बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
मगध के राजा बिंबसार का पूरा महल सजाया गया था। नगर का हर नागरिक महात्मा बुद्ध के दर्शन के लिए उत्साहित था। तथागत ने महाराज के अतिथि गृह की जगह बेलवन में रहना चुना था। महाराज बिंबसार भी अपनी सजधज के साथ तैयार हो चुके थे। नगर, महल और स्वयं राजा की सजधज के सामने राज्याभिषेक के समय हुई सजावट फीकी पड़ रही थी। महाराज अपने महल से निकल कर महारानी क्षेमा के रंग महल में पहुंचे।उन्होंने देखा कि महारानी क्षेमा अपने अंत:पुर के स्वाध्याय कक्ष में अन्यमनस्क सी लेटी आचार्य धर्मपाल का जीवन दर्शन पढ़ रही थीं। महाराज बिंबसार ने उन्हें अभी तैयार हुआ नहीं देखा, तो बोल पड़े, प्रियतमे! अभी तुम तैयार नहीं हुई? जिसके स्वागत को सारा नगर उमड़ पड़ा है, उसके स्वागत के लिए तुम अभी तक तैयार नहीं हो। क्षेमा सांगल नरेश की राज कन्या थी।
सांगल नरेश महात्मा बुद्ध के परमप्रिय शिष्यों में से एक थे। महारानी क्षेमा का बुद्ध के प्रति यह उपेक्षा का भाव सम्राट बिंबसार को चकित कर रहा था। क्षेमा ने उपेक्षा भाव से करवट लेते हुए कहा कि बुद्ध के सामने जाने से क्या लाभ है। वह यही कहेंगे कि यह संसार मिथ्या है। संसार का सौंदर्य मिथ्या है। ऐसी स्थिति में हम सांसारिक जीव उनके सामने जाकर क्या करेंगे।
महारानी को अपने सौंदर्य पर अत्यधिक अभिमान था। संयोग से इसी समय उन्हें झपकी आ गई। झपकी के दौरान ही उन्होंने देखा कि बुद्ध को एक अत्यंत रूपसी अप्सरा चंवर डुला रही है। उन्होंने एक ही पल में अप्सरा का बचपन, जवानी और बुढ़ापा तीनों देखा।
बुढ़ापे में धंसी आंखें, सफेद केश, जर्जर काया देखकर वह कांप उठी। क्षेमा की नींद टूट गई। वह यह देखकर कांप उठी। उसके सौंदर्य का अभिमान चकनाचूर हो गया। क्षेमा दूसरे क्षण बुद्ध के चरणों में पड़ी क्षमा के साथ आत्मोद्धार का मार्ग पूछ रही थी। बुद्ध बोले, बेटी क्षेम, पहले वाह्य सौंदर्य से बाहर तो निकलो। आत्मोद्धार का मार्ग अवश्य मिलेगा।
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