बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध के समकालीन एक राजा थे। वह किसी सिद्ध पुरुष की तलाश में थे ताकि अपनी कामनाओं की पूर्ति कर सकें। वह अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए हर संभव प्रयास पहले भी कर चुके थे। किसी ने उन्हें सलाह दी थी कि यदि वह किसी सिद्ध पुरुष को तलाश लें, तो वह आपकी मनोकामना की पूर्ति कर सकता है। राजा ने एक मैदान में पतला सा बहुत ऊंचा बांस गड़वाया और उस पर सोने का एक कमंडल टांग दिया।उन्होंने घोषणा की कि जो भी सिद्ध पुरुष बांस पर चढ़कर कमंडल उतार लाएगा, उसे कमंडल के साथ बहुत कुछ दिया जाएगा। वह मेरा गुरु होगा और उसे रहने के लिए महल, आने जाने के लिए हाथी-घोड़े प्रदान किए जाएंगे। उस राज्य के संत, महात्मा, ज्ञानी-गुणी सबने प्रयास किया, लेकिन कोई सफल नहीं हुआ। काफी दिनों बाद एक पतला-दुबला बौद्ध भिक्षु आया।
उसने चुनौती स्वीकार कर ली। वह बांस पर चढ़ गया और सोने का कमंडल उतार लाया। राजा ने उसे अपना गुरु बना लिया और सारी सुख सुविधाएं दीं। एक दिन भिक्षु ने सोचा कि महात्मा बुद्ध इन दिनों श्रावस्ती के जेतवन में विहार कर रहे हैं क्यों न चलकर उन्हें चमत्कार के बारे में बताया जाए। राजा ने सवारी और सेवकों का प्रबंध कर दिया। वह जेतवन पहुंचा। इससे पहले बुद्ध उसके चमत्कार की कथा सुन चुके थे।
शाम को जब वह भिक्षुओं को प्रवचन देने आए, तो उस भिक्षु की चर्चा करते हुए बोले, यह व्यक्ति भिक्षु बनने से पहले नट था। पतले बांस पर चढ़ना इसके लिए कोई कठिन काम नहीं था। इसने कोई चमत्कार नहीं किया है। प्रकृति में चमत्कार नहीं होते हैं। आज से बुद्ध संघ का कोई भी भिक्षु चमत्कार दिखाने का प्रयास नहीं करेगा। छल से धर्म का प्रचार करने का प्रयास भी नहीं करेगा। आत्मशुद्धि के लिए की गई तप साधना से ही मानव कल्याण संभव है।
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