Saturday, October 17, 2026

भारत-अमेरिका ट्रेड डील आर्थिक संबंधों में नए अध्याय की शुरुआत

अशोक मिश्र

अमेरिका और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते का पहला चरण अंतिम रूप ले चुका है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इसकी पुष्टि की है। कानूनी मसौदा तैयार होने और कुछ अंतिम बारीकियों के बाद यह लागू होने वाला है। यह खबर मात्र समझौते की घोषणा नहीं, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत है। लंबे समय से चली आ रही बातचीत के बाद यह प्रगति स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके निहितार्थों को गहराई से समझना जरूरी है। 

भारत के लिए इस डील का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच का है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है और यदि यहां स्थायी बाजार पहुंच मिलती है तो लाखों रोजगार वाले क्षेत्रों में मांग बढ़ेगी, निवेश आएगा और भारत की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में हिस्सेदारी मजबूत होगी। पहले उच्च टैरिफ के कारण भारतीय निर्यातकों, खासकर कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण, फुटवियर और श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भारी नुकसान हो रहा था। 

टैरिफ घटकर करीब अठारह प्रतिशत रहने और कई उत्पादों पर शून्य शुल्क की संभावना से निर्यात बढ़ेगा। इससे लाखों नौकरियां पैदा हो सकती हैं, खासकर महिलाओं और युवाओं के लिए। छोटे और मझोले उद्यमों को नई बाजार पहुंच मिलेगी। ऊर्जा, विमान और तकनीक उत्पादों की अमेरिकी खरीद से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी। वैश्विक माहौल में चीन से दूर जा रहे निवेश को आकर्षित करने में भी यह मददगार साबित हो सकता है। भारत की आतुरता के पीछे केवल निर्यात नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक दबाव भी है। 

थोक महंगाई, ऊर्जा आयात पर निर्भरता और वैश्विक बाजार में चीन प्लस वन की नीति ने भारत को पश्चिमी बाजारों से गहरे जुड़ाव के लिए प्रेरित किया है। इस डील का दूसरा पहलू उतना ही संवेदनशील है। अमेरिका लंबे समय से भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्र में बाजार पहुंच, बौद्धिक संपदा अधिकारों में कड़े प्रावधान और डिजिटल व्यापार में डेटा के मुक्त प्रवाह की मांग करता रहा है। भारत के करोड़ों छोटे किसान और अमूल जैसी सहकारी व्यवस्था अमेरिकी सब्सिडी वाले कृषि उत्पादों के सामने टिक नहीं पाएगी। इसी तरह सस्ती दवाओं के उत्पादन पर पेटेंट की सख्ती का असर पड़ सकता है। 

सबसे बड़ा नया जोखिम रूस से तेल और गैस खरीद पर अमेरिकी सीनेट में 86 वोटों से पास हुए कानून को लेकर है, जिसमें राष्ट्रपति को प्रतिबंध लगाने का अधिकार मिलता है। भारत को यह डील इसलिए करनी चाहिए क्योंकि अलग-थलग रहना संभव नहीं। विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ संतुलित व्यापार संबंध विकास की गति बनाए रखने में सहायक होंगे। यह सिर्फ टैरिफ कम करने का मामला नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साझेदारी का आधार है। सही शर्तों पर लागू होने पर यह रोजगार, निर्यात और निवेश तीनों को प्रोत्साहन देगा। 

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