बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
मगध का राजकुमार श्रोण अत्यंत विलासी था। वह अपने महल से बाहर नहीं निकलता था। हमेशा भोग विलास में ही लगा रहता था। सुंदर किशोरियां उसके आगे पीछे घूमती रहती थीं। उसकी पत्नी अत्यंत सुंदरी थी। वह भी अपने पति का हर तरह से ख्याल रखती थी। राजकुमार श्रोण अत्यंत घमंडी किस्म का था। वह किसी का भी अपमान करने में तनिक भी संकोच नहीं करता था। वह वय का भी ध्यान नहीं रखता था।महाराज अपने पुत्र की आदत से बहुत परेशान थे। वह वीणा बहुत बढ़िया बजाता था। एक दिन उसने महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना, तो उसका मन बदल गया। उसने प्रवज्या धारण कर ली। भिक्षु हो गया। जब सारे भिक्षु दिन में एक बार भोजन करते थे, तो वह दो दिन बाद भोजन करता था। वह नंगे पैर चलता था।
जब सारे भिक्षु पेड़ की छाया में बैठ जाते थे, तो वह कड़ी धूप में खड़ा रहता था। जिससे उसका सुकोमल शरीर सूखकर कांटा हो गया। उसके पैरों से मवाद बहने लगा, लेकिन वह अविचलित रहा। यह बात जब महात्मा बुद्ध को पता चली, तो उन्होंने श्रोण को अपने पास बुलाया और कहा, भंते! मैंने सुना है कि तुम वीणा बहुत सुमधुर बजाते हो। यदि वीणा के तारों को ढीला छोड़ दिया जाए, तो क्या होगा?
श्रोण ने कहा कि वह नहीं बजेंगे। उनसे स्वर ही नहीं फूटेगा। तथागत ने फिर पूछा, यदि तारों को अधिक कस दिया जाए तो क्या होगा? श्रोण ने कहा कि तार टूट जाएंगे। बुद्ध ने कहा कि शरीर भी तो एक वीणा है। यदि तुम इसको अधिक कष्ट दोगे, तो शरीर टूट जाएगा। नष्ट हो जाएगा। यह सुनकर श्रोण समझ गया कि महात्मा बुद्ध उसे क्या समझाना चाहते हैं। उस दिन के बाद श्रोण ने अन्य भिक्षुओं के समान आचरण करने लगा।
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