अशोक मिश्रदेश में इस समय चुनाव आयोग को लेकर बना माहौल चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। दिल्ली के जंतर मंतर पर राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष का प्रदर्शन और मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नारेबाजी, ये दोनों घटनाएं एक बड़े टकराव का हिस्सा हैं जिसका केंद्र है एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण। एसआईआर कोई नई व्यवस्था नहीं है। यह मतदाता सूची को साफ करने की एक विशेष प्रक्रिया है जिसे तब अपनाया जाता है, जब मृत मतदाताओं के नाम, एक ही व्यक्ति के कई जगह नाम, पते बदलने और फर्जी नाम जुड़ने की शिकायतें बड़े पैमाने पर मिलती हैं।
सामान्य पुनरीक्षण हर साल होता है, लेकिन एसआईआर गहन जांच के लिए कराया जाता है। बिहार में 24 जून 2025 को इसके लिए आदेश जारी हुआ। बाद में दूसरे राज्यों में भी इसे लागू किया गया। विवाद की शुरुआत इसके बड़े पैमाने और गति को लेकर हुई। विपक्ष का कहना है कि बहुत कम समय में लाखों नामों का सत्यापन किया गया जिससे कई वास्तविक मतदाता भी सूची से बाहर हो गए। कुछ खबरों में यह भी आया कि आयोग के अंदर ही इस प्रक्रिया के तकनीकी बदलावों पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने असहमति दर्ज कराई थी। आयोग ने स्पष्ट किया कि संस्थागत फैसलों में अलग अलग राय आना सामान्य है।
अंतिम आदेश सर्वसम्मति से जारी किया गया था। एसआईआर के साथ फॉर्म 6 का विवाद जुड़ गया जिसने आग में घी का काम किया। इस मामले में सबसे बड़ा पेच तब आया जब आयोग ने कहा कि इस अतिरिक्त घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी है जबकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अदालत में स्पष्ट किया कि अदालत ने किसी संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी थी, उसने केवल स्वघोषणा के सिद्धांत को सही माना था। इसी पृष्ठभूमि में वोट चोरी का आरोप लगाया जा रहा है। विपक्ष खासकर कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा और एनडीए गठबंधन को फायदा पहुंचाने के लिए लक्षित तरीके से विरोधी मतदाताओं के नाम काटे गए और फर्जी मतदाता जोड़े गए।
इस आरोप के पीछे तीन आधार बताए जा रहे हैं। पहला कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता संख्या में असामान्य वृद्धि या कमी के आंकड़े। दूसरा बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा बिना फील्ड वेरिफिकेशन के नाम हटाने की शिकायतें। तीसरा फॉर्म छह की अतिरिक्त शर्त को जानबूझकर कठिन बनाना। इस गतिरोध का समाधान टकराव से नहीं पारदर्शिता से निकलेगा। सबसे पहले एसआईआर के तहत हटाए गए और जोड़े गए नामों की बूथवार सूची सार्वजनिक कर सभी दलों को डिजिटल रूप में दी जानी चाहिए ताकि कोई भी दल घर बैठे जांच कर सके।
चुनाव आयोग के प्रति अविश्वास लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। उसकी गलती हो सकती है, उसकी आलोचना जरूरी है लेकिन उसे राजनीतिक विरोधी मानकर घेरने से अराजकता ही बढ़ेगी। भरोसा तभी लौटेगा जब प्रक्रिया अधिक खुली, जांच योग्य और सबकी भागीदारी वाली बनेगी।


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