Tuesday, August 18, 2026

हरियाणा के किसी जिले में भूजल की गुणवत्ता उत्तम श्रेणी में नहीं

अशोक मिश्र

हरियाणा में जल स्तर का लगातार नीचे जाना ही चिंताजनक नहीं है, बल्कि भूजल की गुणवत्ता भी अब डराने लगी है। राज्य की धरती के नीचे पानी का भंडार जितना भरता है, उससे कहीं ज्यादा निकाला जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार हरियाणा में सालाना भूजल पुनर्भरण 10.27 बीसीएम आंका गया है जबकि दोहन 12.72 बीसीएम तक पहुंच चुका है यानी राज्य अपने भूजल संसाधन का करीब 137 प्रतिशत उपयोग कर रहा है। यह गिरावट पूरे प्रदेश में एक जैसी नहीं है लेकिन 14 जिले सबसे अधिक दबाव में हैं जिनमें अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र, कैथल, हिसार, भिवानी, जींद, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, सोनीपत, सिरसा, पानीपत, फतेहाबाद और झज्जर शामिल हैं। 

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कुलपति प्रो. बलदेवराज कांबोज ने विश्वविद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा तैयार हरियाणा के भूजल गुणवत्ता मानचित्र का अनावरण किया है। इस मानचित्र की नींव छह वर्षों के अथक फील्ड सर्वे पर टिकी है। वैज्ञानिकों ने गांव स्तर पर जीपीएस लोकेशन के आधार पर भूजल के नमूने एकत्र किए और आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान करनाल के दिशा-निदेर्शों के अनुसार उनका विश्लेषण किया। पिछला ऐसा मानचित्र 1992 में बना था। 

पूरे हरियाणा में केवल 31.83 प्रतिशत भूजल ही अच्छी गुणवत्ता श्रेणी में आता है जो अधिकांश फसलों की सिंचाई के लिए उपयुक्त है। लगभग 30.04 प्रतिशत भूजल सीमांत लवणीय पाया गया है जिसे उचित प्रबंधन के साथ लवण-सहिष्णु फसलों के लिए उपयोग किया जा सकता है। विस्तृत वर्गीकरण बताता है कि 6.04 प्रतिशत खारा पानी, 19.50 प्रतिशत उच्च एसएआर खारा पानी, 5.67 प्रतिशत हल्का क्षारीय, 1.66 प्रतिशत क्षारीय और 5.26 प्रतिशत अत्यधिक क्षारीय पानी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मानचित्र में गुणवत्ता को अच्छे, सीमांत लवणीय, लवणीय, उच्च एसएआर लवणीय, सीमांत क्षारीय, क्षारीय और उच्च क्षारीय वर्गों में बांटा गया है। 

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा का कोई भी जिला शत-प्रतिशत उत्तम श्रेणी में नहीं है। 31.83 प्रतिशत अच्छे पानी का यह आंकड़ा पूरे प्रदेश के नमूनों का औसत है, किसी एक जिले का नहीं। इसका असर सीधे किसान के नलकूप पर, पीने के पानी की गुणवत्ता पर और खेत की मिट्टी पर पड़ रहा है। जब मीठे पानी की परत नीचे चली जाती है तो नीचे का खारा और क्षारीय पानी ऊपर आ जाता है जिससे न केवल सिंचाई बल्कि स्वास्थ्य का संकट भी बढ़ता है। वैज्ञानिकों ने खारे और अधिक सोडियम वाले पानी वाले क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता के हिसाब से खेती करने और मिट्टी सुधार के उपाय अपनाने की सलाह दी है। यदि किसान वैज्ञानिकों की सलाह के हिसाब से खेती करें, तो पानी की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है।

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