Friday, August 28, 2026

सदियों से हरियाणवी लोकगीतों ने रक्षाबंधन पर्व को रखा जिंदा


अशोक मिश्र

आज रक्षाबंधन है। भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन वैसे तो पूरे भारत में मनाया जाता है। हर प्रदेश में रक्षाबंधन मनाने की अपनी अपनी परंपराएं हैं, लोकगीत हैं और विधियां हैं। हरियाणा में रक्षाबंधन की छटा ही निराली और अद्भुत है। हरियाणा में रक्षाबंधन मनाने की परंपरा महाभारत काल से ही चली आ रही है, ऐसा माना जाता है। द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की कलाई पर आंचल का टुकड़ा बांधा था और हरियाणा के खेतों में बैठी दादी यही कथा अपनी पोतियों को सुनाते हुए राखी का अर्थ समझा देती थीं कि यह धागा नहीं, वचन है। 

हरियाणा के पौराणिक किस्सों में तो यह भी कहा जाता है कि जब फसल कट जाती थी और सावन भादों में भाई खेत से थोड़ा खाली होता था, तब बहन अपने पीहर आकर उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती थी ताकि अगली फसल तक उसका भाई सलामत रहे, खेत सलामत रहे। प्राचीन काल में रक्षाबंधन का तरीका बिल्कुल अलग था। तब राखी कोई बाजार की चीज नहीं थी। बहनें खुद सूत कातकर, उसमें हल्दी, सरसों और चावल के दाने पिरोकर राखी बनाती थीं। ऐसी राखियों में बहन का अपने भाई के प्रति प्यार झलकता था। 

पुराने समय में राखी बांधने के बाद शाम को पूरा गांव किसी एक जगह इकट्ठा होकर लोकनृत्य करता था, रात को महिलाएं एकत्रित होकर अपनी खुशी व्यक्त करती थीं। भाई अपनी बहन को अपने खेत की पहली फसल में से हिस्सा देता था, क्योंकि बहन का हक माना जाता था। अब बहुत कुछ बदल गया है। अब राखी कूरियर से आती है। वीडियो कॉल पर बंध जाती है। भाई-बहन एक-दूसरे से हजारों किमी दूर हैं। राखी का रूप भी बदल गया-चांदी की, ब्रेसलेट वाली, कार्टून वाली। पर भाव वही है। 

पहले बहनें सावन भर इंतजार करती थीं कि कब राखी आएगी, अब व्हाट्सएप पर सुबह-सुबह राखी की फोटो आ जाती है। इस पर्व को सबसे ज्यादा जिंदा रखते हैं यहां के लोकगीत। हरियाणा की राखी बिना गीतों के पूरी ही नहीं होती। जब बहनें पीहर से ससुराल लौटने लगती हैं तो आंगन में एक ही गीत गूंजता है- हे री राखी बांधण आई सूं, तेरे रोज नहीं आंदी। इस एक लाइन में शिकायत भी है, अपनापन भी और बचपन की लड़ाई भी। दूसरा गीत जो हर भाभी-ननद की जुबान पर रहता है-इबकै रक्षाबंधन पै छुट्टी आज्या, मैं राखी बांधण आऊंगी मेरे वीर। 

ये गीत सांग और रागनी की धरती से निकले हैं। सूरज कवि दादा लख्मीचंद के जमाने से ही सांग मंडलियां राखी के किस्सों को मंच पर गाती रही हैं, जहां भाई-बहन के प्रेम को रागनी के सुर में पिरो दिया जाता था। आज भी जब बहन भाई की कलाई पर धागा बाँधती है तो आँखों में वही पुरानी चमक आ जाती है। धागा चाहे रेशमी हो या सूती, भाव वही रहता है, रक्षा का वादा, प्रेम का बंधन और वो अटूट विश्वास कि चाहे दुनिया कितनी भी बदल जाए, भाई-बहन का रिश्ता कभी नहीं टूटेगा। 

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