बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
एक थी पट्टाचारा। बहुत ही सुंदर और चतुर पट्टाचारा को किशोरावस्था में ही पड़ोस के एक युवक से प्रेम हो गया। माता-पिता का ज्ञात हुआ, तो उन्होंने बहुत रोका-टोका, समझाया, लेकिन पट्टाचारा नहीं मानी। वह अपने प्रेमी से विवाह पर अड़ी रही। एक दिन रात्रि में वह अपने प्रेमी के साथ घर से निकल पड़ी। दोनों ने दूसरे नगर में जाकर अपनी गृहस्थी बसाई। दो साल बात पट्टाचारा गर्भवती हो गई। उसने अपने पति से कहा कि दोनों अपने नगर लौट चलते हैं। पति ने कहा, वहां जाने पर केवल अपमान ही मिलेगा।इस तरह दो साल और बीत गए। एक बार फिर पट्टाचारा को गर्भ ठहरा, तो उसने समय नजदीक आने पर पति से एक बार फिर पितृगृह चलने का अनुरोध किया। इस बार पति भी मान गया। दोनों अपने शहर की ओर चल पड़े। रास्ता लंबा था और मार्ग में एक घना बीहड़ जंगल था। दोनों अपने बच्चे के साथ एक पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे कि तभी पट्टाचारा को प्रसव वेदना शुरू हो गई।
इस बार भी बेटा जन्मा। उस समय आग की जरूरत पड़ी, तो पति लकड़ियां बीनने गया, तो उसे सर्प ने डस लिया। मजबूरन पति की लाश को नदी में बहाया और दोनों बच्चों के साथ नदी पार करने लगी। वह दोनों बच्चों को एक साथ नदी पार नहीं करा सकती थी, तो वह नवजात बच्चे को लेकर उस पार गई और उसे एक जगह पत्तों से ढककर बड़े बेटे के पास आने लगी। तभी उनका बड़ा बेटा नदी में बह गया और नवजात बच्चे को सियार लेकर भाग गया। जब वह मायके पहुंची, तो पता चला कि उसके माता-पिता की मौत हो चुकी है। उसके भाई की मौत भी उसी दिन हुई थी। सास ससुर भी बूढ़े हो चुके थे।
इस दुख में वह पागल हो गई। कुछ लोग उसे लेकर महात्मा बुद्ध के पास पहुंचे। बुद्ध ने कहा, शुभे! तुम अधीर क्यों होती हो? एक दिन मरना सबको है और अकेले ही मरना है। आश्रम में कुछ दिन रहने के बाद पट्टाचारा का मन स्थिर हुआ, तो बुद्ध उसे भिक्षुणी बना लिया।
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