Monday, August 24, 2026

आप जानते हैं, जीवन कितना क्षण भंगुर है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

वाहिय सुप्पारक क्षेत्र (महाराष्ट्र के पालघर जिले में नालासोपारा नाम से विख्यात है) के सबसे बड़े धनी और सम्मानित व्यक्ति थे। इतना धन-संपत्ति होते हुए भी वाहिय को किसी भी प्रकार का अभिमान नहीं था। वह त्याग, संयम और अपरिग्रह जैसे गुणों से परिपूर्ण एक संत पुरुष थे। वह दूसरों को दुख को अपना दुख मानते थे और जो भी उनके पास किसी सहायता की आशा से आता था, वह उसका हर तरह से सहायता करते थे। 

एक बार उनके मन में कुछ बातों को लेकर जिज्ञासा उत्पन्न हुई तो वह पैदल ही जेतवन के लिए चल पड़े। कई महीनों की पदयात्रा के बाद वाहिय जेतवन पहुंचे। उन्होंने संघ के एक भिक्षु से पूछा कि तथागत से मेरा इसी समय मिलना बहुत जरूरी है। मुझे कुछ मामलों में अपनी जिज्ञासा शांत करनी है। उस भिक्षु ने कहा कि तथागत, अभी भिक्षा के लिए जनपद गए हैं। आप इतनी दूर से आए हैं, विश्राम कीजिए। तथागत कुछ ही देर में आते होंगे। वाहिय को उनकी जिज्ञासा ने बहुत परेशान कर रखा था। 

वह भिक्षु से पूछकर उसी दिशा में चल पड़े जिधर महात्मा बुद्ध  गए थे। एक घर के द्वार पर भिक्षा पात्र लिए खड़े बुद्ध दिखाई पड़े। वाहिय ने बुद्ध को प्रणाम करते हुए कहा कि भगवन! मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे मैं अक्षय सुख के मार्ग पर चल सकूं। बुद्ध ने कहा कि यह समय उपदेश देने का नहीं है। मैं भिक्षा लेकर जेतवन चल रहा हूं। वहीं उपदेश देता हूं। 

वाहिय ने कहा कि आप जानते हैं कि जीवन कितना क्षण भंगुर है। जीवन तिरछे पत्ते पर पड़े हुए जल बिंदु के समान है। कब ढुलक जाए, पता नहीं। बुद्ध ने उन्हें उपदेश दिया, तो वाहिय लौट पड़े। भिक्षा ग्रहण करके बुद्ध जब आगे बढ़े कि एक भिक्षु ने आकर कहा, भगवन! जो जिज्ञासु अभी अभी उपदेश सुनकर गया था, उसे सांड ने सींगों से उठाकर पटक दिया है। उसका निष्प्राण शव पड़ा है। बुद्ध ने कहा कि वह तुम्हारा गुरुभाई है। उसका सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करो। यदि मैं उसे अक्षय सुख का उपदेश नहीं देता, तो अपूर्ण इच्छा इसके साथ चली जाती।

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