Monday, August 31, 2026

काम, क्रोध और लोभ पर विजय पाने की विद्या सीखी है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

श्रावस्ती में एक युवक था अंकमाल। बौद्ध कथाओं में इसका कई बार जिक्र आया है। कुछ लोग अंकमाल और अंगुलिमाल को एक ही मानते हैं। शायद यह दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं। एक दिन युवा अंकमाल महात्मा बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ। उसने बड़ी विनम्रता से कहा कि भंते! मैं संसार की सेवा करना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि आप जहां उचित समझें, मुझे भेज दें ताकि लोगों को मैं धर्म का रास्ता बता पाऊं। 

अंकमाल की बात सुनकर महात्मा बुद्ध हंसे और बोले, दुनिया को कुछ के लिए तुम्हारे पास भी तो कुछ होना चाहिए। जाओ, अपनी योग्यता बढ़ाओ। अंकमाल वहां से चला गया। उसने दस साल तक कठोर परिश्रम करके 24 कलाएं सीखीं। तीर बनाने से लेकर नाव चलाने तक की विद्याएं सीखने से उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। वह कलाविशारद कहा जाने लगा। उसे अपने ऊपर अभिमान हो गया। 

वह महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा और अभिमानपूर्वक कहा कि मैं अब 24 कलाओं को जानता हूं। हर व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूं। बुद्ध ने कहा कि तुमने योग्यता हासिल की है, लेकिन परीक्षा नहीं दी है। एक दिन वेष बदलकर बुद्ध उसके पास पहुंचे और उसकी बुराई करने लगे। वह उन्हें क्रोधित होकर मारने दौड़ा। उसी दिन वह आम्रपाली के साथ उससे मिलने पहुंचे, तो वह पूरे समय आम्रपाली को ही देखता रहा। उसी दिन दोपहर में दो बौद्ध श्रमण पहुंचे और उससे कहा कि महाराज आपको मंत्रीपद देना चाहते हैं क्या स्वीकार करेंगे? 

अंकमाल को लोभ आ गया। वह बोला, हां..हां, अभी चलो। दोनों श्रमण चुपचाप चले गए। शाम को अंकमाल को तथागत ने बुलवाया और पूछा, वत्स! तुमने काम, क्रोध और लोभ पर विजय पाने की विद्या सीखी है। अंकमाल चुप रह गया। उसे दिन हुई सारी घटनाएं याद आईं। उसने लज्जा से सिर झुका लिया। उस दिन से आत्म विजय की साधना शुरू कर दी।

हरियाणा के 62 प्रतिशत इलाकों में पीने लायक नहीं रहा पानी

अशोक मिश्र

हरियाणा में अब सवाल यह नहीं है कि लोगों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। असली सवाल यह है कि जिन लोगों को पीने का पानी मिल रहा है, वह पानी पीने लायक है भी या नहीं। नूंह और पलवल के लगभग 103 गांवों में लोगों को निर्धारित मात्रा से चालीस लीटर पानी कम मिल रहा है। कांग्रेस विधायक आफताब अहमद के सवाल का जवाब देते हुए जन स्वास्थ्य अभियंत्रिकी मंत्री रणबीर गंगवा ने बताया कि राज्य के 297 गांवों में प्रति व्यक्ति दैनिक पेयजल उपलब्धता 55 लीटर से कम है। 

इन गांवों में जो पानी मिल रहा है, उसका टीडीएस यानी पानी में कुल घुले हुए ठोस पदार्थ कई जगहों पर सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। इसी तरह की स्थिति प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी है। लवल में औसत टीडीएस तीन साल में 74 प्रतिशत बढ़कर 940 से 1,636 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया है और जिले के सभी छह ब्लॉक प्रभावित हैं। नूंह के इंदरी ब्लॉक में टीडीएस लगभग दोगुना होकर 1,002 से 1,974 मिलीग्राम प्रति लीटर पहुंच गया है, जो 2,000 मिलीग्राम प्रति लीटर की उस अंतिम सीमा के बेहद करीब है जिसे भारतीय मानक केवल तभी स्वीकार करते हैं जब कोई वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध न हो। 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अनुसार प्रदेश के 61.33 प्रतिशत क्षेत्र में भूजल का अति-दोहन हो रहा है। रासायनिक उर्वरकों और औद्योगिक कचरे से भूजल में नाइट्रेट, फ्लोराइड और भारी धातुओं का घुलना है, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रह गया। इस स्थिति के लिए जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी हुई है। लंबे समय से भूजल का अत्यधिक दोहन होता रहा है। कृषि में पानी की अधिक खपत, नहरी पानी की अपर्याप्त उपलब्धता और भूजल पर निर्भरता ने संकट को गहराया। कई क्षेत्रों में भूजल स्वाभाविक रूप से खारा या खनिजों से युक्त है, लेकिन उपचार संयंत्र और नहर आधारित वैकल्पिक स्रोत विकसित करने में पर्याप्त गति नहीं दिखाई गई। 

जनस्वास्थ्य विभाग की परियोजनाओं में देरी, रखरखाव की कमी और निगरानी की कमजोरी भी समस्या बढ़ाती है। अवैध कनेक्शन पानी को अंतिम छोर तक पहुंचने से रोकते हैं। जल जीवन मिशन के तहत हर घर नल का लक्ष्य पूरा होने का दावा किया जाता है, लेकिन पानी की गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो पाई। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर योजनाएं बनीं, लेकिन धरातल पर उनके क्रियान्वयन में अंतर रहा। शासन-प्रशासन को अब ठोस और त्वरित कदम उठाने की जरूरत है। 

हरियाणा के गांवों में पेयजल संकट अब सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं रह गया है। सरकारी आंकड़े खुद समस्या की गंभीरता स्वीकार करते हैं। अब जरूरी है कि घोषणाओं से आगे बढ़कर प्रभावी क्रियान्वयन हो, ताकि हर घर तक स्वच्छ और पर्याप्त पानी पहुंचे। जल संकट सिर्फ प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य और जीवन स्तर से जुड़ा मुद्दा है। 

Sunday, August 30, 2026

विशाखे! अपने भीतर ही सुख की तलाश करो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

विशाखा को मिगारमाता भी कहा जाता है। वह श्रावस्ती के सबसे धनी व्यापारी मिगारा की पुत्रवधू थी। विशाखा साकेत (अयोध्या) के एक धनी व्यापारी की पुत्री थी और उसका विवाह मिगारा के पुत्र पुन्नवद्धन के साथ हुआ था। एक बार की बात है। मिगारा के दरवाजे पर एक भिक्षुक आया। भिक्षाम देहि की आवाज सुनकर विशाखा द्वार पर आई और जोर से कहा कि भोजन बासी है। जब ताजा होगा, तब आना। विशाखा अपने पितृगृह में रहते हुए ही महात्मा बुद्ध से प्रभावित थी।

 विशाखा की बात सुनकर मिगारा ने कहा कि यह क्या कह रही हो? भोजन तो ताजा बना है। तब विशाखा ने कहा कि पिता जी, आज हम सब जो कुछ भी खा रहे हैं, ऐश्वर्य का भोग कर रहे हैं, वह तो पूर्व जन्मों का प्रतिफल है। इस जन्म में आपने कोई पुण्य तो कमाया नहीं है। इसलिए भोजन बासी हुआ न। बात मिगारा के समझ में आ गई। तब उसने अपनी पुत्रवधू को माता का दर्जा दिया और तब से वह मिगारमाता के नाम से प्रसिद्ध हुई। 


बाद में मिगारा ने भी बौद्ध धर्म अपना लिया। एक बार जब महात्मा बुद्ध श्रावस्ती आए, तो वह मिगारमाता के पूर्णाराम में विश्राम कर रहे थे। निरंतर यात्रा की वजह से वह कुछ थकान महसूस कर रहे थे। विशाखा तथागत के साथ धर्म चर्चा करना चाहती थी, लेकिन किसी कारणवश वह ऐसा नहीं कर पा रही थी। अपनी समस्या के निवारण के लिए वह राजा प्रसेनजित के महल भी गई, लेकिन उसका काम करने से प्रसेनजित ने भी टाल दिया। वह चिलचिलाती धूप में लौटी और बुद्ध को प्रणाम कर खिन्न बदन बैठ गई। 

बुद्ध ने कहा कि विशाखे! इसलिए कहता हूं कि आकांक्षाओं को कम से कम रखना चाहिए। विशाखा ने कहा कि भगवन! कोई ऐसा उपाय है जिससे आकांक्षाओं को कम किया जा सके। बुद्ध बोले, अपने भीतर ही सुख की तलाश करो, तो बाहरी इच्छाएं निस्सार प्रतीत होने लगेंगी। यह सुनकर विशाखा की उदासी दूर हो गई।

समाज को संगठित अपराध और गैंगस्टरों के खिलाफ आगे आना होगा


अशोक मिश्र

संगठित गिरोह, गैंगस्टर नेटवर्क और फिरौती के लिए आने वाले फोन काल्स के खिलाफ हरियाणा में विशेष एसटीएफ ने कमर कस ली है। उसने अपराधियों के खिलाफ अपना अभियान तेज कर दिया है। स्पेशल टास्क फोर्स ने 2024 से अब तक करीब 1972 आरोपियों को गिरफ्तार किया है जिनमें 1063 गैंगस्टर और गैंग सदस्य शामिल हैं। अकेले 2026 में जनवरी से अगस्त के बीच 512 आरोपी पकड़े गए जिनमें 270 गैंगस्टर या उनके सहयोगी तथा 55 मोस्ट वांटेड अपराधी थे। 

ऑपरेशन ट्रैकडाउन जैसे अभियानों में एक ही दिन में दर्जनों कुख्यात अपराधियों को गिरफ्तार कर हिस्ट्री शीट खोली गईं। विदेश भागकर बैठे गैंगस्टरों के खिलाफ भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ा है। 2025-26 में 21 गैंगस्टरों को निर्वासन या प्रत्यर्पण के जरिए भारत लाया गया जिनमें 2026 में ही 14 शामिल हैं। कई अन्य विभिन्न देशों में हिरासत में हैं। जॉर्जिया, अमेरिका, यूएई, थाईलैंड, फिलीपींस और अन्य जगहों से अपराधियों की वापसी ने नेटवर्क को झटका दिया है।  हरियाणा में गैंगस्टर पनपने के कारण संरचनात्मक और सांस्कृतिक दोनों हैं। 

