अशोक मिश्र
फरीदाबाद के सीही गांव में रविवार शाम करीब सात बजे तीन साल की बच्ची नेहा ट्रैक्टर पर खेलते समय फिसल कर खुले बोरवेल में गिर गई। करीब 200 से 250 फीट गहरा बोरवेल पिछले 15 साल से बंद पड़ा था। दस घंटे तक एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, हरियाणा पुलिस, नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने रेस्क्यू चलाया। सोमवार सुबह करीब चार बजे बोरवेल से निकाली गई बच्ची के शरीर में कोई हलचल नहीं थी। अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। यह कोई इकलौता हादसा नहीं है।एक जुलाई 2026 को अंबाला के धनोरा गांव में खुले बोरवेल में चार साल के बच्चे की 21 घंटे के आॅपरेशन के बाद मौत हो गई थी। उससे पहले पलवल की गांधी कॉलोनी में चार साल की बच्ची की घर के सामने खुले मैनहोल में गिरकर मौत हो गई थी। अप्रैल 2023 में गुरुग्राम में सोहना रोड पर खुले सीवर में गिरकर एक व्यक्ति की मौत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुख्य सचिव, पुलिस आयुक्त और नगर निगम आयुक्त को नोटिस जारी किया था। पिछले साल जुलाई में फरीदाबाद में ही सुरक्षा सुपरवाइजर की कार खुले नाले में गिरने से डूबकर मौत हो गई।
बोरवेल, मैनहोल, गड्ढे और नाले सभी मौत के दरवाजे हैं जिनमें एक बार कोई गिरा तो उसे जिंदा निकालना लगभग असंभव हो जाता है। हरियाणा जैसे तेजी से शहरीकृत हो रहे राज्य में यह समस्या और भी विकराल है क्योंकि यहां खेती के लिए अवैध बोरवेल, शहरों में पुराने नगर निगम के बोरवेल और चोरी हो चुके लोहे के मैनहोल के ढक्कन एक साथ जानलेवा जाल बनाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के नियम इस मामले में बेहद साफ हैं कि बोरवेल खोदने से 15 दिन पहले जिला कलेक्टर या सरपंच को लिखित सूचना देनी होगी। निर्माण के दौरान कंटीले तार की फेंसिंग लगानी होगी। स्टील की प्लेट को बोल्ट से कसकर ढकना होगा और बोरवेल सूखने या बंद होने पर उसे नीचे से ऊपर तक मिट्टी, रेत, बोल्डर और कंकड़ से पूरी तरह भरना होगा और सरकारी विभाग से सर्टिफिकेट लेना होगा।
लेकिन राज्य में शायद ही ऐसा होता हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बंद बोरवेल को भरने का सर्टिफिकेट लेना जरूरी है, लेकिन हकीकत में पंचायत से लेकर नगर निगम तक कोई भी विभाग सक्रिय सर्वे नहीं करता। हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण को गुरुग्राम जैसे शहरों में दर्जनों बिल्डरों और फैक्ट्रियों के अवैध भूजल दोहन पर कार्रवाई कर बोरवेल सील करने पड़ते हैं, क्योंकि बिना अनुमति के बोरवेल खोदे जाते हैं।
एक बोरवेल को सही तरीके से भरने में 15 से 20 हजार रुपये लगते हैं, किसान या प्लॉट मालिक इसे बेकार खर्च मानकर खुला छोड़ देता है और लोहे के मैनहोल ढक्कन कबाड़ में बेच दिए जाते हैं। जब तक ऐसे मामलों में लापरवाही नहीं बल्कि हत्या की कोशिश जैसा अपराध नहीं माना जाएगा, तब तक सीही की नेहा जैसी बच्चियों की चीखें 10 घंटे के रेस्क्यू के बाद खामोशी में बदलती रहेंगी।
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