बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
मगध के सम्राट बिंबिसार की उनके पुत्र अजातशत्रु ने हत्या कर दी थी। पिता को मौत के घाट उतारने के बाद अजातशत्रु ने शासन संभाला। काफी दिनों बाद उसे अपने पिता की हत्या करने पर पश्चाताप हुआ। उसने उस पाप को मिटाने के लिए पशुबलि का आयोजन किया। संयोग से उन्हीं दिनों महात्मा बुद्ध मगध की राजधानी राजगृह जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि विपरीत दिशा में भेड़ों का एक झुंड चला आ रहा है।उसके पीछे आ रहे गड़रिये ने एक भेड़ के बच्चे को कंधे पर लाद रखा है। बुद्ध समझ गए कि मेमने को कोई कष्ट है जिसकी वजह से गड़रिये ने उसे कंधे पर उठा रखा है। उन्होंने गड़रिये से मेमने के बारे में पूछा, तो गड़रिये ने बड़ी श्रद्धा से जवाब दिया-भंते! इस मेमने के पैर में चोट लगी है। इसलिए मैंने इसे कंधे पर उठा रखा है। बुद्ध ने उस मेमने की चोट की जगह पर हाथ रखा, तो मेमने को राहत मिली।
उसने अपनी आंखें मूंद ली। साधु वेश में खड़ी बुद्ध को देखकर गड़रिये ने कहा कि भंते! आप इस मेमने के इस चोट को देखकर इतने पीड़ित हैं। अभी कुछ देर बाद इन सबको अग्नि को समर्पित कर दिया जाएगा, तब आपको कितनी व्यथा होगी। यह सुनकर बुद्ध विचलित हो उठे। उन्होंने पूछा, तो गड़रिये ने बताया कि महाराज अजातशत्रु पिता की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए एक हजार पशुओं की बलि चढ़ाने जा रहे हैं।
बुद्ध जब यज्ञ स्थल पर पहुंचे तो देखा कि अजातशत्रु यजमान की तरह यज्ञवेदी के पास बैठा हुआ है और ब्राह्मण यज्ञ करा रहे हैं। बुद्ध को देखते ही अजातशत्रु बुद्ध के पास पहुंचा और यज्ञ के बारे में बताया। बुद्ध ने कहा कि एक पत्ता ले आओ। पत्ता आने पर उन्होंने अजातशत्रु से कहा, इसको चीर दो। पत्ता चीरे जाने के बाद उन्होंने कहा, इसे जोड़ दो। अजातशत्रु ने कहा कि इसे जोड़ा कैसे जा सकता है। तब बुद्ध ने कहा कि जो पाप तुमने किया है, उसे मिटाया नहीं जा सकता है। तब इस यज्ञ का क्या मतलब है। अजातशत्रु की समझ में बात आ गई और उसने यज्ञ टाल दिया।
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