बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
जब श्रावस्ती के बाहर जेतवन में संघ की स्थापना हुई थी, तब से उसकी देखभाल अनाथ पिंडक के पास थी। वह महात्मा बुद्ध के साथ-साथ सभी भिक्षुओं का ध्यान रखते थे। उन्हीं दिनों सुप्पारक तीर्थ क्षेत्र से प्रव्रज्या पर दारूचीरिय लौटे थे। वह पहले भी जेतवन में संन्यासी का जीवन बिता चुके थे। लेकिन जब उन्हें दक्षिण में जाने का अवसर प्राप्त हुआ और उन्हें लोगों से मान सम्मान मिला, तो उनका श्रम करने का अभ्यास छूट गया था। वह सुस्वादु भोजन ग्रहण करने के भी अभ्यस्त हो चुके थे।जिस दिन दारूचीरिय जेतवन पधारे, अनाथपिंडक ने उन्हें अतिथि माना। दूसरे दिन अनाथ पिंडक ने दारूचीरिय को कुल्हाड़ी पकड़ाते हुए जंगल से लकड़ी काट लाने को कहा। श्रम का अभ्यास छूट जाने और मन में अहंभाव पैदा हो जाने की वजह से दारूचीरिय ने इसे छोटा काम समझा और लकड़ी काटने नहीं गए। तीसरे दिन अनाथ पिंडक ने उनसे कहा कि आपको तथागत के पास रहना चाहिए।
हम लोग तो श्रमण मात्र हैं। यह सुनकर दारूचीरिय श्रावस्ती की ओर चल पड़े। वह चलते समय सोचने लगे कि सबसे बड़े अर्हत को भिक्षा मांगने की क्या आवश्यकता है, जब इतने सारे भिक्षु यहां मौजूद हैं। दारूचीरिय श्रावस्ती पहुंचे तो देखा कि बुद्ध रास्ते में पड़े उपलों को उठाकर अपनी झोली में रखते जा रहे हैं ताकि आश्रम में भोजन बनाने में सहायता हो सके।
पास पहुंचकर दारूचीरिय अभिवादन कर पाते उससे पहले ही बुद्ध ने कहा कि अर्हत को छोटे मोटे काम को भी गरिमा प्रदान करनी चाहिए। दारूचीरिय समझ गए। शाम को सत्संग के समय भी इस घटना को दोहराते हुए कहा कि आम का पेड़ जितने ज्यादा फल होते हैं, वह उतना ही झुक जाता है। विभूतियां पाकर साधक को और झुकना चाहिए। यह सुनकर दारूचीरिय का सिर शर्म से झुक गया। उन्होंने उसी दिन से हर तरह का श्रम करना प्रारंभ कर दिया।
No comments:
Post a Comment