राज्य में तेजी से बढ़ा जमीन का बाजार, देहात में बेरोजगारी के बीच कम समय में अधिक पैसा कमाने की चाह, शराब और खनन जैसे नकद-बहुल धंधों पर नियंत्रण की होड़ और पंचायत से लेकर नगर निगम तक के ठेकों में वर्चस्व की राजनीति ने अपराध को आर्थिक प्रोत्साहन दिया। सात राज्यों के डीजीपी की चंडीगढ़ में हुई बैठक में हरियाणा पुलिस ने खुद स्वीकार किया कि प्रदेश में करीब 80 आपराधिक गैंग सक्रिय हैं, जिनमें से आठ बड़े गैंग दिल्ली-एनसीआर में फिरौती वसूलते हैं और सभी ने विदेश में अपने पॉइंट आॅफ कॉन्टैक्ट बना रखे हैं। संगठित अपराध समाज पर गहरी और बहुआयामी चोट पहुंचा रहा है।

यह केवल हिंसा या हत्या तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि व्यापारियों, बिल्डरों और आम नागरिकों से रंगदारी वसूली, संपत्ति विवादों में हस्तक्षेप तथा भय का माहौल पैदा कर आर्थिक गतिविधियों को बाधित करता है। व्यवसायी और उद्यमी लगातार धमकियों के साए में रहते हैं, जिससे निवेश प्रभावित होता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है। हरियाणा पुलिस की वर्तमान रणनीति गिरफ्तारी के साथ-साथ नेटवर्क को आर्थिक और लॉजिस्टिक रूप से तोड़ने पर केंद्रित है। 

यह स्वीकार करना होगा कि सिर्फ पुलिस कार्रवाई से संगठित अपराध खत्म नहीं होगा। जब तक जमीन-शराब-ठेकेदारी के विवादों का निपटारा त्वरित अदालती प्रक्रिया से नहीं होगा, युवाओं के लिए कौशल और रोजगार के विकल्प नहीं बनेंगे और गैंगस्टर संस्कृति का सामाजिक बहिष्कार नहीं होगा, तब तक हर गिरफ्तार गैंगस्टर की जगह दूसरा तैयार होता रहेगा। प्रत्यर्पण और सख्ती एक जरूरी विराम है, स्थायी समाधान नहीं। समाज को गैंगस्टरों के खिलाफ आगे आना होगा।


Saturday, August 29, 2026

अजातशत्रु! तुम्हारा पाप कभी नहीं मिटेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के सम्राट बिंबिसार की उनके पुत्र अजातशत्रु ने हत्या कर दी थी। पिता को मौत के घाट उतारने के बाद अजातशत्रु ने शासन संभाला। काफी दिनों बाद उसे अपने पिता की हत्या करने पर पश्चाताप हुआ। उसने उस पाप को मिटाने के लिए पशुबलि का आयोजन किया। संयोग से उन्हीं दिनों महात्मा बुद्ध मगध की राजधानी राजगृह जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि विपरीत दिशा में भेड़ों का एक झुंड चला आ रहा है। 

उसके पीछे आ रहे गड़रिये ने एक भेड़ के बच्चे को कंधे पर लाद रखा है। बुद्ध समझ गए कि मेमने को कोई कष्ट है जिसकी वजह से गड़रिये ने उसे कंधे पर उठा रखा है। उन्होंने गड़रिये से मेमने के बारे में पूछा, तो गड़रिये ने बड़ी श्रद्धा से जवाब दिया-भंते! इस मेमने के पैर में चोट लगी है। इसलिए मैंने इसे कंधे पर उठा रखा है। बुद्ध ने उस मेमने की चोट की जगह पर हाथ रखा, तो मेमने को राहत मिली। 

उसने अपनी आंखें मूंद ली। साधु वेश में खड़ी बुद्ध को देखकर गड़रिये ने कहा कि भंते! आप इस मेमने के इस चोट को देखकर इतने पीड़ित हैं। अभी कुछ देर बाद इन सबको अग्नि को समर्पित कर दिया जाएगा, तब आपको कितनी व्यथा होगी। यह सुनकर बुद्ध विचलित हो उठे। उन्होंने पूछा, तो गड़रिये ने बताया कि महाराज अजातशत्रु पिता की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए एक हजार पशुओं की बलि चढ़ाने जा रहे हैं। 

बुद्ध जब यज्ञ स्थल पर पहुंचे तो देखा कि अजातशत्रु यजमान की तरह यज्ञवेदी के पास बैठा हुआ है और ब्राह्मण यज्ञ करा रहे हैं। बुद्ध को देखते ही अजातशत्रु बुद्ध के पास पहुंचा और यज्ञ के बारे में बताया। बुद्ध ने कहा कि एक पत्ता ले आओ। पत्ता आने पर उन्होंने अजातशत्रु से कहा, इसको चीर दो। पत्ता चीरे जाने के बाद उन्होंने कहा, इसे जोड़ दो। अजातशत्रु ने कहा कि इसे जोड़ा कैसे जा सकता है। तब बुद्ध ने कहा कि जो पाप तुमने किया है, उसे मिटाया नहीं जा सकता है। तब इस यज्ञ का क्या मतलब है। अजातशत्रु की समझ में बात आ गई और उसने यज्ञ टाल दिया।

मिलावटी मिठाइयों ने रक्षाबंधन त्यौहार का मजा किया किरकिरा


अशोक मिश्र

हमारा देश पर्व प्रधान है। शायद ही कोई महीना ऐसा बीतता हो जिसमें कोई न कोई तीज-त्यौहार न आता हो। भारत में तीज-त्यौहार कृषि से जुड़े रहे हैं। भाई-बहन के पावन प्रेम संबंधों का प्रतीक रक्षाबंधन भी मूलत: कृषि से ही जुड़ा है। दरअसल, सावन बीतते-बीतते कृषि कार्य पर विराम लग जाता है। किसान खेत-खलिहान से खाली हो जाता है। अभी फसल तैयार नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में यही मौका होता है, अपने सगे संबंधियों से मिलने का। बहनें अपने भाई और अन्य परिजनों से मिलने को व्याकुल होती हैं। तो वह अपने मायके चल देती है रक्षाबंधन मनाने के लिए। 

घर में आई बहन-बेटी का स्वागत विभिन्न तरह के पकवानों से किया जाता है। हरियाणा में कोई तीन-चार दशक पहले तक रक्षाबंधन पर्व पर बाजार से मिठाई लाने का तो चलन ही नहीं था। घर की बुजुर्ग महिला यानी दादी, मां, चाची आदि सुबह चार बजे उठकर चूल्हा लीपती थीं। फिर उसी चूल्हे पर सुबह ही कड़ाही चढ़ जाती थी। घी तो घर का ही होता था, गाय-भैंस के दूध से निकला। उस घी में सबसे पहले गुलगुले तलते, गुड़ और गेहूं के आटे के मीठे गोले, जो बाहर से कुरकुरे और अंदर से नरम होते थे। 

साथ में शक्करपारे, जिन्हें बच्चे राखी बंधवाने से पहले ही चट कर जाते थे। चूरमा तो रक्षाबंधन की आत्मा था। बाजरे की रोटी को हाथ से मसलकर उसमें बूरा और घी मिलाकर बनाया जाता था। यह चूरमा इतना पौष्टिक होता था कि एक कटोरी में पूरे सावन की ताकत आ जाती थी। मीठे चावल, पीले मीठे चावल में केसर नहीं, हल्दी की एक चुटकी और घी की महक होती थी। खीर तो मिट्टी की हांडी में बनती थी। धीमी आंच पर घंटों तक पकती, और पुआ, मालपुए, खांड के बताशे तो रक्षाबंधन की शोभा ही बढ़ा देते थे। 

भाई के आने पर थाली में ये ही परोसे जाते थे, साथ में दही और घर का बना सफेद मक्खन, इसके स्वाद का तो कहना ही क्या था। ये पकवान सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं होते थे, ये मां के हाथों की दुआ थे। हर निवाले में पता चलता था कि इसमें मिलावट नहीं, ममता मिली है। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। त्योहार के दो दिन पहले अखबारों में खबरें आने लगती हैं कि फलां जगह से नकली मावा पकड़ा गया। फलां दुकान पर मिलावटी बर्फी मिली। लोग पढ़कर भी उसी दुकान पर लौट जाते हैं क्योंकि किसी के पास घर पर पकवान बनाने के लिए समय नहीं है। घर पर पकवान और मिठाई बनाना अब पिछड़ापन लगने लगा है। 

आज लगभग हर घर में डिब्बा आता है दुकान से बंधा-बंधाया। ऊपर सुनहरी पन्नी लगी मिठाई, देखने में सुंदर, पर भीतर क्या है, कोई नहीं जानता। खोया के नाम पर पाउडर, घी के नाम पर डालडा और रंग के नाम पर केमिकल। हमने खुद अपने हाथों से त्योहारों को जहर में बदल दिया है। चूरमा, खीर और गुलगुला आदि को हमने एक चमकदार डिब्बे के लिए बेच दिया।


Friday, August 28, 2026

महारानी क्षेमा ने त्यागा भोग विलास


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

साम्राज्ञी महारानी क्षेमा हर्यक वंश के प्रतापी राजा बिंबिसार की पत्नी थीं। वह मद्र देश (वर्तमान पंजाब) के बौद्ध शासक सांगल की पुत्री थीं। उन्हें अपने रूप-यौवन पर बहुत अभिमान था। इस वजह से वह बुद्ध को नापसंद करती थीं क्योंकि बुद्ध बाहरी सौंदर्य को मिथ्या मानते थे। एक दिन जब उन्होंने बुद्ध को देखा, तो बुद्ध ने उन्हें जीवन की तीनों अवस्थाओं से परिचय कराया। वह बुद्ध से प्रभावित हुईं। 

एक दिन महारानी क्षेमा अपने सैन्य टुकड़ी के साथ महात्मा बुद्ध के चैत्य विहार में पधारीं। आश्रम के बाहर ही सैनिक टुकड़ी को रोक दिया गया। वह रथ से उतरीं और रथ सहित सैनिकों को वापस जाने का आदेश दिया। वह बुद्ध के निजी कक्ष में पहुंची और उन्हें प्रणाम करते हुए कहा कि भगवन! अब तक मैं अंधकार में भटकती रही। यदि पता होता कि प्राकृतिक नियमों में राजा प्रजा एक समान हैं। 

मृत्यु और आधिभौतिक कष्टों और परेशानियों के जाल-जंजाल से कोई मुक्त नहीं होता, तो मैंने आत्मकल्याण के कई चरण पूरे कर लिए होते। महात्मा बुद्ध ने धीर गंभीर स्वर में कहा कि जिनके प्रति तुम्हारा उत्तरदायित्व हैं, उनकी अनुमति भिक्षुणी बनने के लिए अनिवार्य है। यह सुनकर महारानी क्षेमा वापस लौटीं और बिंबिसार से अनुमति लेकर चैत्य विहार दोबारा पहुंची। 

