बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
घटना बहुत पुरानी है। इतनी पुरानी कि इस घटना का संबंध महात्मा बुद्ध से है। यह घटना उस समय घटी थी, जब उरुबल में महात्मा बुद्ध एक जंगल के भीतर हिस्से में तपस्यारत थे। कथा यह है कि उरुबल के ही कुछ धनी लोगों ने वन विहार का कार्यक्रम बनाया। सभी धनिक युवा थे। वन विहार का उद्देश्य मनोरंजन करना था।कुछ लोगों ने मनोरंजन के लिए गणिकाओं (वेश्या) की भी व्यवस्था की थी। इन धनिकों में से कुछ लोग अपनी पत्नी को भी वन विहार के लिए साथ लाए थे। वन विहार के दौरान सबने मदिरापान किया। आमोद प्रमोद के बीच में एक वेश्या को मौका लगा, तो उसने धनिकों के स्वर्ण आभूषण और मुद्राएं बटोरी और लेकर भाग खड़ी हुई। जब धनिकों को होश आया, तो वह परेशान हो उठे। वह उस गणिका की खोज में जंगल की ओर दौड़े। साथ में वह गणिका को कोसत हुए भी जा रहे थे।
जब वह जंगल के लगभग बीच में पहुंचे, तो उन्हें वातावरण में शांति से महसूस हुई। उनके चित्त को भी शांति का अनुभव हुआ। उन्होंने देखा कि एक कृशकाय व्यक्ति ध्यान की मुद्रा में बैठा हुआ है। उसके चेहरे पर कांति विराजमान है। उनके शीश अपने आप झुकते चले गए। उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि आपने किसी को इधर से भागते देखा है? वह व्यक्ति महात्मा बुद्ध थे। बुद्ध ने कहा कि आपको और अपने सिवा किसी को नहीं देखा। तब उन्होंने बुद्ध को सारी बात बताई।
बुद्ध ने कहा कि वन विहार किसलिए? यह तो विषय भोग है, इसमें सुख कहां है। शाश्वत आनंद तो शाश्वत सत्य से ही मिलेगा। यदि तुम शाश्वत सत्य की खोज करो, तो तुम्हें स्वर्ण आभूषण के चोरी हो जाने का दुख नहीं होगा। यह सुनकर उन धनिकों को अपने कृत्य पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने बुद्ध से कहा कि वह उन्हें प्रवज्या देने का अनुरोध किया।
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