Wednesday, August 12, 2026

दुखी जनों की सेवा से होगा आत्म कल्याण

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध को आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद उन्होंने प्रथम धर्म चक्र प्रवर्तन में जिज्ञासुओं को आत्म कल्याण मार्ग पर चलने को प्रेरित किया। नतीजा यह हुआ कि हजारों लोग ‘धर्मं शरणं गच्छामि’ का उद्घोष करते हुए आगे आए और इस तरह भिक्षु संघ का निर्माण हुआ। इस संघ में रहने वाले लोग भिक्षु कहे जाने लगे। मानव कल्याण ही इन भिक्षुओं का परम ध्येय था। महात्मा बुद्ध प्रत्येक भिक्षु का ध्यान रखते थे। तथागत के प्रिय शिष्यों में भदंत आनंद थे जो काफी विद्वान और ऊर्जावान थे। 

वह ज्यादातर बुद्ध के साथ ही रहते थे। एक दिन महात्मा बुद्ध ने एक भिक्षुक के बारे में पूछा कि वह आज नहीं दिखाई दिया। भदंत आनंद ने उत्तर दिया, भंते! वह अतिसार से पीड़ित है। इस वजह से वह आज दिखाई नहीं दिया है। महात्मा बुद्ध ने कहा कि चलो, उससे देख आएं। 

यह कहकर तथागत अपने शिष्य भदंत आनंद के साथ उस भिक्षुक की कुटिया में पहुंचे। कुटिया में पहुंचने पर बुद्ध ने देखा कि वह अपने ही मल-मूत्र में लिपटा हुआ पड़ा है। बुद्ध ने उससे पूछा कि तुम्हें क्या हुआ है? उस भिक्षुक ने बताया कि भगवन! मैं अतिसार से पीड़ित हूं। बुद्ध ने पूछा कि तुम्हारी सेवा करने कोई क्यों नहीं आया? उस भिक्षुक ने कहा कि सभी आत्म कल्याण की साधना में लगे हुए हैं। ऐसा वे कहते हैं। 

बुद्ध ने आनंद से घड़े में जल मंगाया और उस भिक्षुक का शरीर धोया। उसके मल-मूत्र को साफ किया। शाम को उन्होंने सभी भिक्षुओं को एकत्रित करके कहा कि तप साधना करने से मोक्ष या आत्म कल्याण की प्राप्ति होगी या नहीं, यह मैं नहीं जानता हूं। सच्चे हृदय से दुखी जनों की सेवा करने से आत्म कल्याण की प्राप्ति जरूर होगी। एक भिक्षुक के बीमार होने और किसी के उसकी सेवा न करने का प्रसंग जानकर सभी भिक्षुक लज्जित हो उठे।

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