यह बात सुनते ही राज्य की प्रजा भी प्रव्रज्या लेने के लिए उमड़ पड़ी। बुद्ध ने कहा कि क्षेमे! जिस तरह तुम प्रव्रज्या लेने को चैतन्य हो, क्या आश्रम के बाहर उमड़ी भीड़ भी वैसे ही चैतन्य है? क्षेमा ने कहा कि नहीं प्रभु। बुद्ध ने कहा कि फिर यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि इन्हें चैतन्य बनाओ। क्षेमा ने कई साल तक जन जन के बीच जाकर लोगों को आत्मकल्याण की दीक्षा दी और बुद्ध से दीक्षा लेकर महान भिक्षुणी बनी।

सदियों से हरियाणवी लोकगीतों ने रक्षाबंधन पर्व को रखा जिंदा


अशोक मिश्र

आज रक्षाबंधन है। भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन वैसे तो पूरे भारत में मनाया जाता है। हर प्रदेश में रक्षाबंधन मनाने की अपनी अपनी परंपराएं हैं, लोकगीत हैं और विधियां हैं। हरियाणा में रक्षाबंधन की छटा ही निराली और अद्भुत है। हरियाणा में रक्षाबंधन मनाने की परंपरा महाभारत काल से ही चली आ रही है, ऐसा माना जाता है। द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की कलाई पर आंचल का टुकड़ा बांधा था और हरियाणा के खेतों में बैठी दादी यही कथा अपनी पोतियों को सुनाते हुए राखी का अर्थ समझा देती थीं कि यह धागा नहीं, वचन है। 

हरियाणा के पौराणिक किस्सों में तो यह भी कहा जाता है कि जब फसल कट जाती थी और सावन भादों में भाई खेत से थोड़ा खाली होता था, तब बहन अपने पीहर आकर उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती थी ताकि अगली फसल तक उसका भाई सलामत रहे, खेत सलामत रहे। प्राचीन काल में रक्षाबंधन का तरीका बिल्कुल अलग था। तब राखी कोई बाजार की चीज नहीं थी। बहनें खुद सूत कातकर, उसमें हल्दी, सरसों और चावल के दाने पिरोकर राखी बनाती थीं। ऐसी राखियों में बहन का अपने भाई के प्रति प्यार झलकता था। 

पुराने समय में राखी बांधने के बाद शाम को पूरा गांव किसी एक जगह इकट्ठा होकर लोकनृत्य करता था, रात को महिलाएं एकत्रित होकर अपनी खुशी व्यक्त करती थीं। भाई अपनी बहन को अपने खेत की पहली फसल में से हिस्सा देता था, क्योंकि बहन का हक माना जाता था। अब बहुत कुछ बदल गया है। अब राखी कूरियर से आती है। वीडियो कॉल पर बंध जाती है। भाई-बहन एक-दूसरे से हजारों किमी दूर हैं। राखी का रूप भी बदल गया-चांदी की, ब्रेसलेट वाली, कार्टून वाली। पर भाव वही है। 

पहले बहनें सावन भर इंतजार करती थीं कि कब राखी आएगी, अब व्हाट्सएप पर सुबह-सुबह राखी की फोटो आ जाती है। इस पर्व को सबसे ज्यादा जिंदा रखते हैं यहां के लोकगीत। हरियाणा की राखी बिना गीतों के पूरी ही नहीं होती। जब बहनें पीहर से ससुराल लौटने लगती हैं तो आंगन में एक ही गीत गूंजता है- हे री राखी बांधण आई सूं, तेरे रोज नहीं आंदी। इस एक लाइन में शिकायत भी है, अपनापन भी और बचपन की लड़ाई भी। दूसरा गीत जो हर भाभी-ननद की जुबान पर रहता है-इबकै रक्षाबंधन पै छुट्टी आज्या, मैं राखी बांधण आऊंगी मेरे वीर। 

ये गीत सांग और रागनी की धरती से निकले हैं। सूरज कवि दादा लख्मीचंद के जमाने से ही सांग मंडलियां राखी के किस्सों को मंच पर गाती रही हैं, जहां भाई-बहन के प्रेम को रागनी के सुर में पिरो दिया जाता था। आज भी जब बहन भाई की कलाई पर धागा बाँधती है तो आँखों में वही पुरानी चमक आ जाती है। धागा चाहे रेशमी हो या सूती, भाव वही रहता है, रक्षा का वादा, प्रेम का बंधन और वो अटूट विश्वास कि चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए, भाई-बहन का रिश्ता कभी नहीं टूटेगा। 

Thursday, August 27, 2026

साधक को छोटे काम भी करने चाहिए


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

जब श्रावस्ती के बाहर जेतवन में संघ की स्थापना हुई थी, तब से उसकी देखभाल अनाथ पिंडक के पास थी। वह महात्मा बुद्ध के साथ-साथ सभी भिक्षुओं का ध्यान रखते थे। उन्हीं दिनों सुप्पारक तीर्थ क्षेत्र से प्रव्रज्या पर दारूचीरिय लौटे थे। वह पहले भी जेतवन में संन्यासी का जीवन बिता चुके थे। लेकिन जब उन्हें दक्षिण में जाने का अवसर प्राप्त हुआ और उन्हें लोगों से मान सम्मान मिला, तो उनका श्रम करने का अभ्यास छूट गया था। वह सुस्वादु भोजन ग्रहण करने के भी अभ्यस्त हो चुके थे। 

जिस दिन दारूचीरिय जेतवन पधारे, अनाथपिंडक ने उन्हें अतिथि माना। दूसरे दिन अनाथ पिंडक ने दारूचीरिय को कुल्हाड़ी पकड़ाते हुए जंगल से लकड़ी काट लाने को कहा। श्रम का अभ्यास छूट जाने और मन में अहंभाव पैदा हो जाने की वजह से दारूचीरिय ने इसे छोटा काम समझा और लकड़ी काटने नहीं गए। तीसरे दिन अनाथ पिंडक ने उनसे कहा कि आपको तथागत के पास रहना चाहिए। 

हम लोग तो श्रमण मात्र हैं। यह सुनकर दारूचीरिय श्रावस्ती की ओर चल पड़े। वह चलते समय सोचने लगे कि सबसे बड़े अर्हत को भिक्षा मांगने की क्या आवश्यकता है, जब इतने सारे भिक्षु यहां मौजूद हैं। दारूचीरिय श्रावस्ती पहुंचे तो देखा कि बुद्ध रास्ते में पड़े उपलों को उठाकर अपनी झोली में रखते जा रहे हैं ताकि आश्रम में भोजन बनाने में सहायता हो सके। 

पास पहुंचकर दारूचीरिय अभिवादन कर पाते उससे पहले ही बुद्ध ने कहा कि अर्हत को छोटे मोटे काम को भी गरिमा प्रदान करनी चाहिए। दारूचीरिय समझ गए। शाम को सत्संग के समय भी इस घटना को दोहराते हुए कहा कि  आम का पेड़ जितने ज्यादा फल होते हैं, वह उतना ही झुक जाता है। विभूतियां पाकर साधक को और झुकना चाहिए। यह सुनकर दारूचीरिय का सिर शर्म से झुक गया। उन्होंने उसी दिन से हर तरह का श्रम करना प्रारंभ कर दिया।

मरीज की जान से खिलवाड़ करते हैं नकली दवाओं के कारोबारी

अशोक मिश्र

दिल्ली एनसीआर और हरियाणा में नकली और अवैध दवाओं का कारोबार अपनी जड़ें जमाता जा रहा है। इसका ताजा और चिंताजनक उदाहरण दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा फरीदाबाद निवासी डॉ. मनीष शर्मा की गिरफ्तारी है। कुछ दिनों पहले दिल्ली पुलिस ने एक बड़े अंतरराज्यीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया था और इस मामले में 17 लोगों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार किए गए लोगों के पास से करीब नौ करोड़ रुपये मूल्य की कैंसर रोधी दवाएं बरामद हुई थीं। 

इस मामले में फरीदाबाद के नर्सिंग स्टाफ और अस्पताल कर्मचारियों की सक्रिय भूमिका सामने आई। अस्पताल से दवाएं चुराकर तस्करों के जरिए बाजार में पहुंचाने का तरीका इस नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा था। कैंसर, डायबिटीज और वजन नियंत्रण की दवाएं असल में लाखों रुपये की होती हैं, इसलिए नकली या डायवर्ट की गई दवाएं सस्ती दर पर उपलब्ध कराकर या असली कीमत पर बेचकर अपराधी बेतहाशा कमाई करते हैं। अस्पतालों और सरकारी गोदामों से दवाओं का डायवर्जन है, जहां नर्सिंग स्टाफ या प्राइवेट असिस्टेंट मरीजों के लिए रखी वायल निकालकर बाहर सप्लाई करते हैं। 

राज्य ड्रग्स कंट्रोलर ने फील्ड अधिकारियों को सख्त निगरानी, त्वरित निरीक्षण, सैंपलिंग और कानूनी कार्रवाई के आदेश दिए हैं। पिछले दस महीनों में 16 लोगों को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया, जिसमें गुरुग्राम इकाई ने 12 गिरफ्तारियां कीं और कई अंतरराज्यीय सिंडिकेट ध्वस्त किए। अप्रैल 2026 में गुरुग्राम के डीएलएफ फेज-4 और सेक्टर-69 में नकली मौनजारो इंजेक्शन का रैकेट पकड़ा गया, जिसमें करीब 70 लाख रुपये मूल्य की दवाएं जब्त हुईं। जुलाई में नकली टेल्मा-एएम गोलियों का नेटवर्क उजागर हुआ, जिसकी सप्लाई चेन दिल्ली के बिना लाइसेंस वाले थोक व्यापारी और उत्तर प्रदेश-बिहार तक पहुंची।  

एसोचैम का अनुमान है कि देश में नकली दवाओं का बाजार 15 हजार करोड़ रुपये सालाना से अधिक हो गया है। यह कारोबार 20-25 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है। इस मामले में हरियाणा का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। यह भी सच है कि देश का बड़ा फार्मा उत्पादन हरियाणा के सोनीपत, पानीपत, अंबाला बेल्ट में होता है। हर बड़ी बरामदगी में हरियाणा का नाम आने से विशेषज्ञ चिंतित हैं। 

उनका अंदाजा है कि अकेले प्रदेश में सालाना चार सौ से छह सौ करोड़ रुपये का अवैध कारोबार चल रहा है। इसकी बड़ी वजह विभाग में स्टाफ की भारी कमी है। नकली दवाओं का यह कारोबार सिर्फ  आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि मरीजों की जान से जानबूझकर किया जाने वाला खिलवाड़ है। कैंसर जैसे रोगों में नकली दवा देने से इलाज विफल हो सकता है और मौत का खतरा बढ़ जाता है। 

