बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
विशाखा को मिगारमाता भी कहा जाता है। वह श्रावस्ती के सबसे धनी व्यापारी मिगारा की पुत्रवधू थी। विशाखा साकेत (अयोध्या) के एक धनी व्यापारी की पुत्री थी और उसका विवाह मिगारा के पुत्र पुन्नवद्धन के साथ हुआ था। एक बार की बात है। मिगारा के दरवाजे पर एक भिक्षुक आया। भिक्षाम देहि की आवाज सुनकर विशाखा द्वार पर आई और जोर से कहा कि भोजन बासी है। जब ताजा होगा, तब आना। विशाखा अपने पितृगृह में रहते हुए ही महात्मा बुद्ध से प्रभावित थी।विशाखा की बात सुनकर मिगारा ने कहा कि यह क्या कह रही हो? भोजन तो ताजा बना है। तब विशाखा ने कहा कि पिता जी, आज हम सब जो कुछ भी खा रहे हैं, ऐश्वर्य का भोग कर रहे हैं, वह तो पूर्व जन्मों का प्रतिफल है। इस जन्म में आपने कोई पुण्य तो कमाया नहीं है। इसलिए भोजन बासी हुआ न। बात मिगारा के समझ में आ गई। तब उसने अपनी पुत्रवधू को माता का दर्जा दिया और तब से वह मिगारमाता के नाम से प्रसिद्ध हुई।
बाद में मिगारा ने भी बौद्ध धर्म अपना लिया। एक बार जब महात्मा बुद्ध श्रावस्ती आए, तो वह मिगारमाता के पूर्णाराम में विश्राम कर रहे थे। निरंतर यात्रा की वजह से वह कुछ थकान महसूस कर रहे थे। विशाखा तथागत के साथ धर्म चर्चा करना चाहती थी, लेकिन किसी कारणवश वह ऐसा नहीं कर पा रही थी। अपनी समस्या के निवारण के लिए वह राजा प्रसेनजित के महल भी गई, लेकिन उसका काम करने से प्रसेनजित ने भी टाल दिया। वह चिलचिलाती धूप में लौटी और बुद्ध को प्रणाम कर खिन्न बदन बैठ गई।
बुद्ध ने कहा कि विशाखे! इसलिए कहता हूं कि आकांक्षाओं को कम से कम रखना चाहिए। विशाखा ने कहा कि भगवन! कोई ऐसा उपाय है जिससे आकांक्षाओं को कम किया जा सके। बुद्ध बोले, अपने भीतर ही सुख की तलाश करो, तो बाहरी इच्छाएं निस्सार प्रतीत होने लगेंगी। यह सुनकर विशाखा की उदासी दूर हो गई।
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