Wednesday, September 30, 2026

ज्ञान का सागर तो अथाह है, आनंद!


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध का प्रिय शिष्य आनंद था। आनंद महात्मा बुद्ध का चचेरा भाई थी। गौतम बुद्ध के जीवन के अंतिम 25 वर्षों तक साये की तरह उनके साथ रहा। आनंद के पिता राजा शुक्लोदना (अमितोदना) महात्मा बुद्ध के चाचा थे। आनंद का बड़ा भाई देवदत्त था। पक्षी वाले प्रसंग में इसी देवदत्त की चर्चा होती है। 

प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों जैसे सुत्त पिटक आदि में आनंद को अत्यंत प्रखर बुद्धि का बताया गया है। उन्होंने तथागत के उपदेशों को अक्षरश: याद रखा था। पाली परंपरा के अनुसार, आनंद के प्रथम गुरु बेलट्ठसीस और पुन्ण मंतानीपुत्त थे । पुन्ण के उपदेशों से ही आनंद को सोतापन्न की अवस्था प्राप्त हुई, जो ज्ञानोदय से पूर्व की अवस्था है। आनंद ने बाद में पुन्ण के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध  और आनंद एक सघन वन से गुजर रहे थे। दोनों किसी बात पर चर्चा भी करते जा रहे थे। एकाएक आनंद ने पूछा, भगवन! आपने बहुत सारा ज्ञान अर्जित किया है। क्या आप मुझे अपना समस्त ज्ञान दे चुके हैं? बुद्ध ने जवाब देने की जगह आनंद से ही सवाल पूछ लिया, यह बताओ आनंद, इस वन में कितने सूखे पत्ते गिरे होंगे। हम जिस वृक्ष के नीचे खड़े हैं, उस वृक्ष से कितने सूखे पत्ते गिरे हैं और कितने सूखे पत्ते अभी ऊपर लटक रहे हैं? 

आनंद इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाए। तब तथागत ने उनसे कहा कि दुनिया में ज्ञान का अथाह भंडार है। मैं उस अथाह भंडार से कितना ग्रहण कर पाया मैं नहीं कह सकता हूं। मैं तुम लोगों को कितना दे पाया, यह भी नहीं कह सकता हूं। इस अथाह ज्ञान सागर से जितना ग्रहण कर सको, उतना ग्रहण कर लो। संपूर्ण ज्ञान तो कोई एक व्यक्ति ग्रहण ही नहीं कर सकता है।

अब हरियाणा में खेत और घर तक पहुंचेगा ड्रोन कैपिटल का सपना

अशोक मिश्र

हरियाणा को ड्रोन कैपिटल बनाने की दिशा में सरकार ने अब कदम बढ़ा दिया है। 28 सितंबर को मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि देश-विदेश में ड्रोन की बढ़ती जरूरतों तथा विभिन्न क्षेत्रों में उपयोगिता को देखते हुए हरियाणा में ड्रोन निर्माण के क्षेत्र में रिसर्च पर विशेष फोकस किया जाएगा। हरियाणा को 'ड्रोन कैपिटल' बनाया जाएगा। यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि एक औद्योगिक रणनीति है। जब पूरी दुनिया में ड्रोन बनाने की होड़ लगी है, चीन बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहा है, अमेरिका और इजरायल रक्षा ड्रोन में आगे हैं, ऐसे में हरियाणा की योजना फायदेमंद इसलिए है क्योंकि वह केवल खरीददार नहीं, निर्माता बनने की सोच रहा है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा ड्रोन आयातक न बनकर यदि हिसार जैसे हब से युवाओं को निर्माण और ट्रेनिंग देगा तो लागत घटेगी, मेंटेनेंस लोकल होगा और युवाओं का पलायन रुकेगा। केंद्र की उदार ड्रोन नीति, पीएलआई योजना और हरियाणा की औद्योगिक जमीन, गुरुग्राम-मानेसर का इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरिडोर इस सपने को व्यावहारिक बनाते हैं। हिसार के सिसाय में देश के पहले और दक्षिण एशिया के सबसे बड़े ड्रोन प्रशिक्षण संस्थान और ड्रोन विनिर्माण यूनिट का ई-शुभारंभ हो चुका है, जहाँ अब तक 252 ड्रोन पायलट तथा 136 ड्रोन तकनीशियन तैयार किये जा चुके हैं। 