Wednesday, August 26, 2026

भगवन! मुझे बंधन मुक्ति का उपदेश दें

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सुप्पारक तीर्थ क्षेत्र में एक संत रहते थे वाहिय दारूचीरिय। उन्होंने अपनी वासना और इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। धन संपत्ति का उन्हें मोह ही नहीं था। महाराष्ट्र के पालघर जिले के नालासोपारा को ही प्राचीन काल में सुप्पारक तीर्थ कहा जाता था। साधु वाहिय दारूचीरिय जहां भी जाते लोग उनके चरणों में अपनी धन, संपत्ति, वस्त्रों और विभिन्न तरह के उपहारों का ढेर लगा देते थे।

धीरे धीरे उनमें एक अहंभाव जागने लगा। वृद्ध गुरु को अपने शिष्य के अहंभाव के बारे में जानकारी मिल गई। गुरु ने अपने शिष्य दारूचीरिय से कहा कि तुमने गौतम बुद्ध का नाम सुना है? दारूचीरिय ने उत्तर दिया, हां गुरुवर! मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। जेतवन में वह परिव्राजक हैं। उन्होंने भी अर्हत मार्ग को सिद्ध कर लिया है। गुरु ने कहा, तब तुम्हें उनके सामीप्य में कुछ दिन बिताने चाहिए। 

गुरु की बात मानकर दारूचीरिय सुप्पारक से जेतवन के लिए चल पड़े। जब वह जेतवन पहुंचे, तो उन्होंने एक भिक्षु से पूछा कि आप लोग बता सकते हैं, तथागत मिलेंगे? उस भिक्षु ने कहा कि तथागत, भिक्षा के लिए श्रावस्ती गए हैं। तीसरे पहर तक आएंगे। आप विश्राम करें। दारूचीरिय को आश्चर्य हुआ कि इतने भिक्षुओं के होते हुए बुद्ध को भिक्षा मांगने की जरूरत क्यों पड़ी। वह वहीं पहुंचे जहां भिक्षा के लिए बुद्ध खड़े थे। 

दारूचीरिय ने कहा कि भगवन! आप मुझे बंधन मुक्ति का उपदेश दें। बुद्ध ने कहा कि यह उचित समय नहीं है। जब दारूचीरिय ने कई बार जिद की तो महात्मा बुद्ध ने कहा कि जो एक ही बार में एक ही काम में इतना तल्लीन हो जाए कि दूसरी इंद्रियां भाव ही शेष न रह जाए, तो वह अनासक्त और बंधन मुक्त हो जाता है। अब दारूचीरिय को अपनी कमियों का भान हुआ। वह बुद्ध को प्रणाम कर जेतवन की ओर लौट पड़े।

बरसाती मौसम में बीमारियों से बचने के लिए बरतें सावधानी


अशोक मिश्र

हरियाणा में इन दिनों हो रही बरसात ने प्रशासन और व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। भारी बारिश ने कई शहरों और कस्बों को एक विचित्र और चिंताजनक तस्वीर में बदल दिया है। सड़कों पर खुले मैनहोल, कूड़ा-कचरा से पूरी तरह भरी नालियां, पानी के साथ तैरता कचरा और घरों में घुसता सीवर का गंदा पानी मिलकर एक ऐसा दृश्य रच रहे हैं जो न सिर्फ असुविधाजनक है बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकता है। बड़े-बड़े गड्ढे सड़कों पर फैल गए हैं जो किसी भी समय किसी वाहन या पैदल यात्री के लिए दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। 

फरीदाबाद, गुरुग्राम से लेकर हिसार और अंबाला तक एक ही तस्वीर है - सड़कों पर घुटनों तक पानी, उस पानी में तैरता पॉलीथीन और कचरा। किसी भी स्थान पर रुका हुआ पानी मच्छरों का प्रजनन स्थल बन जाता है। डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया जैसी बीमारियों को न्यौता देता है। घरों में घुसा सीवर का पानी और नालियों का ओवरफ्लो लोगों में हैजा, टाइफाइड, पीलिया और दस्त जैसी जल-जनित बीमारियों का कारण बनता है। गीली जमीन पर फिसलन और दूषित पानी में पैर रखने से चर्म रोग और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी समस्याएं भी बढ़ जाती हैं। ऐसे में सावधानी ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।  ऐसी स्थिति में सबसे पहले तो पीने के पानी पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।

 बरसात में नल का पानी सीधे पीने से बचें। उसे अच्छी तरह उबालकर या फिल्टर करके ही इस्तेमाल करें। बाहर का कटा फल, खुले में बिका जूस या चाट-पकौड़ी से परहेज करें। इनमें सीवर के पानी के सूक्ष्म कण मिले होने की आशंका रहती है। घर में पानी को ढक कर रखें और कूलर, गमले, पुराने टायर या छत पर रखी किसी भी चीज में पानी जमा न होने दें। हर दो दिन में उन्हें खाली कर सुखा दें। शाम के समय पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छरदानी या मच्छर भगाने वाली क्रीम का उपयोग करें। 

थोड़ी सी समझदारी, साफ-सफाई और एक-दूसरे का ख्याल रखकर हम इस मुश्किल मौसम को भी सुरक्षित निकाल सकते हैं। अगर बुखार, उल्टी, दस्त या त्वचा संबंधी कोई समस्या हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और स्वयं दवा न लें। बरसात प्रकृति का वरदान है। बरसात की वजह से ही नए-नए पौधों का जन्म होता है। धरती हरी भरी हो जाती है। तपती धरती को बरसात ही शीतल करती है। लेकिन हमारी थोड़ी सी लापरवाही इसे अभिशाप बना देती है। थोड़ी सतर्कता, थोड़ी जागरूकता और थोड़ा सहयोग अपनाकर हम न सिर्फ खुद को बल्कि अपने परिवार और पड़ोसियों को भी सुरक्षित रख सकते हैं। हरियाणा के लोग कठिन परिस्थितियों में सदियों से एकजुट रहे हैं। उनका आपसी भाईचारा दूसरे राज्यों के लिए एक मिसाल की तरह है। इस बार भी वही एकजुटता हमें इन चुनौतियों से उबरने में मदद करेगी।


हम भी इंसान हैं, डायन नहीं !

अशोक मिश्र

गांव में किसी को बकरियां अचानक मर गई, गाय या भैंस बीमार हो गई, बच्चा बीमार है या फिर अचानक मर गया, किसी के घर में बच्चे नहीं हो रहे हैं, इसका क्या मतलब है? इसका एक ही मतलब है कि गांव में कोई डायन है? 'डायन... जी हां, डायन...। सभ्य समाज में ऊपर कही गई बातों को सुनकर भले ही लोगों के मुंह से एकाएक निकल पड़े, यह क्या बेवकूफी है, लेकिन झारखंड, उड़ीसा, असम, नगालैंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि राज्यों के गांवों का सच यही है। डायन, टोनहिन, चुड़ैल, भुतनी, प्रेतनी, डाकिनी, कलंकिनी आदि ये शब्द हैं जो प्राचीनकाल से अब तक औरतों के खिलाफ एक हथियार के रूप में प्रयोग किए जाते रहे हैं। डायन घोषित की गई महिला या महिलाओं के बाल काट लेना, उनके साथ बलात्कार करना, उनको नंगा करके गांव भर में घुमाना, उनके जननांगों को क्षति पहुंचाना, मुंडन कर देना, उनकी हत्या कर देना आदि अमानवीय व्यवहार अंधविश्वासी समाज में जैसे जायज बनकर रह गया है। डायन, भुतनी, चुड़ैल आदि शब्दों को गढ़कर स्त्री को अधिक से अधिक बुरी बत्ताने के लिए कई तरह के किस्से, कहानियां, मिथक और कहावतें गढ़ी गई। 'डायन भी सात पर छोड़ देती है जैसे मुहावरे स्त्री अस्मिता पर न केवल पातक प्रहार करते हैं, बल्कि बच्चों के मन में बचपन से ही उनके प्रति कलुषित धारणाएं पैदा कर देते हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों में डायन बताकर प्राचीनकाल से अब तक कितनी महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया, इसका कोई आंकड़ा दे पाना कतई संभव नहीं है। पिछले सौ-पचास साल का आंकड़ा यदि हम इकट्ठा कर भी ले, तो यह सच्चाई नहीं बदलने वाली है कि डायन शब्द की उत्पत्ति के पीछे पुरुषवादी सत्ता का हाथ रहा है। जो भी स्त्रियां पुरुषों के अनुकूल नहीं रहीं, उनके लिए ही पुरुषों ने यह शब्द ईजाद किया। डायन मतलब बुरी औरत.. जो पुरुषों का कहा नहीं मानती, जो बच्चों को खा जाती है, जिसकी वजह से देश, गांव, समाज और परिवार पर विपत्ति टूट पड़ती है। मजेदार बात यह है कि पुरुषों ने शब्द डायन गढ़ने के बाद यह खूबसूरत हथियार महिलाओं के ही हाथ में थमा दिया कि लो! जब हमें जरूरत महसूस होगी, हमारे इशारे पर उन स्त्रियों को डायन का खिताब देकर मार दो, जो हमारे इशारे पर चलने से इंकार करती हैं, जो पितृसत्ताक व्यवस्था वा पुरुषवादी सत्ता के खिलाफ बगावत करती हैं। यह खेल आज भी जारी है। आज इसका कुछ रूप भले ही बदल गया हो, लेकिन किसी भी महिला को डायन घोषित करने के पीछे की मानसिकता वही हजारों साल पुरानी है। अपने निहित स्वार्थों के लिए किसी भी विवश, लाचार, गरीब, अशिक्षित महिला को डायन बताकर मार दो। अफसोसजनक बात तो यह है कि इस साजिश में अब महिलाएं भी बराबर की भागीदार हैं, यह सोचे बिना कि ऐसा करके वे अपने को ही किसी न किसी रूप में कमजोर कर रही हैं।

