बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
बात लगभग ढाई हजार साल पहले की है। शाक्य नरेशों की राजधानी कपिलवस्तु के राजमार्ग पर एक रथ दौड़ता हुआ चला जा रहा था। उस रथ पर राजकुमार गौतम विराजमान थे। युवा हो जाने के बाद शायद पहली बार राजकुमार सिद्धार्थ राजमहल से बाहर निकले थे। अब तक राजमहल से बाहरी दुनिया उनके लिए अपरिचित थी। उनके पिता को किसी ज्योतिषी ने बताया था कि आपका पुत्र चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर महान संन्यासी। पुत्र संन्यासी न बने, इसके लिए आमोद-प्रमोद की सारी व्यवस्थाएं की गई थीं।उस युग की सबसे सुंदर स्त्री यशोधरा से उसका विवाह हुआ था। एक दिन राजकुमार सिद्धार्थ नगर भ्रमण की जिद कर बैठे, तो पिता शुद्धोधन को अनुमति देनी पड़ी। कुछ दूर जाने पर राजकुमार गौतम ने देखा कि एक व्यक्ति एकदम जर्जर अवस्था में झुकी कमर के साथ लकड़ी से टेकता हुआ चला जा रहा है। वह लोगों से रोटी मांग रहा था, लेकिन शरारती लड़के उसे ढेले मार रहे थे।
राजकुमार ने सारथी से पूछा, तो उसने बताया कि एक दिन सबको जरावस्था से गुजरना पड़ेगा। इससे कोई बच नहीं सकता है। आगे जाने पर उन्होंने एक शव को जाते देखा। पूछने पर सारथी ने बताया कि एक दिन सबको मरना है। इससे मुक्ति संभव नहीं है। कुछ दूर चलने पर उन्होंने एक गर्भवती स्त्री को अशक्त देखा, तो उन्होंने कारण पूछा।
सारथी ने बताया कि बीमारी की वजह से यह महिला अशक्त हो गई है। इन बातों का राजकुमार गौतम पर बहुत प्रभाव पड़ा। एक दिन आधी रात में अपना सब कुछ छोड़कर गौतम संन्यासी बनने के लिए निकल पड़े ताकि दुनिया को रोग-शोक से मुक्ति का मार्ग तलाश सकें। यह मानव कल्याण के लिए अपने सुखों का अप्रतिम त्याग था।
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