बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
साम्राज्ञी महारानी क्षेमा हर्यक वंश के प्रतापी राजा बिंबिसार की पत्नी थीं। वह मद्र देश (वर्तमान पंजाब) के बौद्ध शासक सांगल की पुत्री थीं। उन्हें अपने रूप-यौवन पर बहुत अभिमान था। इस वजह से वह बुद्ध को नापसंद करती थीं क्योंकि बुद्ध बाहरी सौंदर्य को मिथ्या मानते थे। एक दिन जब उन्होंने बुद्ध को देखा, तो बुद्ध ने उन्हें जीवन की तीनों अवस्थाओं से परिचय कराया। वह बुद्ध से प्रभावित हुईं।एक दिन महारानी क्षेमा अपने सैन्य टुकड़ी के साथ महात्मा बुद्ध के चैत्य विहार में पधारीं। आश्रम के बाहर ही सैनिक टुकड़ी को रोक दिया गया। वह रथ से उतरीं और रथ सहित सैनिकों को वापस जाने का आदेश दिया। वह बुद्ध के निजी कक्ष में पहुंची और उन्हें प्रणाम करते हुए कहा कि भगवन! अब तक मैं अंधकार में भटकती रही। यदि पता होता कि प्राकृतिक नियमों में राजा प्रजा एक समान हैं।
मृत्यु और आधिभौतिक कष्टों और परेशानियों के जाल-जंजाल से कोई मुक्त नहीं होता, तो मैंने आत्मकल्याण के कई चरण पूरे कर लिए होते। महात्मा बुद्ध ने धीर गंभीर स्वर में कहा कि जिनके प्रति तुम्हारा उत्तरदायित्व हैं, उनकी अनुमति भिक्षुणी बनने के लिए अनिवार्य है। यह सुनकर महारानी क्षेमा वापस लौटीं और बिंबिसार से अनुमति लेकर चैत्य विहार दोबारा पहुंची।
यह बात सुनते ही राज्य की प्रजा भी प्रव्रज्या लेने के लिए उमड़ पड़ी। बुद्ध ने कहा कि क्षेमे! जिस तरह तुम प्रव्रज्या लेने को चैतन्य हो, क्या आश्रम के बाहर उमड़ी भीड़ भी वैसे ही चैतन्य है? क्षेमा ने कहा कि नहीं प्रभु। बुद्ध ने कहा कि फिर यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि इन्हें चैतन्य बनाओ। क्षेमा ने कई साल तक जन जन के बीच जाकर लोगों को आत्मकल्याण की दीक्षा दी और बुद्ध से दीक्षा लेकर महान भिक्षुणी बनी।
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