हजारों साल बीत जाने के बावजूद इस देश की महिलाओं को यह सोचने-समझने का मौका ही नहीं दिया गया कि वे जब किसी महिला को डायन बताने के लिए प्रेरित की जाती हैं, तो उसके पीछे कारण क्या रहते हैं? आखिर औरत ही डायन क्यों होती है, पुरुष क्यों नहीं? डायन, चुड़ैल, भूतनी, कुटनी, वेश्या जैसे शब्दों की तलवार महिलाओं को ही रक्तरंजित क्यों करती है? भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस कहकर किसी पुरुष को मार दिया गया हो, ऐसी घटनाएं वर्तमान में तो क्या, अतीत में भी शायद ही देखने को मिले। और यदि एकाध हैं भी, तो उसके दूसरे समाजशास्त्रीय कारण रहे होंगे। कुछ राज्यों में तो औरतों को डायन बताकर मार देने की परंपरा आज भी अबाध गति से जारी है। अगर हम डायन बताकर मारी जाने वाली महिलाओं की आर्थिक दशा पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि अब तक ज्ञात सभी घटनाओं में लगभग 28 फीसदी महिलाएं या तो गरीब रही हैं, विधवा रही हैं या फिर तलाकशुदा। डायन बताकर मारी गई कुंवारी लड़‌कियों की भी आर्थिक दशा ऐसी ही रही होगी। अमीर घरों की महिलाओं को डायन बताकर मार देने की घटना न बराबर है। इसका एक ही अर्थ निकलता है कि डायन कही जाने वाली औरतों के पीछे उनकी गरीबी, असहायता, शोषण-दोहन और यौन उत्पीडन जैसी प्रवृत्तियां उत्प्रेरक के रूप में काम करती रही है। अब तक जितने भी मामले सामने आए हैं, उनमें कुछ बातें तो कामन हैं, जैसे, संपत्ति विवाद, यौन शोषण, आपसी रंजिश आदि। इन कारणों से एक बात तो समझ में आती है कि कुछ लोग या समुदाय अपने ही नाते-रिश्तेदार महिलाओं को उनकी संपत्ति हड़पने, उनका यौन शोषण करने या फिर जमीन का बंटवारा न करना पड़े, इसके लिए कुछ महिलाओं या पुरुषों को लालच देकर डायन घोषित करके मार देते हैं। यह सदियों से होता चला आ रहा है।

झारखंड में ये समस्या विकराल रूप में है। उड़ीसा, आंध्र प्रदेश भी ऐसी हत्याओं के मामले में ज्यादा पीछे नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि इन प्रदेशों की सरकारों ने इसे रोकने के लिए कानून नहीं बनाए। सरकार ने अपनी तरफ से कोशिश की और कर रही है, लेकिन लोगों की मानसिकता में अभी नकारात्मक बातें भरी पड़ी हैं। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना पर विश्वास अब भी कायम हैं। झारखंड में डायन प्रथा विरोधी कानून साल 2001 से ही लागू है। इसके बाद भी समाज में कोई खास बदलाव नहीं आया है। राजस्थान सरकार ने डायन प्रथा विरोधी कानून, 2015 पास करके ऐसी हत्याओं पर रोक लगाने की कोशिश की है।

असम में तो पिछले पांच सालों में 70 से अधिक महिलाओं को डायन बताकर मार दिया गया। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में हर साल डायन के नाम पर महिलाओं की बलि ली जा रही है। पुलिस और प्रशासन बहुत दबाव पड़ने और मीडिया में बात उछल जाने पर फौरी तौर पर कुछ कार्रवाइयां करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है। कुछ लोग गिरफ्तार किए जाते हैं, बाद में जमानत पर छूटकर चले आते हैं, कई बार तो क्या, ज्यादातर मामलों में आरोपी सुबूत के अभाव में बरी तक हो जाते हैं। इस अभिशाप के खिलाफ आवाज सदियों से नहीं उठती रही है, लेकिन इस अभिशाप के खिलाफ असम ने जो पहल की है, वह बेमिसाल है। असम की ही एक बहादुर महिला 62 वर्षीय बीरूवाला डायन बताकर मार देने वाले अंधविश्वास के खिलाफ पिछले कई सालों से लड़ रही है। वह अब तक 42 से अधिक महिलाओं की जान इस डायन प्रथा रूपी अभिशाप से बचा चुकी है। अब असम ही नहीं, बल्कि कई राज्यों में महिलाएं और पुरुष धार्मिक अंधविश्वासों के प्रति जागरूक हो रहे हैं। वे इसके खिलाफ आवाज भी उठाने लगे हैं, लेकिन अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। 

Tuesday, August 25, 2026

तू सेवा कर, इसके लिए सारा संसार पड़ा है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

विशाखा कोशल प्रदेश की राजधानी साकेत(वर्तमान में अयोध्या) के एक धनी व्यापारी की पुत्री थी। उसके माता-पिता पहले मगध में रहते थे। जब वह सात साल की थी, तो महात्मा बुद्ध मगध आए थे, तो वह उनसे मिली थी। बाद में उसके परिजन साकेत आ गए। जब वह सोलह साल की हुई, तो उसका विवाह श्रावस्ती के धनी व्यापारी मिगारा के पुत्र पुन्नवद्धन के साथ हुआ और वह अपनी ससुराल श्रावस्ती आ गई। उसे मिगारमाता भी कहा जाता है क्योंकि उसने मिगारा को बौद्ध बनने को प्रेरित किया था। तब उसके ससुर ने उसे अपनी माता का दर्जा दिया था। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध जेतवन पधारे। विशाखा ने अगले दिन बुद्ध के प्रवचन की व्यवस्था की थी। दुर्योग से उसी रात विशाका के पौत्र धीरज का निधन हो गया। पौत्र का दाह संस्कार होने के बाद भी वह रोती रही। जब थोड़ा सा दुख कम हुआ, तो वह उस सभा में जा बैठी जहां बुद्ध लोगों को संबोधित कर रहे थे। 

बुद्ध ने देखा कि विशाखा अस्त व्यस्त वस्त्रों में बैठी शोकमग्न है। बुद्ध ने कहा, विशाखे! मध्याह्न हो चला, तूने अपने वस्त्र नहीं बदले। विशाखा ने रुदन भरे स्वर में कहा, भगवन! मेरे पौध का निधन हो गया है। बहुत समझाने पर जब उसका रोना बंद नहीं हुआ, तो बुद्ध ने कहा, विशाखे! यदि तुझे तेरा पौत्र मिल जाए तो तुझे खुशी होगी? विशाखा ने कहा, हां, तब मेरी खुशी का पारावार नहीं रहेगा। 

बुद्ध ने कहा कि यदि तुझे श्रावस्ती की जनसंख्या जितने पुत्र-पौत्र हो जाएं, तो तुझे अपार खुशी होगी। विशाखा ने कहा, हां, मैं तो बहुत खुश हो जाऊंगी। बुद्ध ने कहा कि तब तो रोज किसी न किसी की मृत्यु होती रहेगी। तू तो रोज इसी तरह व्याकुल रहेगी। सोच, जब तू एक पौत्र के निधन पर इतनी दुखी है, तब क्या होगा? तू सेवा कर, इसके लिए सारा संसार पड़ा है। सेवा में जो सुख है, वह आसक्ति में नहीं है। 

विशाखा महात्मा बुद्ध की बात को समझ गई और उसी दिन से सेवा का पंथ अपना लिया।

हरियाणा में फैल रहा स्वाइन फ्लू घबराने नहीं, सतर्क रहने की जरूरत


अशोक मिश्र

हरियाणा में स्वाइन फ्लू यानी एच1एन1 मामले लगातार बढ़ रहे हैं। अब तक 119 मामले सामने आ चुके हैं। स्वाइन फ्लू के सबसे ज्यादा 1777 मामले दिल्ली में सामने आ चुके हैं। इसके साथ ही उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने स्पष्ट किया है कि फैल रहा वायरस कोई नया स्ट्रेन नहीं है बल्कि 2025 से ही प्रचलन में मौजूद मौसमी इन्फ्लुएंजा का हिस्सा है, इसलिए घबराने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्कता जरूरी है। 

बरसात और बदलते मौसम के बीच यह वायरस तेजी से फैलने की क्षमता रखता है, इसलिए इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है। स्वाइन फ्लू ज्यादातर लोगों में सामान्य फ्लू जैसा ही व्यवहार करता है। इसमें तेज बुखार, सूखी खांसी, गले में खराश, बहती या बंद नाक, सिरदर्द, शरीर और जोड़ों में दर्द, कमजोरी, भूख न लगना, कभी-कभी उल्टी या दस्त जैसे लक्षण दिखते हैं। ज्यादातर मरीज एक से दो सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। हालांकि गर्भवती महिलाएं, पांच साल से छोटे बच्चे, 65 साल से ऊपर के बुजुर्ग, मधुमेह, अस्थमा, हृदय या फेफड़ों की बीमारी वाले लोग और कमजोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्ति ज्यादा खतरे में रहते हैं। 

इनमें निमोनिया, सांस लेने में तकलीफ या अन्य जटिलताएं हो सकती हैं, लेकिन समय पर इलाज से गंभीरता काफी कम हो जाती है। यदि इस तरह के कोई भी लक्षण किसी के शरीर में दिखाई दें तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। लक्षण दिखते ही घर पर रहें, डॉक्टर से सलाह लें और बिना सलाह दवा न लें। एंटीवायरल दवाएं शुरुआती 48 घंटों में सबसे प्रभावी होती हैं। गुरुग्राम, फरीदाबाद, रोहतक, हिसार, करनाल, पानीपत और अंबाला जैसे शहरी और औद्योगिक जिले हमेशा अधिक संवेदनशील रहे हैं। 

सबसे ज्यादा खतरा घनी आबादी वाले शहरी इलाकों, भीड़-भाड़ वाले बाजारों, स्कूलों, कार्यालयों, अस्पतालों तथा सार्वजनिक परिवहन में रहता है, जहां नजदीकी संपर्क आसानी से होता है। इन जगहों पर सावधानी बरतकर और लक्षणों को नजरअंदाज न करके हम संक्रमण के प्रसार को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं। बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण है नियमित रूप से साबुन और पानी से हाथ धोना या सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना। खांसते-छींकते समय रूमाल या कोहनी से मुंह और नाक ढकना चाहिए। भीड़-भाड़ वाली जगहों से जितना हो सके बचना, मास्क पहनना, स्वस्थ आहार लेना, पर्याप्त पानी पीना और अच्छी नींद लेना प्रतिरक्षा को मजबूत रखता है। 

जागरूकता और साधारण सावधानियां ही इस मौसमी संक्रमण से बचाव का सबसे अच्छा तरीका हैं। यदि किसी को सांस लेने में तकलीफ, सीने में दर्द या बुखार के साथ होंठ नीले पड़ने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत अस्पताल जाएं, क्योंकि यह जटिलता का संकेत हो सकता है।

Monday, August 24, 2026

आप जानते हैं, जीवन कितना क्षण भंगुर है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

