अशोक मिश्र
यह हरियाणा के लिए ही नहीं, पूरे उत्तर भारत के लिए गंभीर चेतावनी है कि अब चार-पांच साल की मासूम बच्चियों को पीरियड्स आने लगे हैं और पांच-छह साल के लड़कों को दाढ़ी मूंछ के लक्षण उभरने लगे हैं। यह कोई चिकित्सा संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरी चेतावनी है। इसे चिकित्सा विज्ञान में प्रिकॉशियस प्यूबर्टी यानी असामयिक यौवन कहा जाता है। पीजीआई रोहतक के पीडियाट्रिक एंडो क्रायनोलॉजी विभाग में बच्चों को विशेष टीके लगाकर हार्मोन की गति को नियंत्रित किया जा रहा है। विभाग में हर महीने करीब छह नए बच्चे अपना इलाज कराने के लिए पहुंच रहे हैं।देश भर के पीडियाट्रिक एंडोक्राइन सेंटरों के आंकड़ों के अनुसार कोविड काल में इस तरह के मामलों में तीन गुना तक बढ़ोतरी देखी गई है, जहां पहले 4208 बच्चों में से 59 में ऐसे लक्षण थे, वहीं कोविड के दौरान 3053 में से 155 बच्चों में समय से पहले यौवन के लक्षण मिले। हरियाणा भी इस राष्ट्रीय प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। यहां के शहरी जिलों जैसे गुड़गांव, फरीदाबाद, पानीपत में बाल रोग विशेषज्ञों के पास ऐसे केस लगातार आ रहे हैं। इसका असर केवल शारीरिक नहीं है। छोटी उम्र में हार्मोनल बदलाव से बच्चों की हड्डियों की ग्रोथ प्लेट जल्दी बंद हो जाती है जिससे उनकी अंतिम लंबाई कम रह जाती है।
साथ ही मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन, समाज से कटाव और बचपन छिनने जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी आती हैं। यह समय है कि हम इसे सामान्य समझकर अनदेखा न करें। समय से पहले बच्चों में यौवन के लक्षणों का प्रकट होने का सबसे बड़ा कारण बच्चों में बढ़ता मोटापा है। शोध बताते हैं कि हाई-फैट डाइट और बढ़ा हुआ बीएमआई लड़कियों में असामयिक यौवन का सबसे महत्वपूर्ण रिस्क फैक्टर है। हरियाणा में खान-पान की परंपरा में घी-दूध का अधिक उपयोग होता है।
साथ ही आजकल बाजार में मिलने वाला पशुओं से प्राप्त दूध जिसमें दूध बढ़ाने के लिए हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं, यह लड़कियों में हार्मोनल गड़बड़ी पैदा कर रहा है। कई शोधों में पाया गया है कि तीन से सात साल तक के बच्चों को अधिक एनिमल फैट खिलाने से हार्मोनल असंतुलन और जल्दी प्यूबर्टी का खतरा बढ़ जाता है। हरियाणा के खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, प्लास्टिक की बोतलों में गर्म दूध या पानी पीना, सैनिटाइजर और कॉस्मेटिक्स का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों में यह लक्षण दिखने के प्रमुख कारण हैं।
यह सब बच्चों के नाजुक अंत:स्रावी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। यही नहीं, जीवनशैली में बदलाव, देर रात तक जागना, नींद की कमी, दिन भर स्क्रीन पर रहना, शारीरिक गतिविधि का अभाव भी बच्चों को जल्द युवा बना रहा है। यदि किसी भी मासूम बच्चे में हार्मोनल गड़बड़ी के संकेत मिलें, तो तुरंत चिकित्सक के पास जाकर इलाज कराएं।
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