बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
बौद्ध धर्म में श्रमणों की कोई कमी नहीं थी। देश के प्रमुख नगरों में भिक्षुक संघ बने हुए थे। हजारों शिष्य इन विहारों में रहकर धर्म दीक्षा लेते थे। आत्म शुद्धि का प्रयास करते थे और समाज में सम्मान पाते थे। लेकिन उनमें से कुछ ऐसे भी थे जो अभी परिपक्व नहीं हुए थे। वह मानवीय अवगुणों से भी मुक्त नहीं हो पाए थे। ऐसे लोग कई बार ऐसी गलतियां कर बैठते थे जो क्षम्य नहीं थीं। लेकिन महात्मा बुद्ध उन्हें सुधारने के लिए अनेक अवसर उपलब्ध कराते थे।एक दिन की बात है। महात्मा बुद्ध विहार में बैठे हुए धर्म चर्चा कर रहे थे। तभी आश्रम का एक शिष्य आया और उसने महात्मा बुद्ध से कहा, आपने जब से सारिपुत्र को धम्म सेनापति की उपाधि दी है, तब से वह अपनी मनमानी पर उतर आए हैं। उन्हें अपनी पदवी पर अहंकार हो गया है। वह भिक्षुओं के साथ अत्याचार करते रहते हैं। वह लोगों को मार बैठते हैं। मुझे भी उन्होंने मारा है।
तब बुद्ध ने कहा कि कोई कारण होने पर भी महात्मा सारिपुत्र किसी को मारें, ऐसा विश्वास नहीं होता है। अकारण किसी को पीटने की बात ही नहीं है। मैं सारिपुत्र को बुलाकर पूछता हूं। थोड़ी देर बाद सारिपुत्र वहां आए, तो तथागत ने उनसे पूछा, यह भिक्षु कहता है कि तुमने इसे अकारण मारा है। सारिपुत्र ने कहा कि यह भिक्षु अत्यंत विद्वान और साधना करने वाले लोग हैं। इन्हें मारने की धृष्टता कैसे कर सकता हूं। मैं तो इनका सेवक हूं। घर-घर भिक्षा मांगने वाले सारिपुत्र की इतनी हिम्मत कैसे हो सकती है। यदि कोई कष्ट पहुंचा हो, तो मैं क्षमा मांगता हूं।
यह सुनते ही भिक्षु सारिपुत्र के पैरों में गिर पड़ा और क्षमा मांगते हुए कहा कि मुझे क्षमा करें। मैंने ईर्ष्यावश आप पर अकारण दोष लगाया था। तब महात्मा बुद्ध ने सारिपुत्र से कहा, इसने तो अक्षम्य अपराध किया है, लेकिन आप इसे क्षमा कर दें।


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