अशोक मिश्र
हरियाणा में पिछले सोलह दिन से सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने खुद मोर्चा संभालते हुए कहा है कि वह जल्दी ही हड़ताल खत्म कराएंगे, बातचीत सौहार्दपूर्ण माहौल में हो रही है और समाधान निकलेगा। गांव की गलियों से लेकर शहरों के बाजारों तक सफाई का पहिया थमा हुआ है। शहरों से लेकर गांवों तक कूड़े-कचरे के ढेर लग चुके हैं। हड़ताल के कारण प्रदेश भर में 14 हजार टन से ज्यादा कूड़ा जमा हो चुका है। शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में नालियां अवरुद्ध हो गई हैं।वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर निजी कर्मचारियों से कचरा उठवाने की कोशिश स्थानीय प्रशासन ने की थी, लेकिन ऐसा करने पर कर्मचारी भड़क रहे हैं। वह कई जगहों पर निजी कर्मचारियों को काम रोक रहे हैं। कहीं रोडवेज के परिचालकों को अस्थायी रूप से फायर ब्रिगेड में लगाना पड़ रहा है क्योंकि अग्निशमन कर्मचारी भी हड़ताल पर हैं। इस बिगड़ती व्यवस्था पर हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है और स्थानीय निकाय विभाग से शपथपत्र पर जवाब मांगा है। सफाईकर्मियों की हड़ताल का स्वास्थ्य पर सीधा असर दिखने लगा है।
सड़कों पर पड़ा कचरा सड़ रहा है, बदबू से लोग बेहाल हैं, नालियों का गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है और मक्खी-मच्छर पनप रहे हैं। स्थानीय डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि हरियाणा स्वास्थ्य आपातकाल की कगार पर है। गुरुग्राम, हिसार, फरीदाबाद जैसे शहरों में टनों कचरे से डेंगू, मलेरिया, डायरिया, त्वचा संक्रमण और सांस की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ गया है। सात दिन से कूड़े के ढेर लगे रहने से बीमारी फैलने का अंदेशा पहले ही जताया जा रहा था।
ऐसे में मुख्यमंत्री का यह भरोसा कि बातचीत से जल्द सफाई व्यवस्था पटरी पर लौटेगी, आम लोगों के लिए एक उम्मीद है, लेकिन जब तक कागज पर मानी गई 17 मांगों के आदेश जारी नहीं होते और पक्का करने की मांग पर कोई बीच का रास्ता नहीं निकलता, तब तक गांव की चौपाल से लेकर शहर के अस्पताल तक यही सवाल गूंज रहा है कि कचरे के इस पहाड़ के नीचे आखिर आम आदमी की सेहत कब तक दबी रहेगी। सरकार वेतन बढ़ोतरी, समय पर वेतन, वर्दी और सुरक्षा उपकरण, पीएफ-ईएसआई, एरियर का भुगतान, ठेका प्रथा खत्म कर पे-रोल पर लाने और कुछ भत्तों पर सहमत होती दिख रही है।
पानीपत में हुई बैठक के बाद तो हड़ताल खत्म होने का ऐलान भी हुआ था। लेकिन पक्का करने की सबसे बड़ी मांग पर सरकार अड़ी हुई है। उसका कहना है कि हाईकोर्ट के 31 दिसंबर 2005 के आदेश और बाद में 31 दिसंबर 2025 तक 10 साल की सेवा वालों को नियमित करने के निर्देश की समीक्षा करेगी, तुरंत पक्का करना संभव नहीं है। यही वह बिंदु है जहां बात टूटती है। कर्मचारी इसे ही अपनी 19 साल की सेवा का हक मानते हैं और ठेका प्रथा समाप्त करने के लिखित आदेश जारी होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दे रहे हैं।
No comments:
Post a Comment