अशोक मिश्र
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पटना में दिए गए बयान ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के स्वर को गर्मा दिया है। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के कार्यक्रम में जब खड़गे भाषण दे रहे थे और कथित वोट चोरी तथा एसआईआर प्रक्रिया में गड़बड़ी करने वालों को जेल भेजने की बात कर रहे थे, तभी सभा में मौजूद एक व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा कि मोदी कहीं नहीं जाएंगे। इस पर नाराज खड़गे ने जो टिप्पणी की, वह टिप्पणी तुरंत विवाद का विषय बन गई। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता का अपमान बताया और देशभर में प्रदर्शन का ऐलान कर दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि खड़गे ने सारी मर्यादाएं तार-तार कर दी हैं। कांग्रेस के पास अब नीति नहीं, सिर्फ गाली-गलौज की राजनीति बची है।अन्य भाजपा नेताओं ने भी इसे अश्लील, अभद्र और लोकतांत्रिक मर्यादा के विरुद्ध करार दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस ने खड़गे का बचाव करते हुए कहा कि बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। खड़गे का इशारा प्रधानमंत्री के वैचारिक पिता यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर था। साथ ही पार्टी का दावा है कि पटना में पहले बीजेपी कार्यकर्ता ने खड़गे के दिवंगत पिता का अपमान किया था। इसके जवाब में यह प्रतिक्रिया आई थी। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी इसे एक आम बोलचाल का मुहावरा बताया है, किसी के पिता का व्यक्तिगत अपमान नहीं। जब बहस नीतियों, जैसे एसआईआर में गड़बड़ी, भ्रष्टाचार या चुनाव सुधार जैसे मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत और पारिवारिक टिप्पणियों पर आ जाती है, तो जनता का ध्यान असली सवालों से भटक जाता है। लगातार ऐसी भाषा से सार्वजनिक संवाद का स्तर गिरता है।
राजनीति में शालीनता का मानक कमजोर होता है जिसे युवा पीढ़ी सामान्य मानने लगती है। समर्थक वर्ग में भावनात्मक ध्रुवीकरण बढ़ता है। सोशल मीडिया पर गाली-गलौज और पुतला दहन जैसे प्रतीकात्मक विरोध रोजमर्रा की राजनीति बन जाते हैं, जिससे सामाजिक विश्वास कम होता है। युवा और बच्चे, इन घटनाओं को देखकर यह संदेश ग्रहण करते हैं कि सत्ता के लिए कोई भी सीमा पार की जा सकती है। इससे समाज में असहिष्णुता बढ़ती है, विरोधी विचार रखने वाले लोगों के प्रति घृणा और नफरत की भावना मजबूत होती है।
सार्वजनिक चर्चा मुद्दों—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई—से हटकर व्यक्तिगत हमलों और भावनात्मक आरोपों पर केंद्रित हो जाती है। नतीजतन लोकतंत्र कमजोर पड़ता है क्योंकि मतदाता मूल बहस के बजाय शोर और सनसनी से प्रभावित होते हैं। ऐसे विवाद से राजनीतिक दलों को तात्कालिक सुर्खियां तो मिल जाती हैं, लेकिन लोकतंत्र की दीर्घकालिक सेहत के लिए जरूरी विचार-विमर्श और समाधान खोजने की संस्कृति कमजोर पड़ती है। राजनीति का स्तर गिरता है और लोकतंत्र प्रभावित होता है।


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