युवाओं के लिए इसका लाभ बहुस्तरीय है। दृश्या जैसी सरकारी कंपनी विभिन्न विभागों के उम्मीदवारों को ड्रोन पायलट ट्रेनिंग दे रही है। ड्रोन दीदी योजना के तहत पांच हजार महिलाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य है ही, साथ ही हरियाणा ड्रोन उद्यमी योजना के तहत अनुसूचित जाति वर्ग के 18 से 45 वर्ष के 500 युवाओं को बिल्कुल मुफ्त ड्रोन पायलट ट्रेनिंग, डीजीसीए सर्टिफिकेशन और ड्रोन खरीदने के लिए रियायती ऋण की सुविधा दी जा रही है। फसल निगरानी, कीटनाशक छिड़काव, स्वास्थ्य सेवाओं में दवा पहुंचाना, ट्रैफिक मॉनिटरिंग, आपदा प्रबंधन में राहत सामग्री गिराना और शादी-समारोह की फोटोग्राफी से लेकर घर की छत की लीकेज जांच तक ड्रोन आम जीवन में प्रवेश कर रहा है। 

कृषि क्षेत्र में ड्रोन का उपयोग सबसे अधिक व्यावहारिक है। हरियाणा कृषि विभाग ने एग्रीशक्ति नमो ड्रोन दीदी योजना के तहत एक लाख एकड़ जमीन पर ड्रोन से एग्रोकेमिकल छिड़काव का लक्ष्य रखा है। परंपरागत स्प्रे में मजदूर को एक एकड़ में घंटों लगते हैं और जहर का असर शरीर पर पड़ता है, ड्रोन 10 मिनट में एक एकड़ कर देता है, 70 प्रतिशत पानी बचता है। 

निजी जीवन में ड्रोन का सीधा उपयोग कम है, पर अप्रत्यक्ष उपयोग बढ़ा है। जैसे-जैसे ड्रोन की लागत घटेगी और सर्विस मॉडल मजबूत होगा, आम किसान और आम नागरिक भी इसे मोबाइल की तरह किराये पर ले सकेगा, तभी हरियाणा का ड्रोन कैपिटल का सपना खेत और घर दोनों तक पहुंचेगा।

Tuesday, September 29, 2026

मैं अमरता की खेती करता हूं, वत्स!

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ने जब भिक्षुक संघ का गठन किया, तो यह नियम बनाया कि हर भिक्षुक अपने भोजन के लिए भिक्षा मांगेगा। कुछ ग्रंथों में तो यह भी कहा गया है कि बौद्ध भिक्षु केवल एक ही घर से भिक्षा मांगेगा और जो कुछ उसे उस घर से मिलेगा, उसी पर  उसे उस दिन गुजारा करना पड़ेगा। 

अपने लिए भिक्षा मांगने के नियम से केवल बीमार और बहुत ज्यादा बुजुर्ग भिक्षु को ही छूट मिलती थी। गौतम बुद्ध अपने लिए नियम से भिक्षा मांगने जाया करते थे। संघ में रहने वाले भिक्षुओं को खाने-पीने के लिए एक बर्तन और पहनने के लिए दो वस्त्र ही मिलते थे। वस्त्र पुराना या फट जाने पर उसे फेंका नहीं जाता था, बल्कि यदि उसको दूसरे काम में उपयोग किया जाता था। वस्त्र तभी फेंका जाता था, जब वह किसी काम का नहीं रह जाता था। 

एक बार की बात है। गौतम बुद्ध काशी में उपदेश देने के लिए पहुंचे थे। नियम के अनुसार गौतम बुद्ध भिक्षा मांगने निकले। वह पहुंच गए काशी के एक संपन्न किसान के दरवाजे पर। उन्होंने भिक्षा के लिए गुहार लगाई। किसान घर से बाहर निकला और उसने कहा, मैं खेती पर दिन रात परिश्रम करता हूं। बीज बोता हूं। फसल की रखवाली करता हूं, तब जाकर मुझे खाने के लिए अनाज मिलता है। आप बिना खेती किए अनाज पाना चाहते हैं। 

बुद्ध ने कहा कि मैं आत्मा की खेती करता हूं। ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूं। उस फसल को तपस्या के जल से सींचता हूं। विनय मेरे हल की नोक, विचार शीलता फल है। मैं अमरता की खेती करता हूं, जहां न दुख है, न संताप। यह सुनकर किसान समझ गया कि उसके सामने युग प्रवर्तक महात्मा बुद्ध खड़े हैं। उसने गौतम को प्रणाम किया और भिक्षा लाकर दी।

सड़क हादसों का कारण बन रहे लावारिस पशु, जिम्मेदार कौन?