वाहिय सुप्पारक क्षेत्र (महाराष्ट्र के पालघर जिले में नालासोपारा नाम से विख्यात है) के सबसे बड़े धनी और सम्मानित व्यक्ति थे। इतना धन-संपत्ति होते हुए भी वाहिय को किसी भी प्रकार का अभिमान नहीं था। वह त्याग, संयम और अपरिग्रह जैसे गुणों से परिपूर्ण एक संत पुरुष थे। वह दूसरों को दुख को अपना दुख मानते थे और जो भी उनके पास किसी सहायता की आशा से आता था, वह उसका हर तरह से सहायता करते थे। 

एक बार उनके मन में कुछ बातों को लेकर जिज्ञासा उत्पन्न हुई तो वह पैदल ही जेतवन के लिए चल पड़े। कई महीनों की पदयात्रा के बाद वाहिय जेतवन पहुंचे। उन्होंने संघ के एक भिक्षु से पूछा कि तथागत से मेरा इसी समय मिलना बहुत जरूरी है। मुझे कुछ मामलों में अपनी जिज्ञासा शांत करनी है। उस भिक्षु ने कहा कि तथागत, अभी भिक्षा के लिए जनपद गए हैं। आप इतनी दूर से आए हैं, विश्राम कीजिए। तथागत कुछ ही देर में आते होंगे। वाहिय को उनकी जिज्ञासा ने बहुत परेशान कर रखा था। 

वह भिक्षु से पूछकर उसी दिशा में चल पड़े जिधर महात्मा बुद्ध  गए थे। एक घर के द्वार पर भिक्षा पात्र लिए खड़े बुद्ध दिखाई पड़े। वाहिय ने बुद्ध को प्रणाम करते हुए कहा कि भगवन! मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे मैं अक्षय सुख के मार्ग पर चल सकूं। बुद्ध ने कहा कि यह समय उपदेश देने का नहीं है। मैं भिक्षा लेकर जेतवन चल रहा हूं। वहीं उपदेश देता हूं। 

वाहिय ने कहा कि आप जानते हैं कि जीवन कितना क्षण भंगुर है। जीवन तिरछे पत्ते पर पड़े हुए जल बिंदु के समान है। कब ढुलक जाए, पता नहीं। बुद्ध ने उन्हें उपदेश दिया, तो वाहिय लौट पड़े। भिक्षा ग्रहण करके बुद्ध जब आगे बढ़े कि एक भिक्षु ने आकर कहा, भगवन! जो जिज्ञासु अभी अभी उपदेश सुनकर गया था, उसे सांड ने सींगों से उठाकर पटक दिया है। उसका निष्प्राण शव पड़ा है। बुद्ध ने कहा कि वह तुम्हारा गुरुभाई है। उसका सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करो। यदि मैं उसे अक्षय सुख का उपदेश नहीं देता, तो अपूर्ण इच्छा इसके साथ चली जाती।

भूख, कुपोषण, अशिक्षा के खिलाफ सफल हथियार है मिड-डे-मील

अशोक मिश्र

हरियाणा के सरकारी स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले मिड-डे-मील यानी पीएम पोषण योजना में गड़बड़ी की आशंका के चलते शिक्षा विभाग ने निगरानी व्यवस्था को सख्त कर दिया है। अब स्कूलों में बच्चों की हाजिरी केवल रजिस्टर तक सीमित नहीं रहेगी। बच्चों की हाजिरी का डिजिटल रिकॉर्ड भी तैयार किया जाएगा। सबसे पहले तो विभाग अपने तरीके से दर्ज हाजिरी का मिलान करेगा। वह यह सुनिश्चित करेगा कि जितने बच्चों के नाम पर भोजन दर्ज किया गया है, उस दिन स्कूल में  उतने बच्चे थे या नहीं। 

अब पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों की रोज की हाजिरी पीएम पोषण एप पर भेजनी होगी। पहले हर महीने 10 तारीख तक पोर्टल पर डाटा अपडेट करने की छूट थी, पोर्टल 10 तारीख के बाद बंद हो जाता था, लेकिन अब मौलिक शिक्षा महानिदेशालय ने हिदायत दी है कि रोज डाटा एमआईएस पोर्टल और पीएम पोषण एप पर अपडेट किया जाए। निदेशालय के संज्ञान में आया है कि स्कूलों की ओर से डाटा अपडेट नहीं किया जा रहा है और विद्यार्थियों की संख्या के हिसाब से ज्यादा राशन मंगवाकर राशन की कमी की झूठी रिपोर्ट भेजी जा रही है। 

पीएम पोषण योजना का सीधा संबंध बच्चों के पोषण और स्कूल में उनकी उपस्थिति से है। इसलिए योजना के तहत उपलब्ध कराए जाने वाले भोजन का रिकॉर्ड सही रखना बेहद जरूरी है। सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए खाद्यान्न और अन्य संसाधनों का इस्तेमाल वास्तविक विद्यार्थियों के लिए ही हो, इसी दिशा में डिजिटल निगरानी को अहम कदम माना जा रहा है। वैसे यह सच है कि मिड डे मील योजना का एक लाभ यह भी दिखने लगा है कि हरियाणा के सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है। 

योजना लाखों बच्चों को स्कूल से जोड़े रखने में बेहद सफल रही है। सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ा है, ड्रॉपआउट दर घटी है। यह इस योजना का सबसे सकारात्मक पहलू है। इससे प्रदेश में साक्षरता दर में काफी बढ़ोतरी दिखाई दे रही है। इस योजना का एक सामाजिक पहलू भी उजागर हुआ है।  कई गरीब परिवारों के बच्चों के लिए मिड डे मील ही दिन का सबसे पौष्टिक भोजन है। मिड डे मील की वजह से वह कुपोषित होने से भी बच जा रहे हैं। सरकार ने बाल वाटिका से कक्षा आठ तक के बच्चों के पोषण स्तर में सुधार के लिए हफ्ते में एक दिन इंस्टेंट खीर और पिन्नी जैसी नई पहल भी शुरू की है। 

यह योजना भी बच्चों को कुपोषित होने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कई गरीब, मजदूर और प्रवासी परिवारों के लिए दोपहर का पक्का भोजन एक बड़ा आकर्षण है। इस वजह से पहली से आठवीं तक के बच्चों का दाखिला बढ़ा है और खासकर लड़कियों का ड्रॉपआउट काफी कम हुआ है। अगर गड़बड़ी और गुणवत्ता की समस्या को हटा दें, तो यह योजना हरियाणा में भूख, कुपोषण और अशिक्षा के खिलाफ एक साथ लड़ने वाला सबसे सफल हथियार है।

Sunday, August 23, 2026

बुद्ध बोले, प्रकृति में नहीं होते हैं चमत्कार

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के समकालीन एक राजा थे। वह किसी सिद्ध पुरुष की तलाश में थे ताकि अपनी कामनाओं की पूर्ति कर सकें। वह अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए हर संभव प्रयास पहले भी कर चुके थे। किसी ने उन्हें सलाह दी थी कि यदि वह किसी सिद्ध पुरुष को तलाश लें, तो वह आपकी मनोकामना की पूर्ति कर सकता है। राजा ने एक मैदान में पतला सा बहुत ऊंचा बांस गड़वाया और उस पर सोने का एक कमंडल टांग दिया। 

उन्होंने घोषणा की कि जो भी सिद्ध पुरुष बांस पर चढ़कर कमंडल उतार लाएगा, उसे कमंडल के साथ बहुत कुछ दिया जाएगा। वह मेरा गुरु होगा और उसे रहने के लिए महल, आने जाने के लिए हाथी-घोड़े प्रदान किए जाएंगे। उस राज्य के संत, महात्मा, ज्ञानी-गुणी सबने प्रयास किया, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ। काफी दिनों बाद एक पतला-दुबला बौद्ध भिक्षु आया। 

उसने चुनौती स्वीकार कर ली। वह बांस पर चढ़ गया और सोने का कमंडल उतार लाया। राजा ने उसे अपना गुरु बना लिया और सारी सुख सुविधाएं दीं। एक दिन भिक्षु ने सोचा कि महात्मा बुद्ध इन दिनों श्रावस्ती के जेतवन में विहार कर रहे हैं क्यों न चलकर उन्हें चमत्कार के बारे में बताया जाए। राजा ने सवारी और सेवकों का प्रबंध कर दिया। वह जेतवन पहुंचा। इससे पहले बुद्ध उसके चमत्कार की कथा सुन चुके थे। 

शाम को जब वह भिक्षुओं को प्रवचन देने आए, तो उस भिक्षु की चर्चा करते हुए बोले, यह व्यक्ति भिक्षु बनने से पहले नट था। पतले बांस पर चढ़ना इसके लिए कोई कठिन काम नहीं था। इसने कोई चमत्कार नहीं किया है। प्रकृति में चमत्कार नहीं होते हैं। आज से बुद्ध संघ का कोई भी भिक्षु चमत्कार दिखाने का प्रयास नहीं करेगा। छल से धर्म का प्रचार करने का प्रयास भी नहीं करेगा। आत्मशुद्धि के लिए की गई तप साधना से ही मानव कल्याण संभव है।

गांव की गलियों से लेकर शहर के बाजारों तक सफाई का पहिया जाम

अशोक मिश्र

हरियाणा में पिछले सोलह दिन से सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं।  मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने खुद मोर्चा संभालते हुए कहा है कि वह जल्दी ही हड़ताल खत्म कराएंगे, बातचीत सौहार्दपूर्ण माहौल में हो रही है और समाधान निकलेगा। गांव की गलियों से लेकर शहरों के बाजारों तक सफाई का पहिया थमा हुआ है। शहरों से लेकर गांवों तक कूड़े-कचरे के ढेर लग चुके हैं। हड़ताल के कारण प्रदेश भर में 14 हजार टन से ज्यादा कूड़ा जमा हो चुका है। शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में नालियां अवरुद्ध हो गई हैं। 

वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर निजी कर्मचारियों से कचरा उठवाने की कोशिश स्थानीय प्रशासन ने की थी, लेकिन ऐसा करने पर कर्मचारी भड़क रहे हैं। वह कई जगहों पर निजी कर्मचारियों को काम रोक रहे हैं। कहीं रोडवेज के परिचालकों को अस्थायी रूप से फायर ब्रिगेड में लगाना पड़ रहा है क्योंकि अग्निशमन कर्मचारी भी हड़ताल पर हैं। इस बिगड़ती व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है और स्थानीय निकाय विभाग से शपथपत्र पर जवाब मांगा है। सफाईकर्मियों की हड़ताल का स्वास्थ्य पर सीधा असर दिखने लगा है। 

