अशोक मिश्रहमारा देश पर्व प्रधान है। शायद ही कोई महीना ऐसा बीतता हो जिसमें कोई न कोई तीज-त्यौहार न आता हो। भारत में तीज-त्यौहार कृषि से जुड़े रहे हैं। भाई-बहन के पावन प्रेम संबंधों का प्रतीक रक्षाबंधन भी मूलत: कृषि से ही जुड़ा है। दरअसल, सावन बीतते-बीतते कृषि कार्य पर विराम लग जाता है। किसान खेत-खलिहान से खाली हो जाता है। अभी फसल तैयार नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में यही मौका होता है, अपने सगे संबंधियों से मिलने का। बहनें अपने भाई और अन्य परिजनों से मिलने को व्याकुल होती हैं। तो वह अपने मायके चल देती है रक्षाबंधन मनाने के लिए।
घर में आई बहन-बेटी का स्वागत विभिन्न तरह के पकवानों से किया जाता है। हरियाणा में कोई तीन-चार दशक पहले तक रक्षाबंधन पर्व पर बाजार से मिठाई लाने का तो चलन ही नहीं था। घर की बुजुर्ग महिला यानी दादी, मां, चाची आदि सुबह चार बजे उठकर चूल्हा लीपती थीं। फिर उसी चूल्हे पर सुबह ही कड़ाही चढ़ जाती थी। घी तो घर का ही होता था, गाय-भैंस के दूध से निकला। उस घी में सबसे पहले गुलगुले तलते, गुड़ और गेहूं के आटे के मीठे गोले, जो बाहर से कुरकुरे और अंदर से नरम होते थे।
साथ में शक्करपारे, जिन्हें बच्चे राखी बंधवाने से पहले ही चट कर जाते थे। चूरमा तो रक्षाबंधन की आत्मा था। बाजरे की रोटी को हाथ से मसलकर उसमें बूरा और घी मिलाकर बनाया जाता था। यह चूरमा इतना पौष्टिक होता था कि एक कटोरी में पूरे सावन की ताकत आ जाती थी। मीठे चावल, पीले मीठे चावल में केसर नहीं, हल्दी की एक चुटकी और घी की महक होती थी। खीर तो मिट्टी की हांडी में बनती थी। धीमी आंच पर घंटों तक पकती, और पुआ, मालपुए, खांड के बताशे तो रक्षाबंधन की शोभा ही बढ़ा देते थे।
भाई के आने पर थाली में ये ही परोसे जाते थे, साथ में दही और घर का बना सफेद मक्खन, इसके स्वाद का तो कहना ही क्या था। ये पकवान सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं होते थे, ये मां के हाथों की दुआ थे। हर निवाले में पता चलता था कि इसमें मिलावट नहीं, ममता मिली है। लेकिन आज हालात बदल गए हैं। त्योहार के दो दिन पहले अखबारों में खबरें आने लगती हैं कि फलां जगह से नकली मावा पकड़ा गया। फलां दुकान पर मिलावटी बर्फी मिली। लोग पढ़कर भी उसी दुकान पर लौट जाते हैं क्योंकि किसी के पास घर पर पकवान बनाने के लिए समय नहीं है। घर पर पकवान और मिठाई बनाना अब पिछड़ापन लगने लगा है।
आज लगभग हर घर में डिब्बा आता है दुकान से बंधा-बंधाया। ऊपर सुनहरी पन्नी लगी मिठाई, देखने में सुंदर, पर भीतर क्या है, कोई नहीं जानता। खोया के नाम पर पाउडर, घी के नाम पर डालडा और रंग के नाम पर केमिकल। हमने खुद अपने हाथों से त्योहारों को जहर में बदल दिया है। चूरमा, खीर और गुलगुला आदि को हमने एक चमकदार डिब्बे के लिए बेच दिया।
No comments:
Post a Comment