अशोक मिश्र

पलवल में 24 सितंबर की रात दो सांडों की लड़ाई से बचने के प्रयास में डिपो संचालक सुनील पांडेय की मौत हो गई। अभी लोग डिपो संचालक की मौत को भूल भी नहीं पाए थे कि ठीक दो दिन बाद 26 सितंबर को अमरपुर गांव के पास मोहना-अमरपुर मार्ग पर हुई दूसरी घटना ने हरियाणा की सड़कों पर लावारिस पशुओं के खतरे को फिर से सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया। चांदहट थाना क्षेत्र में शनिवार शाम लावारिस पशु को बचाने के प्रयास में बाइक अनियंत्रित होकर सड़क किनारे पेड़ से टकरा गई। 

इस हादसे में बाइक सवार राजवीर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि हरकेश ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। ये दोनों घटनाएं अलग-अलग लगती हैं, लेकिन इनका मूल कारण एक ही है, सड़क पर बेसहारा गोवंश की मौजूदगी और उनका अनियंत्रित व्यवहार। हरियाणा में यह समस्या अब रोज की हकीकत बन चुकी है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो प्रदेश में हर महीने औसतन 10 लोग ऐसे हादसों में जान गंवा देते हैं। पिछले पांच महीनों में ही फरीदाबाद सहित पूरे प्रदेश में 17 लोगों की मौत लावारिस पशुओं के कारण हुए हादसों में हो चुकी है। 

ऐसी घटनाओं के लिए किसी एक व्यक्ति या निकाय को दोषी नहीं माना जा सकता है। सबसे पहली जिम्मेदारी तो उन पशुपालकों की है जो दूध देना बंद करने पर गाय को लावारिस छोड़ देते हैं। नंदी को तो पैदा होने के कुछ ही दिनों बाद खुला छोड़ दिया जाता है। इसके बाद नंबर आता है स्थानीय निकायों और पंचायतों का जिनके पास लावारिस पशुओं को पकड़ने की जिम्मेदारी है। 

यह संस्थाएं कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति ही करती हैं। पांच महीने में पूरे प्रदेश में पशु को सड़क पर छोड़ने वालों से केवल 62,600 रुपये जुर्माना वसूला गया है। यह आंकड़ा स्थानीय निकायों और पंचायतों की कारगुजारी का सबसे बेहतरीन प्रमाण है। लोगों में दंड का डर जैसे रह ही नहीं गया है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है जो दशकों से इस समस्या को अस्थायी समाधान करके अब तक टालती आ रही है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कई बार कहा है कि प्रदेश में बेसहारा गोवंश सड़कों पर नजर नहीं आना चाहिए, लेकिन सड़कों पर स्थिति जस की तस है। 

व्यवस्था से जुड़े लोग सीएम को भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। राज्य में होने वाले इन हादसों को रोका जा सकता है। लेकिन केवल नारे लगाने या एक-दो हफ्ते अभियान चलाने से बात नहीं बनेगी। सबसे पहले तो पशु की पहचान और मालिक की जवाबदेही तय करना बहुत जरूरी है। टैगिंग का विचार एकदम सही दिशा में है, लेकिन जब तक हर पशु की टैगिंग और आधार-लिंक्ड डाटाबेस नहीं बनता और जुर्माना वसूली वाकई सख्त नहीं होती, लोग पशु छोड़ते रहेंगे। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाए। केवल दान से काम चलने वाला नहीं है।

Monday, September 28, 2026

चिकित्स की जरूरत वहां, बीमारियां जहां

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ज्यादातर भ्रमण में ही रहते थे। वह केवल वर्षाकाल में ही एक जगह टिकते थे। वर्षाकाल में यात्रा आसान भी नहीं होती है। रास्ते जोखिम भरे और नदियां उफान पर होती हैं। ऐसी स्थिति में गौतम बुद्ध तीन महीने के लिए एक स्थान पर रुक जाते थे। जब उन्होंने भिक्षुक संघ की स्थापना की, तो उन्होंने नियम बनाया कि हर भिक्षु अपनी सुविधा और इच्छानुसार लोगों में धर्म प्रचार के लिए जा सकता है। 

वह अपनी इच्छित जगह पर जाकर लोगों को आत्म कल्याण और जीवन को सुखमय बनाए रखने के लिए प्रेरित करेगा। बौद्ध की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करेगा। यदि वह अपने इस कार्य में विफल हो जाता है, तो उसके स्थान पर कोई नया भिक्षुक भेजा जाएगा। पहले वाले भिक्षुक को आश्रम बुला लिया जाएगा और उसे प्रशिक्षण दिया जाएगा। एक दिन सभी भिक्षुओं को अपने अपने इच्छित स्थान के लिए निकलना था। 

