Monday, October 19, 2026

धार्मिक आयोजनों में मची भगदड़ के लिए अव्यवस्था जिम्मेदार

अशोक मिश्र

कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में हुई भगदड़ ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया है। उन्नीस निर्दोष जिंदगियां असमय काल कवलित हो गईं। इनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे। यह लोग मां दुर्गा से अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर आए थे, लेकिन व्यवस्थागत भारी चूक ने इन्हें मौत की नींद सुला दिया। भारी बारिश, भीड़ का अचानक दबाव, संकरी निकासी और कुप्रबंधन ने उत्सव को त्रासदी में बदल दिया। हर साल कोई न कोई हादसा होता है, कभी कुंभ में, कभी मंदिर की सीढ़ियों पर, कभी जागरण में, कभी दुर्गा पूजा पंडाल में जमा भीड़ हादसे का शिकार होती है। ऐसी घटनाओं की एक लंबी सूची है।  

भारत में धार्मिक आयोजनों का पैमाना बहुत बड़ा होता है। लाखों श्रद्धालु आस्था के आवेश में एकत्र होते हैं। पंडाल, मेले या तीर्थ स्थलों पर अस्थायी व्यवस्थाएं होती हैं, जहां प्रवेश-निकास के रास्ते अक्सर संकरे और अपर्याप्त होते हैं। ऐसे अवसरों पर भक्तों में अनुशासन की कमी और सुरक्षा नियमों की अनदेखी आम बात है।  प्रशासन भी धर्म के मामले में सख्ती बरतने से बचता है, क्योंकि कहीं आस्था पर चोट का आरोप न लग जाए। परिणामस्वरूप लाखों लोग एक संकरी गली में, एक छोटे पंडाल में, एक ही समय में प्रवेश करने लगते हैं और एक छोटी सी अफवाह, एक फिसलन, एक बिजली जाने की घटना पूरे जनसमूह को भगदड़ में बदल देती है। 

इस बात में कोई दम नहीं है कि ऐसे हादसे केवल धार्मिक आयोजनों में ही होते हैं।  भगदड़ या भीड़ संबंधी हादसे सिर्फ धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं हैं। फुटबॉल मैचों, संगीत समारोहों, राजनीतिक रैलियों, शॉपिंग मॉल या यहां तक कि स्कूल कॉलेज के कार्यक्रमों में भी ऐसी घटनाएं दुनिया भर में होती रहती हैं। आंकड़े बताते हैं कि स्टेडियम और रेलवे स्टेशनों पर भी ऐसी ही त्रासदियां हुई हैं। समस्या आस्था की नहीं, अव्यवस्था की है। अगर किसी राजनीतिक रैली या फिल्मी स्टार के शो में इतनी ही भीड़ हो और व्यवस्थाएं कमजोर हों, तो वहां भी ऐसा हादसा हो सकता है और कई बार ऐसे हादसे हुए भी हैं। 

मूल कारण व्यवस्थागत लापरवाही है। अपर्याप्त पुलिस बल, संकरी राहें, गलत घोषणाएं और आपात स्थिति के लिए तैयारी की कमी है। जब व्यवस्था ही श्रद्धालुओं या समर्थकों की संख्या के हिसाब से नहीं बनाई गई, तो दोष श्रद्धा या  समारोह पर डाल देना प्रशासन की जवाबदेही से बचना है।  वास्तव में हमें आस्था या आयोजन के प्रकार पर दोष मढ़ने के बजाय व्यवस्था सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। भक्ति तभी पूर्ण होती है जब भक्त सुरक्षित घर लौटे। अगर पंडाल की सुंदरता के साथ-साथ उसकी सुरक्षा भी उतनी ही चर्चित होने लगे, तभी हम कह पाएंगे कि हमने उन उन्नीस लोगों की मौत से कुछ सीखा है। कोलकाता की शनिवार रात हुई घटना ने फिर याद दिलाया है कि उत्सव की खुशी तभी सार्थक है जब हर जीवन सुरक्षित रहे। आस्था को सम्मान देते हुए सुरक्षा को सर्वोपरि रखना ही सही रास्ता है।


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