सड़कों पर पड़ा कचरा सड़ रहा है, बदबू से लोग बेहाल हैं, नालियों का गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है और मक्खी-मच्छर पनप रहे हैं। स्थानीय डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि हरियाणा स्वास्थ्य आपातकाल की कगार पर है। गुरुग्राम, हिसार, फरीदाबाद जैसे शहरों में टनों कचरे से डेंगू, मलेरिया, डायरिया, त्वचा संक्रमण और सांस की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ गया है। सात दिन से कूड़े के ढेर लगे रहने से बीमारी फैलने का अंदेशा पहले ही जताया जा रहा था। 

ऐसे में मुख्यमंत्री का यह भरोसा कि बातचीत से जल्द सफाई व्यवस्था पटरी पर लौटेगी, आम लोगों के लिए एक उम्मीद है, लेकिन जब तक कागज पर मानी गई 17 मांगों के आदेश जारी नहीं होते और पक्का करने की मांग पर कोई बीच का रास्ता नहीं निकलता, तब तक गांव की चौपाल से लेकर शहर के अस्पताल तक यही सवाल गूंज रहा है कि कचरे के इस पहाड़ के नीचे आखिर आम आदमी की सेहत कब तक दबी रहेगी। सरकार वेतन बढ़ोतरी, समय पर वेतन, वर्दी और सुरक्षा उपकरण, पीएफ-ईएसआई, एरियर का भुगतान, ठेका प्रथा खत्म कर पे-रोल पर लाने और कुछ भत्तों पर सहमत होती दिख रही है। 

पानीपत में हुई बैठक के बाद तो हड़ताल खत्म होने का ऐलान भी हुआ था। लेकिन पक्का करने की सबसे बड़ी मांग पर सरकार अड़ी हुई है। उसका कहना है कि हाईकोर्ट के 31 दिसंबर 2005 के आदेश और बाद में 31 दिसंबर 2025 तक 10 साल की सेवा वालों को नियमित करने के निर्देश की समीक्षा करेगी, तुरंत पक्का करना संभव नहीं है। यही वह बिंदु है जहां बात टूटती है। कर्मचारी इसे ही अपनी 19 साल की सेवा का हक मानते हैं और ठेका प्रथा समाप्त करने के लिखित आदेश जारी होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दे रहे हैं। 

लोकतंत्र को ‘भीड़तंत्र’ में नहीं बदलने देगी नई पीढ़ी


संजय मग्गू

इन दिनों जो माहौल है, उसको देखते हुए कुछ लोगों को अब यह डर सताने लगा है कि कहीं लोकतंत्र भीड़तंत्र में न बदल जाए। उनकी आशंका का आधार शायद बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में हुए जेन जेड के आंदोलन हैं। इन देशों में हुए आंदोलन के दौरान युवा अनियंत्रित हो गए थे और जो कुछ हुआ, उसे पूरी दुनिया ने देखा। इन देशों को यदि आधार बनाकर बात की जाए, तो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में तब्दील होने की उनकी आशंका गलत नहीं है। लेकिन हमें यह बात भी याद रखनी चाहिए कि हर आंदोलनकर्ता हिंसक नहीं होता है, बलवाई नहीं होता है। 

पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए जेन जेड के आंदोलन ने यह साबित कर दिया है। संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी तब उग्र हुए, जब पुलिस और अराजकतत्वों ने उन्हें बुरी तरह मारा-पीटा। बिना वर्दी और बैच पहने लोगों ने युवाओं को जिस तरह निशाना बनाया, लड़कियों के निजी अंगों पर प्रहार किया, उसके मुकाबले युवाओं का प्रतिरोध कुछ भी नहीं था। सच तो यह है कि पुलिस को बार-बार यह बताया-समझाया जाता है कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाला उनका शत्रु है। ब्रिटिश पीरियड से ही यह मानसिकता चली आ रही है। 

शायद अब पुलिस की ऐसी मानसिकता बहुत दिन तक नहीं रहने वाली है। जैसे-जैसे समाज बदल रहा है, लोगों की मानसिकता बदल रही है, वैसे-वैसे जेन जेड और जेन अल्फा का व्यवहार भी बदल रहा है। यह बदलाव बहुत तेजी से हो रहा है। इस बात को राज्य सत्ता, प्रशासन और समाज के लोग बहुत शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। इन दिनों तो रोज किसी न किसी प्रांत से, किसी जिले से या गांव से यह खबर आ रही है कि छोटे-छोटे बच्चों ने अपनी लड़ाई खुद लड़ने का निर्णय लिया है। 

वह अब किसी संगठन या किसी सहारे का इंतजार नहीं कर रहे हैं। वह अपनी लड़ाई खुद लड़ने को तैयार हैं। उन्हें किसी किस्म का भय भी नहीं है। कल्पना कीजिए, उस बच्ची में कितना साहस होगा, जो अपने स्कूल में होने वाली असुविधा और अनियमितताओं को लेकर डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट कार्यालय के सामने खड़ी होकर कह रही थी कि डीएम को बुलाओ। हम उनसे ही बात करेंगे। यह बदलाव है। यही बदलाव नए और पारदर्शी शासन व्यवस्था की नींव बनने वाला है। निकट भविष्य में व्यवस्था को या तो खुद सुधरना होगा या फिर मिटना होगा।

निडर जेन अल्फा जब बड़े होकर कार्य क्षेत्र में प्रवेश करेंगे, तो निश्चित है कि वह न तो खुद गलत करेंगे और न किसी को करने देंगे। इस बदलाव को सकारात्मक रूप से लेना चाहिए। जो काम हमारी पीढ़ी नहीं कर सकी, यदि जेन जेड और जेन अल्फा करने में सफल हो गई, तो यकीन मानिए, हमारे सामने एक नया भारत होगा जिसमें भ्रष्टाचार, शोषण, दोहन और उत्पीड़न को कोई जगह नहीं मिलने वाली है। यह पीढ़ी लोकतंत्र को भीड़तंत्र में नहीं बदलने देगी। बस, हमें अपनी नई पीढ़ी पर विश्वास करना सीखना होगा।

Saturday, August 22, 2026

प्यारी गिलहरी! तुम क्या कर रही हो?


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध जब घर-परिवार और राजपाट त्यागकर मानव कल्याण के लिए घर से निकले, तो उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जिस व्यक्ति ने अपनी 29 वर्ष की आयु तक किसी प्रकार के अभाव का अनुभव न किया हो, जिसने कभी कड़ी धूप में खड़े होने की जरूरत ही नहीं पड़ी हो, उस राजकुमार को जगह-जगह की धूल छाननी पड़ रही थी। 

जिसने अपने जीवन में स्वादिष्ट भोजनों का ही स्वाद चखा हो, उसे केवल एक समय की भिक्षा पर ही अपना गुजारा करना पड़ रहा हो, ऐसी स्थिति काफी दारुण थी। नंगे पैर चलने से पैरों में घाव हो गया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए उनका मन विचलित हो रहा था। चलते चलते वह एक झील के पास पहुंचे जिसका जल बड़ा शीतल था। उन्होंने उस झील का पानी पिया। 

तभी उनकी निगाह एक गिलहरी पर पड़ी। वह अपनी पूंछ भिगोकर झील को सुखाने का प्रयास कर रही थी। महात्मा बुद्ध ने उस गिलहरी से बड़े प्रेम से पूछा, प्यारी गिलहरी! तुम क्या कर रही हो? उस गिलहरी ने जवाब दिया कि इस झील ने मेरे बच्चों को निगल लिया है, मैं इसको सुखाकर रहूंगी। बुद्ध ने कहा कि तुम्हारे पूंछ भिगोकर पानी बाहर छिड़कने से झील सूख जाएगी? गिलहरी ने कहा कि मेरे पास समय नहीं है। मैं यह प्रयास करती रहूंगी।

 बुद्ध ने कहा कि इस काम में कितना समय लगेगा, इसका तुम्हें भान है? इसमें तुम्हारा पूरा जीवन बीत जाएगा, लेकिन झील नहीं सूखेगी। गिलहरी ने कहा कि भले ही जीवन बीत जाए, लेकिन मैं यह काम करके ही रहूंगी। अपनी पीड़ा से व्यथित बुद्ध के हृदय तक गिलहरी की बात पहुंची। उन्होंने सोचा कि जब यह छोटी सी गिलहरी जीवन भर प्रयास करके इस विशाल झील को सुखाने को तत्पर है, तो मैं मनुष्य होकर इन कठिनाइयों से भागने की सोच रहा हूं। अब उनका आत्मविश्वास लौट आया था।

जिन्होंने बचपन संवारा, बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर

अशोक मिश्र

हरियाणा आज भी अपने बड़े बुजुर्गों के सम्मान की परंपरा के लिए देश में विख्यात है। यह प्रदेश तो बड़ों के आदर-सत्कार के लिए जाना जाता था। जहां ताऊ-चाचा के बिना कोई ब्याह नहीं होता था। जहां दादा के हुक्के के धुएं से ही घर की शाम बनती थी। वहीं आज गांवों में भी ताले लगे हुए घरों में अकेले रह रहे बुजुर्ग दिख जाते हैं। बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने की घटनाओं को पढ़ सुनकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं, लेकिन अफसोस कि ऐसी घटनाएं अब प्रदेश में एक खामोश सच्चाई बनती जा रही हैं। 

जिन हाथों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिन कंधों पर बैठकर मेले देखे, बाजार में घूमने गए, जिन आंखों ने बुखार में रात-रात भर जागकर इंतजार किया, वही हाथ, वही कंधे, वही आंखें आज एक कमरे के कोने में सामान की तरह अकेली छोड़ दी जा रही है। यह सिर्फ  किसी एक परिवार की कहानी नहीं है, यह पूरे समाज की विडंबना है। कहने को तो लोग तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए, लेकिन वही लोग संवेदना की सीढ़ियां उतरते गए हैं, यह कटु सत्य है। प्रदेश में दिनोंदिन नए खुलते वृद्धाश्रम और उनमें बढ़ती बुजुर्गों की संख्या का सबसे बड़ा कारण एकल परिवार का सपना है जिसे लोगों ने आधुनिकता समझ लिया है। 

हरियाणा में वृद्धाश्रम  अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहे, ग्रामीण इलाकों और जिला मुख्यालयों के आसपास ऐसे आश्रमों की संख्या चुपचाप बढ़ रही है। प्रदेश में पहले घर आंगन होता था जिसमें दादा-दादी कहानियां होते थे, संस्कार होते थे। अब घर एक फ्लैट बन गया है, जहां दो लोगों के बाद तीसरे की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती है। नौकरी, करियर, बच्चों की पढ़ाई और शहरों की भागदौड़ ने लोगों को इतना आत्मकेंद्रित बना दिया है कि बुजुर्गों की धीमी चाल उन्हें बोझ लगने लगी है। 

उनकी दवाइयों का समय, उनकी बार-बार की एक ही बात, उनका पुराने जमाने का टोकना-टाकना, यह सब भागदौड़ भरे जीवन के हिसाब से फिट नहीं बैठता है और इसका नतीजा यह होता है कि घर का बुजुर्ग वृद्धाश्रम में नजर आने लगता है। हरियाणा जैसे प्रदेश में यह बदलाव और भी ज्यादा चुभता है। सोच कर देखें। एक दिन वे लोग भी वहीं खड़े होंगे जिन्होंने अपने बुजुर्ग माता पिता को वृद्धाश्रम भेजा है। उनके भी घुटने जवाब दे चुके होंगे, आंखें भी धुंधली हो गई होंगी। तब उन्हें क्या चाहिए होगा? 

