बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
बौद्ध धर्म की सबसे बड़ी खूब समालोचकों ने यह बताई है कि वह आत्म शुद्धि को प्रधान मानता है। जब आदमी की आत्म शुद्धि हो जाती है, तो वह कई प्रकार के विकारों से मुक्त हो जाता है। वह ईर्ष्या, द्वेष, राग-अनुराग, हिंसा और काम वासना जैसे विकारों से मुक्त हो जाता है। वह दूसरे इंसानों की कद्र करना सीख जाता है। शायद यही वजह है कि देश-विदेश में बौद्ध धर्म काफी फला फूला।इसे राजाओं के साथ-साथ प्रजा ने भी अपनाया क्योंकि बौद्ध धर्म समानता की बात करता है। सारिपुत्र की एक कथा है। एक बार वह कहीं जा रहे थे। बौद्ध भिक्षु सामान्य अवस्था में पैदल ही यात्रा करते थे। रास्ते में सारिपुत्र ने देखा कि मछुआरे का बच्चा रास्ते में पड़े हुए चावल के दानों को बीन बीन कर खा रहा है। यह दृश्य देखकर सारिपुत्र को बहुत पीड़ा हुई। वैसे भी सारिपुत्र काफी दयालु और निष्कपट थे। वह गलती न होने पर भी लोगों से क्षमा मांग लिया करते थे। यही वजह है कि बौद्ध समाज ने उन्हें धम्म सेनापति की उपाधि दे रखी थी।
उन्होंने उस बच्चे से पूछा, वत्स! रास्ते में पड़े हुए गंदे चावल को बीन-बीनकर क्यों खा रहे हो। उस बच्चे ने जवाब दिया कि मान्यवर! मेरे पिता मेरा पालन पोषण नहीं कर सकते हैं। वह अत्यंत निर्धन हैं। इस वजह से मुझे रास्ते में पड़े चावल को बीनकर खाना पड़ रहा है।
सारिपुत्र ने कहा कि क्या तुम मेरे साथ चलोगे। वहां तुम्हें खाना मिलेगा और उपदेश भी सुनने को मिलेगा। वह लड़का बोला, इससे तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा। सारिपुत्र उस बच्चे को लेकर संघ में आए और उसको नहलाने धोने के बाद खाना दिया। वह बच्चा वहीं रहने लगा। आगे चलकर उसने अपनी प्रतिभा और तपस्या से अरिहंत की पदवी पर पहुंच गया।


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