बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती आज एक जिला है। पहले वह बहराइच जिले का ही एक अंग था। श्रावस्ती देश की एक प्राचीन नगरी है। यहां कई प्रतापी राजाओं ने राज्य किया था। कहते हैं कि श्रीराम के पुत्र कुश ने श्रावस्ती नगरी बसाई थी। इस बात की सत्यता तो इतिहासकार और पुरातत्वविद ही कर सकते हैं। बात उस समय की है, जब महात्मा बुद्ध श्रावस्ती में चौमासा बिताने के लिए आया करते थे।तथागत वर्षाकाल में किसी स्थान पर ठहर जाया करते थे, बाकी महीनों में वह भ्रमण किया करते थे। एक दिन महात्मा बुद्ध सघन एकांत में बने एक संघाराम में विश्राम कर रहे थे। तभी एक भिक्षु ने आकर महात्मा बुद्ध से निवेदन किया-भगवन! सम्राट चंद्रचूड आपके दर्शन करना चाहते हैं। वह समाज में फैले विभिन्न प्रकार के मत-मतांतर की वजह से धर्म को लेकर विभ्रमित हो रहे हैं।
वह आपसे उसका समाधान चाहते हैं। यह सुनकर बुद्ध ने कहा कि तात! चंद्रचूड एक महान धर्मात्मा सम्राट हैं। उनको तत्काल यहां लाओ। थोड़ी देर बाद चंद्रचूड आकर एक सामान्य व्यक्ति की तरह एक किनारे बैठ गए। महात्मा बुद्ध ने उनका कुशल क्षेम पूछा और उनके ठहरने की व्यवस्था कर दी। अगले दिन सम्राट चंद्रचूड ने देखा कि कुछ दृष्टिविहीन लोगों के बीच एक हाथी खड़ा है और बुद्ध के निर्देश पर सब हाथी को स्पर्श कर रहे हैं।
बुद्ध ने उन दृष्टिबाधित लोगों से हाथी के बारे में पूछा, तो जिसने जो अंग छुआ था, हाथी को वैसा ही बताया। यह देखकर चंद्रचूड हंस पड़े। तब बुद्ध ने कहा कि सम्राट! यह विभिन्न प्रकार के मत-मतांतर का समन्वय ही धर्म है। इसलिए आपको इन मत-मतांतरों के चलते भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। धर्म का सनातन स्वरूप भी ऐसा ही है। यह सुनकर चंद्रचूड संतुष्ट हुए और राज्य को लौट गए।
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