते थे। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध  अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। बीच बीच में वह अपने किसी शिष्य से कुछ पूछ लेते, तो किसी की बात का उत्तर दे देते थे। चलते-चलते वह एक बाग के किनारे पहुंचे। उस बाग के किनारे एक तालाब था। तालाब में खूब ढेर सारे कमल के फूल खिले हुए थे। तालाब में खिले कमल के फूलों को वह बड़े प्रेम से निहारने लगे। उन्हें बाग और तालाब में खिले फूलों को देखने में अत्यंत आनंद आ रहा था। 

तभी उनके एक शिष्य ने दौड़कर तालाब से एक फूल तोड़ लिया और लाकर बुद्ध को भेंट कर दिया। बुद्ध ने फूल तो स्वीकार कर लिया, लेकिन समझाते हुए बोले, किसी की मेहनत से उपजाए गए फूल को तोड़ना बहुत गलत है। जिसने इन फूलों को उगाया है, तोड़ने से पहले उसकी अनुमति लेनी चाहिए। इस बीच एक व्यक्ति आया और वह तालाब में खिले फूलों को तोड़-तोड़ कर फेंकने लगा। 

शिष्य ने कहा कि भगवन! आप उस व्यक्ति को कुछ नहीं कह रहे हैं जिसने तालाब का स्वरूप ही बदल दिया है। बुद्ध ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति वासना, तृष्णा में डूबकर कोई काम करता है, तो वह उसका अज्ञान है। लेकिन जब वही काम ज्ञानी व्यक्ति करता है, तो वह पाप है। जिसने तालाब का स्वरूप बिगाड़ा, वह अज्ञानी है। उसका अपराध क्षमा हो सकता है, लेकिन तुम्हारा नहीं। शिष्य महात्मा बुद्ध की बात समझ गया।


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