गौतम बुद्ध के परम प्रिय शिष्य आनंद ने उस स्थान को चुना जहां पहले भी लोग धर्म का प्रचार प्रसार करने का प्रयास कर चुके थे और विफल रहे थे। वहां मौजूद लोगों ने आश्चर्य से उन्हें देखा और कहा, वहां के लोग किसी भी साधु-संत या विचारक को टिकने नहीं देते हैं। लोग किसी को भिक्षा भी नहीं देते हैं और आपस में लड़ते ही रहते हैं। वहां जाकर आप क्या करेंगे? आपको भी हो सकता है कि कुछ दिनों बाद विफल होकर लौटना पड़े।  

इस पर आनंद ने गंभीर होकर कहा कि चिकित्सक की जरूरत वहीं सबसे ज्यादा होती है, जहां बीमारियां होती हैं। धर्म का प्रचार करने की जरूरत वहां है जहां अधार्मिक लोग रहते हों। मेरी भी सबसे ज्यादा जरूरत उसी गांव में है, जहां के लोग बुराइयों से घिरे हुए हैं। यह सुनकर सारे लोग शांत हो गए।

नशे के खिलाफ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन में दौड़े लोग

अशोक मिश्र

आज फरीदाबाद में नशा मुक्ति के संदेश के साथ हुई हाफ मैराथन महज एक दौड़ नहीं थी, वह एक सामाजिक घोषणा थी। यह उस सामाजिक बुराई के खिलाफ घोषणा है जिसने हमारे प्रदेश के युवाओं, बच्चों और बुजुर्गों को अपनी गिरफ्त में सदियों से जकड़ रखा है। सूरजकुंड मेला ग्राउंड से शुरू हुई इस नशा-मुक्त हरियाणा फरीदाबाद नमो मैराथन-2026 में 5 किलोमीटर, 10 किलोमीटर और 21 किलोमीटर की तीन श्रेणियां रखी गई थीं और आयोजकों के अनुसार जनसैलाब ऐसा उमड़ा कि एक साथ 1.35 लाख से अधिक लोगों ने दौड़ लगाई। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी रविवार की सुबह सूरजकुंड पहुंचे और ‘ड्रग-फ्री हरियाणा’ फरीदाबाद नमो हाफ मैराथन-2026 को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। 

इस दौरान भारतीय क्रिकेटर शिखर धवन ने लोगों का उत्साह बढ़ाया। सच यह है कि कोई भी मैराथन सीधे किसी के हाथ से नशे की पुड़िया नहीं छीनती। इसका प्रभाव तत्काल और मापने योग्य नहीं होता। कितने लोगों ने इस दौड़ के बाद नशा छोड़ा, इसका कोई रजिस्टर नहीं बनता। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि यह निरर्थक है। नशा एक अकेलेपन की बीमारी है, जो अंधेरे में पनपती है। जब सवा लाख लोग सुबह-सुबह सड़क पर एक साथ दौड़ते हैं, भारत माता की जय के जयघोष के साथ, तो वह अंधेरा टूटता है। युवा देखता है कि ऊर्जा का विकल्प भी है। दौड़, पसीना, समूह का उत्साह, यह सब नशे के विरुद्ध एक सकारात्मक नशा है। 

यह जागरूकता की पहली सीढ़ी है, अंतिम इलाज नहीं। ऐसी प्रतियोगिताओं का औचित्य इसी प्रतीकात्मक शक्ति में है कि राज्य यह कहना चाह रहा है कि हम लड़ रहे हैं और तुम अकेले नहीं हो। हरियाणा में 18 हजार 847 नशा पीड़ित हैं। यह तो केवल दर्ज आंकड़ा है। जमीन पर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। पंजाब से सटे होने के कारण ड्रग रूट, बेरोजगारी का दबाव, जिम और बॉडी बनाने के भ्रम में स्टेरॉयड और फिर नशे की ओर फिसलन और तेजी से बढ़ता शहरी अकेलापन, यह सब मिलकर हरियाणा को एक नए तरह के संकट में डाल रहा है। 

नशा मुक्ति अभियान को सफल बनाना है तो उसे दौड़ से आगे ले जाना होगा। इसे शर्म से निकालकर बीमारी के रूप में देखना सिखाना होगा। जैसे बुखार के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही नशे के लिए भी डॉक्टर के पास जाना होगा। इसके लिए हर प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर गोपनीय काउंसलिंग हो। स्कूलों में उत्तर रटाने के बजाय सवाल पूछने की आदत और जीवन कौशल सिखाना होगा, तनाव से कैसे निपटें, ना कैसे कहें। 

