बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महाराजा रणजीत सिंह जितना अपनी बहादुरी और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे, उतना ही वह साहित्य और कला प्रेम के लिए जाने जाते थे। उन्हें शेर-ए-पंजाब कहा जाता था क्योंकि उन्होंने अपने राज्य का विस्तार लाहौर और अमृतसर से लेकर पेशावर, कश्मीर और मुल्तान तक कर लिया था। उनको अपने समय में सबसे धर्म निरपेक्ष शासक माना जाता था। उनके दरबार में हिंदू, सिख और मुसलमान को ऊंचे पद हासिल हुए थे।उन्होंने अपने राज्य का काफी शक्तिशाली और समृद्ध बनाया था। उन्होंने अपने शासनकाल में किसी को भी मृत्युदंड नहीं दिया था, ऐसा कहा जाता है। एक बार की बात है। वह दरबार में बैठे थे कि तभी एक मसखरा आया और उसने महाराजा रणजीत सिंह को कई हास्य प्रसंग सुनाए। महाराजा काफी प्रसन्न हो गए। उन्होंने उस मसखरे से प्रसन्न होकर अपना सबसे प्रिय हाथी उसे उपहार में दे दिया। हाथी पर बैठकर मसखरा अपने घर रवाना हुआ।
अब उसके पास समस्या थी कि वह हाथी को खिलाए कैसे? हाथी कोई थोड़ा सा तो खाता नहीं है। वह था तो एक गरीब मसखरा ही। उसने हाथी के गले में एक ढोल बांध दिया और छोड़ दिया। हाथी भटकता हुआ महाराजा के फीलखाने में पहुंच गया। लोगों ने यह बात महाराजा तक पहुंचाई। यह सुनकर रणजीत सिंह को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने मसखरे को बुलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपना हाथी दिया और तुमने इसकी यह दुर्दशा कर दी।
मसखरे ने हाथ जोड़कर कहा कि महाराज! आप जानते हैं कि मैं कितना गरीब हंू। मैं ढोल बजाकर अपना पेट पालता हूं। मैंने इसके गले में ढोल बांध दिया ताकि यह भी ढोल बजाकर अपना पेट भर ले। यह बात सुनकर महाराजा रणजीत सिंह बहुत हंसी आई और अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने बहुत सारा धन देकर मसखरे को रवाना कर दिया।
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