Thursday, August 6, 2026

दूध-दही का खाणा, यो सै म्हारा हरियाणा कहावत हो रही विफल


अशोक मिश्र

हरियाणा में खान-पान की एक समृद्ध परंपरा रही है। इसका कारण यह माना जाता है कि हरियाणा की धरती सदैव हरी-भरी रही है। यह पशुओं के लिए आवश्यक पौष्टिक चारा और उनके जीवन के लिए अनुकूल पर्यावरण सदैव से मौजूद रहा है। यही वजह है कि राज्य के लोग  दूध-दही और उसके अन्य उत्पादों को खाने-पीने के काफी शौकीन रहे हैं। हरियाणा के लोग अपने खान-पान के बारे में जब भी बातचीत करते हैं, तो बड़े गर्व से कहते हैं कि दूध-दही का खाणा, यो सै म्हारा हरियाणा। 

लेकिन आज यह गर्वोक्ति फीकी पड़ रही है। राज्य के पोषण पुनर्वास केंद्रों में दिनोंदिन कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। फरीदाबाद के ही कुपोषण पुनर्वास केंद्र में ही रोज कोई न कोई बच्चा भर्ती किया जा रहा है। लगभग सभी जिलों में कमोबेश यही स्थिति है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के पोषण ट्रैकर पोर्टल की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, जब 13.82 लाख बच्चों की जांच की गई तो करीब 35 फीसदी बच्चे कुपोषित मिले। इनमें 22 फीसदी बौनापन, सात फीसदी कम वजन, करीब तीन फीसदी कमजोर और तीन फीसदी अत्यधिक वजन यानी मोटापे के शिकार पाए गए। 

इन बच्चों के इलाज के लिए बने पोषण पुनर्वास केंद्रों पर भी दबाव बढ़ रहा है। हरियाणा में खाने-पीने की कोई कमी नहीं है। यहां सभी तरह के अनाज, फल और सब्जियां उगाई जाती हैं। यह पड़ोसी राज्यों में भी बिकने के लिए भेजी जाती हैं। दरअसल, हरियाणा में बढ़ते कुपोषण का सबसे बड़ा कारण जानकारी का अभाव है। पालन-पोषण के दौरान बरती गई लापरवाही है। राज्य के ज्यादातर अभिभावक डेढ़ से दो साल तक अपने बच्चों को सिर्फ  दूध पिलाते रहते हैं। इसके अलावा कोई खाद्यान्न नहीं देते हैं। जबकि छह महीने के बाद बच्चे के लिए दूध पूर्ण आहार नहीं रह जाता है। बच्चे को दाल, खिचड़ी, बारीक की हुई सब्जियां, केला, आलू जैसे पूरक आहार देना भी बहुत जरूरी होता है। 

यह बच्चे को कुपोषण से बचाता है। बच्चों में कुपोषण का एक और कारण है, गर्भवती महिला का एनीमिया से पीड़ित होना। खून की कमी की वजह से गर्भस्थ शिशु को पैदा होने से पहले ही भरपूर पोषण नहीं मिल पाता है। इसकी वजह से जब वह पैदा होता है, तो उसका वजन मानक से बहुत कम होता है। गर्भावस्था के दौरान माताओं में खून की कमी और असंतुलित खानपान भी कुपोषण को बढ़ा रहे हैं। इससे निपटने के लिए प्रदेश में 25,962 आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए 23,447 कार्यकर्ता काम कर रही हैं, 149 प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं। दूध उपहार योजना के तहत एक से छह साल के बच्चों के साथ गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को खीर, प्रोटीन मिल्क बार और स्किम्ड मिल्क पाउडर दिया जा रहा है। राज्य सरकार कुपोषण दूर करने का भरसक प्रयास कर रही है, लेकिन लोगों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है।

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