यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक एकता का सबसे बड़ा साधन रहा है। पटौदी की रामलीला को दक्षिणी हरियाणा की सबसे पुरानी रामलीलाओं में गिना जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि नवाब मुजफ्फर अली खान ने मन्नत पूरी होने पर रामलीला का मंचन शुरू करवाया था। वहां आज भी दिन में रामलीला होती है। जींद के एक गांव में 250 साल से अधिक समय से दिन में रामलीला होने की परंपरा है। इसका कारण यह है कि पहले यात्रा सुविधाएं सीमित थीं।
दर्शक सूर्यास्त से पहले घर लौटना चाहते थे। उनकी सुरक्षा और सुविधा को देखते हुए दिन का समय तय किया गया था। हिसार की कटला रामलीला 127 वर्ष पुरानी है, तो हिसार के ही लोहारी राघो में 1948-49 से लगातार मंचन हो रहा है। इसके संस्थापक कलाकार विभाजन से पहले 1933 से 1947 तक पाकिस्तान में रामलीला करते थे। अंबाला के नारायणगढ़ में अंग्रेजों के जमाने की रामलीला मशाल की रोशनी में होती थी। दर्शक मीलों पैदल, बैलगाड़ियों और ट्रैक्टर-ट्रालियों से आते थे और पूरी रामलीला को ही वर्ष भर का एकमात्र मनोरंजन मानते थे।
संवाद कविता शैली में, ब्रज-अवधी मिश्रित शुद्ध हिंदी में होते थे और अभिनय में भक्ति भाव प्रधान होता था। पहले वाली रामलीलाएं तकनीकी रूप से साधारण होते हुए भी अधिक मनोरंजक और प्रभावी मानी जाती थीं। तब मनोरंजन का कोई विकल्प नहीं था। पूरा गांव एक साथ बैठता था। धार्मिक उत्सुकता और सामाजिक जुड़ाव गहरा था। आज तकनीक ने रामलीला को दृश्य रूप से अधिक आकर्षक, भव्य और सिनेमाई बना दिया है।
दर्शक को तात्कालिक रोमांच तो अधिक मिलता है, पर भाव के केंद्र में पात्र की जगह प्रभाव और प्रकाश ने ले ली है। शहरों में टीवी, ओटीटी, सोशल मीडिया और दशहरे पर बड़े मेलों के कारण पारंपरिक रामलीला देखने वालों की संख्या घटी है, कमेटियों को चंदा जुटाने और कलाकार ढूंढने में कठिनाई हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में और डिजिटल प्रचार से जुड़ी हाईटेक लीलाओं में भीड़ अभी भी अच्छी है, लाइव प्रसारण के कारण दर्शक बढ़े भी हैं। फिर भी कुल मिलाकर रामलीलाओं की संख्या कम होती जा रही है।
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