एक आलीशान कमरा या अपने बच्चों की आहट? जो बीज आज वह बो रहे हैं, वही कल उनकी फसल होगी। इस जटिल समस्या का समाधान कानून नहीं कर सकता है। लोगों के मन में बदलाव लाकर किया जा सकता है। मां-बाप को बोझ नहीं, घर की नींव समझना होगा। जैसे नींव दिखाई नहीं देती पर उसी पर पूरी इमारत टिकी होती है, वैसे ही बुजुर्ग दिखाई भले कम देते हों, पर उन्हीं के आशीर्वाद पर घर टिका होता है।

Friday, August 21, 2026

गण श्रेष्ठो! करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के समय में प्राचीन कोशल महाजनपद की राजधानी  श्रावस्ती थी। इसके राजा थे प्रसेनजित जिन्हें पाली भाषा में पसेनदी कहा जाता है। महात्मा बुद्ध और प्रसेनजित समवयस्क थे। एक बार की बात है। श्रावस्ती में अकाल पड़ा। कई वर्ष तक बरसात नहीं हुई। खेतों में फसल नहीं बोई जा सकी। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए। प्रजा भूख की वजह से त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही थी। 

राजा प्रसेनजित भी जितना हो सकता था, गरीब प्रजा के लिए उपाय कर रहे थे, लेकिन वह पर्याप्त नहीं था। उसी क्षेत्र में उन दिनों महात्मा बुद्ध भी थे। उन्होंने श्रावस्ती का हाल सुना, तो उनका मन करुणा से भर गया। वह श्रावस्ती पहुंचे तो नगर के धनिकों ने उनका प्रवचन सुनने के लिए एक आयोजन किया। महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस समय अकाल के कारण नरकंकाल जैसे दिखने वाले लोगों की सेवा करना ही सबसे बड़ा आवश्यक धर्म और कर्तव्य है। 

बुद्ध की वाणी सुनकर अकालग्रस्त लोगों में आशा का संचार हुआ कि शायद कोई मदद को आगे आए। धनिक और राजवंश के लोग भूखे प्यासे लोगों की मदद तो करना चाहते थे, लेकिन वह अपने धन में खर्च करना गंवारा नहीं था। उन्होंने बहाने बनाने शुरू कर दिए। लोगों की बात सुनकर बुद्ध को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां बैठी एक भिखारी की बेटी सुप्रिया ने कहा कि मैं अपनी शक्ति भर लोगों को भोजन कराने का दायित्व लेती हूं। 

लोगों ने पूछा, तुम ऐसा कैसे करोगी। सुप्रिया ने कहा कि मैं नगर के धनी और संपन्न परिवारों से मांगकर लाऊंगी और अकालग्रस्त लोगों को खिलाऊंगी। यह सुनकर बुद्ध ने कहा कि गण श्रेष्ठो! करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है। साधनहीनता किसी कार्य में बाधा नहीं बन सकती है। यह सुनकर धनिक शर्मसार हुए और उन्होंने सहायता का वचन दिया।

हरियाणा के युवाओं को चाहिए सिर्फ एक भरोसेमंद इकोसिस्टम


अशोक मिश्र

हरियाणा के औद्योगिक और तकनीकी विकास की आधारशिला जेन जी के कंधे पर ही टिकी है। हरियाणा की कुल आबादी का 26.6 प्रतिशत हिस्सा जेन जी है। राज्य की कुल आबादी लगभग तीन करोड़ के आसपास मानी जाती है। इस हिसाब से देखें, तो प्रदेश में लगभग 75 से 80 लाख युवा जेन जी वर्ग में आते हैं। इन्हीं में से वह उद्यमी निकल रहे हैं जो गुरुग्राम की साइबर सिटी से लेकर हिसार की कृषि यूनिवर्सिटी तक अपना बिजनेस खड़ा कर रहा है। इन युवाओं को सफलता का मंत्र देने के लिए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी आज गुरुग्राम यूनिवर्सिटी पधारेंगे। इनके साथ होंगे प्रदेश के नामी-गिरामी उद्यमी जो अपने अनुभवों से इन जेन जी इंटरप्रेन्योर को समृद्ध करेंगे। 

कार्यक्रम में छह मास्टर क्लास रूम स्थापित किए जाएंगे और इनके माध्यम से युवाओं को उद्यमी बनने की ट्रेनिंग दी जाएगी। डिपार्टमेंट फार प्रमोशन आफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 31 मार्च 2026 तक प्रदेश में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या 11,620 से अधिक हो चुकी थी, जिन्होंने सीधे तौर पर 1,39,600 से ज्यादा नौकरियां पैदा की हैं। 

कुछ महीने पहले तक यह आंकड़ा 8,800 से 9,500 के बीच बताया जा रहा था। हरियाणा में जेन जी इंटरप्रेन्योर का कारोबार अब करोड़ों से निकलकर अरबों डॉलर की वैल्यूएशन में गिना जाने लगा है। राज्य से 19 यूनिकॉर्न निकले हैं, यानी ऐसी कंपनियां जिनका मूल्यांकन एक अरब डॉलर से अधिक है। सैनी सरकार ने भी इन युवा उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए सौ करोड़ रुपये का आत्मनिर्भर स्टार्टअप वेंचर फंड, 50 करोड़ रुपये का को-इनवेस्टमेंट प्लान और 2025-26 के बजट में 20 हजार एकड़ में 10 नई औद्योगिक मॉडल टाउनशिप बनाने का ऐलान किया है। यह एक सकारात्मक कदम है जिसकी सराहना की जानी चाहिए। 

मुख्यमंत्री लगातार युवाओं से जॉब सीकर नहीं, जॉब क्रिएटर बनने का आह्वान कर रहे हैं। इसके लिए मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया जैसी योजनाओं का विस्तार किया जा रहा है। हरियाणा सरकार ने हाल ही में एआई मिशन, सेमीकंडक्टर पॉलिसी और एच-हब जैसे वर्ल्ड-क्लास इनक्यूबेटर की घोषणा की है। लेकिन आशंकाएं भी कम नहीं हैं। प्रदेश में 65 रोजगार कार्यालयों में 4.04 लाख बेरोजगार युवा पंजीकृत हैं। 2024 में 46 हजार से अधिक ग्रेजुएट युवाओं ने सफाई कर्मचारी की संविदा नौकरी के लिए आवेदन किया था। 

यह दर्शाता है कि उद्यमिता का रास्ता अभी सबके लिए आसान नहीं है। इसके बावजूद हरियाणा की कहानी अब बदल रही है। 80 लाख जेन जी में से यदि केवल एक प्रतिशत भी गंभीर उद्यमी बनता है तो प्रदेश को 80 हजार नए उद्यम मिल सकते हैं। अभी तो यह शुरुआत है। मुख्यमंत्री का आज का संवाद इसी कारण महत्वपूर्ण है कि सरकार सुनना चाहती है कि यह पीढ़ी नौकरी मांगना नहीं, नौकरी बांटना चाहती है। उसे चाहिए सिर्फ एक भरोसेमंद इकोसिस्टम।

Thursday, August 20, 2026

अर्थवसु! तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही निकले

बोधिवृक्ष

 अशोक मिश्र

राजगृह में रहने वाले अर्थवसु बहुत ही धनी थे। उनका व्यापार बहुत दूर-दूर तक फैला हुआ था। वह बहुत ही कृपण व्यक्ति माने जाते थे। उन्हें किसी ने कभी किसी को दान करते हुए नहीं देखा था। एक दिन पुत्र विडाल ने घर आकर अपने पिता अर्थवसु से उलाहना दिया। विडाल ने कहा, तात! हमारे विद्यालय के सहपाठी कहते हैं कि तुम इतने साधारण वस्त्र पहनते हो, तुम्हें अर्थवसु का पुत्र कौन कहेगा। राजगृह के सबसे धनी व्यापारी का पुत्र इतने साधारण वस्त्र पहनता है। आर्य हमारी महत्वाकांक्षाओं का अनादर क्यों करते हैं। 


तभी ज्येष्ठ पुत्र-वधु तिर्यग आ पहुंची। उसने कहा कि विडाल सच कहते हैं आर्य श्रेष्ठ। आज सावित्री वट पूजा के समय ग्राम्य ललनाओं ने मुझसे जो बात कही, उसको सुनकर मेरा अंत:करण रो रहा है। तुम्हारे श्वसुर इतने धनाढ्य हैं कि वह तुम्हें नख शिख स्वर्णाभूषणों से लाद सकते हैं, लेकिन सावित्री पूजा के समय भी तुम्हें वस्त्र सामान्य युवती की ही तरह हैं। अर्थवसु अपने पुत्र और पुत्र-वधु की बात सुनकर भी चुप रहे। 


कुछ वर्ष बीते। वर्षा ने तो जैसे राजगृह से मुंह मोड़ लिया। अकाल पड़ गया। अर्थवसु ने इस संकट में अपने अनाज गृह और कोष का मुंह खोल दिया। जब तक वर्ष नहीं हुई, राजगृह में अर्थवसु ने किसी को भूखा नहीं सोने दिया। लोग आश्चर्यचकित हो उठे। महात्मा बुद्ध ने यह सुना तो वह गदगद हो उठे। वह अर्थवसु के दर्शन को लालायित हो उठे।


 बुद्ध जब वहां पहुंचे, तो तिर्यग ने अपने वृद्ध श्वसुर को आवाज दी, आर्य श्रेष्ठ, उठिए। तथागत आज आपके द्वार पर आए हैं। अर्थवसु ने अपनी आंखें खोली। तथागत की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि अर्थवसु! तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही निकले। तुमने सारे राजगृह की रक्षा की। यह सुनकर अर्थवसु की बूढ़ी आंखों में चमक आई और उसकी आत्मा ने शरीर त्याग दिया।