Tuesday, October 20, 2026

विजयादशमी की सीख: विजय बाहरी नहीं, आंतरिक होती है

अशोक मिश्र

विजयादशमी भारतीय संस्कृति और परंपरा का वह पर्व है जो केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के गहन मूल्यों का प्रतीक है। विजयादशमी  भारतीय चेतना का वह शाश्वत स्वर है जो हर युग में हमें याद दिलाता है कि अंधकार चाहे कितना भी घना क्यों न हो, प्रकाश की एक लौ उसे चीर ही देती है। आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को जब हम रावण के विशाल पुतले को अग्नि को समर्पित होते देखते हैं, तो वह दृश्य केवल एक पौराणिक कथा का मंचन नहीं होता। वह हमारे भीतर के द्वंद्व का प्रतीक है। 

यह दिन बुराई पर अच्छाई की विजय, अधर्म पर धर्म की जीत और अज्ञान पर ज्ञान की स्थापना का स्मरण दिलाता है।  विजयादशमी हमें सिखाती है कि विजय बाहरी नहीं, आंतरिक होती है। जब हम सत्य के पथ पर चलते हैं, दूसरों के प्रति करुणा रखते हैं और अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं, तभी सच्ची विजयादशमी मनाई जा सकती है।  राम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं, वह मर्यादा के प्रतीक हैं। रावण केवल लंका का राजा नहीं, वह अहंकार है। यह युद्ध केवल त्रेता में नहीं लड़ा गया, यह हर दिन, हर मनुष्य के भीतर लड़ा जाता है। 

लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या के दस मुखों वाला रावण आज भी हमारे भीतर जीवित है। उसे जलाने के लिए बाहर के किसी अग्निबाण की नहीं, भीतर के विवेक की आवश्यकता है। विजयादशमी का दूसरा नाम शक्ति की उपासना का समापन भी है। नौ दिनों तक हमने आदिशक्ति की आराधना की। दसवें दिन उसी शक्ति के विजयिनी रूप का उत्सव मनाया। यह संयोग नहीं कि शस्त्र-पूजन और विद्या-पूजन इसी दिन होता है। 

हमारे ऋषियों ने बहुत पहले समझ लिया था कि शक्ति यदि विवेकहीन हो तो वह विनाश है, और विवेक यदि शक्तिहीन हो तो वह पलायन है। विजयादशमी शक्ति और विवेक के समन्वय का पर्व है। रामायण में भगवान राम द्वारा रावण के वध की कथा हो या देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर का संहार, दोनों ही कथाएँ हमें यही संदेश देती हैं कि सत्य और न्याय अंतत: विजयी होते हैं, भले ही मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो। आज के समय में विजयादशमी का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। 

जब सोशल मीडिया पर असत्य का शोर सत्य से अधिक तेज हो, जब सुविधा की दौड़ में संबंध पीछे छूट रहे हों, जब सफलता को ही एकमात्र मूल्य मान लिया गया हो, तब राम का जीवन हमें धीरज सिखाता है। यह पर्व सिखाता है कि विजय धैर्य माँगती है, अनुशासन माँगती है, और सबसे बढ़कर चरित्र माँगती है। शक्ति का सही उपयोग सेवा और रक्षा के लिए होना चाहिए, न कि दमन के लिए। दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के साथ शक्ति का स्मरण बना रहता है कि नारी शक्ति समाज की आधारशिला है। विजयादशमी पर हम केवल पुतला न जलाएं, एक संकल्प लें। अपने भीतर के किसी एक रावण को पहचानें और उसे छोड़ने का साहस करें। किसी एक अच्छाई को अपना शस्त्र बनाएं।

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