बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
भारत में वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या यह बताने के लिए पर्याप्त है कि एकल परिवार में बुजुर्गों की स्थिति काफी दयनीय होती जा रही है। पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे, तो परिवार के बुजुर्ग सदस्यों का मान-सम्मान भी बना रहता था और उनकी बुढ़ापे में देखभाल भी अच्छी तरह से होती रहती थी। परिवार में अच्छा खासा दखल भी उनका बना रहता था, लेकिन एकल परिवार के चलन ने सब कुछ स्वाहा कर दिया है।मेरे एक मित्र दीनदयाल हैं। हमारी काफी पुरानी मित्रता है। वह जीवन भर एक सरकारी नौकरी की बदौलत अपना जीवन यापन करते रहे। कभी किसी से दो पैसे लेना भी गंवारा नहीं किया। हालांकि चाहते तो काफी कुछ कमा सकते थे। पांच-छह साल पहले मेरी मुलाकात लखनऊ में दीनदयाल से हुई। रिटायरमेंट का कुछ ही समय बचा था। पूछने पर उन्होंने बताया कि उनकी बेटियों की शादी अच्छे खाते-पीते परिवार में हो गई है।
एक बेटा अमेरिका में नौकरी करता है, वहीं उसने अमेरिकन लड़की से विवाह कर लिया है। चार-पांच साल में एकाध दिन के लिए आता है। दूसरा बेटा भी सरकारी नौकरी में है और वह दूसरे शहर में अपने परिवार के साथ रहता है। उनकी पत्नी की मृत्यु काफी पहले हो गई थी।
एक साल पहले जब लखनऊ गया, तो उनसे मुलाकात हुई। दीनदयाल काफी कमजोर नजर आ रहा था। पूछने पर उसने एक गली की ओर इशारा किया और बताया कि वहां रहता है। दो महीने पहले लखनऊ गया, तो दीन दयाल से मिलने की इच्छा हुई। पूछते-पूछते वहां पहुंचा, तो पता लगा कि जहां दीनदयाल रहता है, वह एक वृद्धाश्रम है। पिछले कई साल से दीनदयाल वहीं रह रहा है, जबकि उसका एक बेटा लखनऊ में ही तबादला करवाकर रह रहा है। सोचता हूं, जिसने बच्चों के पालन-पोषण में सारी जिंदगी खपा दी, वही बच्चे अपने पिता को नहीं पाल पा रहे हैं।