अशोक मिश्र
सदियों पहले हरियाणा को हरित प्रदेश कहा जाता था क्योंकि यहां की नदियां और जमीन जल से परिपूर्ण थे। पिछले चार-पांच दशक में लोगों ने नदी और जमीन के पानी का इतना शोषण किया कि आज यह राज्य जल संकट से जूझ रहा है। इस जलसंकट को दूर करने के लिए 16 जून को छह राज्यों हिमाचल, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने मिलकर किशाऊ बांध बनाने की परियोजना पर सहमति जताई थी। किशाऊ बांध परियोजना के चलते आने वाले कुछ वर्षों में हरियाणा का जल संकट खत्म होने के आसार बनने लगे हैं। समझौते के तहत हरियाणा ने बिजली की जगह पानी को प्राथमिकता दी है और उसे कुल उपलब्ध जल का 47.82 प्रतिशत मिलेगा।
आंकड़ों में यह हिस्सा 1324 एमसीएम में से 836 क्यूसेक है, जो पीने और सिंचाई दोनों के लिए अतिरिक्त होगा। किशाऊ बांध परियोजना केवल एक बांध का निर्माण नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जल संकट के स्थायी समाधान की एक बड़ी राष्ट्रीय परिकल्पना है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने किशाऊ बांध परियोजना को लेकर डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की है। इस परियोजना पर लगभग 15 हजार करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है जिसमें से 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाएगी और बाकी दस प्रतिशत छह राज्यों को खर्च करना होगा।
हरियाणा के बाद उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान प्रमुख लाभार्थी हैं। दिल्ली को इस परियोजना से यमुना में शुद्ध जल प्रवाह बढ़ने से पेयजल आपूर्ति और प्रदूषण से निपटने में मदद मिलेगी, जबकि राजस्थान के शेखावाटी जैसे डार्क जोन को पाइपलाइन से पानी पहुंचाने की योजना है। केंद्र के अनुसार इस जल से निचले राज्यों के डाउनस्ट्रीम प्रोजेक्ट्स में भी विद्युत उत्पादन बढ़ने की संभावना है। यह परियोजना हिमालयी क्षेत्र में बन रही है, जहां पर्यावरणीय और मानवीय लागत सबसे अधिक है।
हिमाचल सरकार स्वयं कह चुकी है कि विस्थापन के मामले में वही सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। रिपोर्टों के अनुसार हिमाचल और उत्तराखंड के कई गांवों के निवासी 660 मेगावाट के इस बांध का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनके घर, कृषि भूमि और वन क्षेत्र जलमग्न होंगे। बांध की वजह से वनों का विनाश होगा और पारंपरिक आजीविका, सांस्कृतिक धरोहर के उजड़ने का खतरा है। परियोजना की लागत पहले ही लगभग 12 हजार करोड़ आंकी गई है और यह 1960 के दशक से प्रस्तावित होने के बावजूद पर्यावरणीय मंजूरी और अंतर-राज्यीय खिंचाव के कारण लटकी रही है।
236 मीटर ऊंचे बांध के लिए यह क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील भी माना जाता है। यदि पुनर्वास, वन संरक्षण और पारदर्शी लागत साझाकरण को ईमानदारी से लागू किया गया, तो हरियाणा की प्यास, दिल्ली की पेयजल किल्लत और राजस्थान की सूखी नहरों को राहत मिलेगी और यमुना को नया जीवन मिलेगा।
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