प्रयोगशालाओं को मंदिरों के बराबर सम्मान देना होगा। जब तक बच्चा यह नहीं देखेगा कि वैज्ञानिक सोच से भी जीवन सुधरता है, तब तक वह चमत्कारिक समाधान की ओर ही भागेगा। फरीदाबाद की यह दौड़ एक अच्छी शुरुआत है, पर दौड़ना ही काफी नहीं है, टिके रहना भी सीखना होगा।

Sunday, September 27, 2026

सुख-दुख में समान रहने का अभ्यास


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

बुद्ध ने जीवन भर लोगों को यह समझाने का प्रयास किया है कि लालसा ही हमारे दुखों का मूल है। जब हम जरूरत से ज्यादा संग्रह करते हैं, तो हमें उन वस्तुओं के प्रति मोह हो जाता है। जब वह वस्तु किसी कारण से नष्ट हो जाए या चोरी चली जाए, तो उसे हमें दुख होता है। हमें भविष्य या अतीत के बारे में सोचकर दुखी नहीं होना चाहिए। जो पल आप जी रहे हैं, वही आपका है। यदि वर्तमान को ही अच्छी तरह से जी लिया जाए, तो वह भविष्य को भी सुधारने की क्षमता रखता है। 

महात्मा बुद्ध के इस जीवन दर्शन को क्षणवाद के नाम से जाना जाता है। यदि हम अपने जीवन के बारे में विचार करें, तो महात्मा बुद्ध की बात सही नजर आती है। हम जीवन में अतीत या भविष्य को सोचकर परेशान होते रहते हैं, इससे वर्तमान जीवन का आनंद भी नहीं उठा पाते हैं। इसी तरह महात्मा बुद्ध इंसान को सुख और दुख में समान रहने का उपदेश दिया करते थे। 

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध कहीं जा रहे थे। उनके मन में पता नहीं क्या आया, वह अच्छी भली पगडंडी को छोड़कर नीचे चलने लगे। नीचे कंटीली झाड़ियां थीं। उस पर चलने से बुद्ध के पैरों में कांटे चुभने लगे। उनके साथ चल रहे लोग आश्चर्यचकित रह गए। उनके शिष्य आनंद ने पूछा, तात! आप पगडंडी छोड़कर कंटीले रास्ते पर क्यों चल रहे हैं। 

बुद्ध ने जवाब देते हुए कहा कि इंसान को इस पगडंडी पर सुख और दुख दोनों भोगने पड़ते हैं। सुखों के प्रति आशक्ति रखने से जब इंसान दुख में पड़ता है, तो वह अत्यंत दुखी हो जाता है। मैं कंटीले रास्ते पर इसलिए चल रहा हूं ताकि सुख और दुख का अभ्यास बना रहे। यह सुनकर उनके साथ चलने वाले समझ गए कि महात्मा बुद्ध उन्हें क्या समझाना चाहते हैं।

कीटनाशकों और रासायनिक खादों के ज्यादा उपयोग से बचें


अशोक मिश्र

हरियाणा की खेती हरित क्रांति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रही है और आज भी यह देश में रासायनिक आदानों के सर्वाधिक उपयोग वाले राज्यों में से एक है। सामान्य वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार फसल की जरूरत, मिट्टी परीक्षण और फसल चक्र के आधार पर ही खाद और कीटनाशक का उपयोग होना चाहिए, जिसमें संतुलित एनपीके लगभग 150 से 170 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आसपास माना जाता है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। हरियाणा में यह औसत बहुत पहले पार हो चुका है। पंजाब के बाद हरियाणा देश में सर्वाधिक कीटनाशक उपयोग करने वाला राज्य बन गया है। 

2000 से 2021 के बीच तकनीकी ग्रेड कीटनाशकों की वार्षिक खपत 4000 से 5025 टन के बीच स्थिर रूप से ऊंची रही है। इस अत्यधिक उपयोग का फसल और मिट्टी पर सीधा प्रभाव दिखता है। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन से पौधा बढ़ता तो तेजी से है पर जड़ें कमजोर होती हैं, फसल कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है और किसान फिर और कीटनाशक डालता है, यह एक दुष्चक्र बन जाता है। मिट्टी में जैविक कार्बन घटता है, सूक्ष्म जीव मरते हैं, जलधारण क्षमता कम होती है और जमीन सख्त हो जाती है। 

इससे पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से दाने का भराव और पोषण गुणवत्ता दोनों गिरते हैं। अधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों का मानव शरीर पर प्रभाव दो तरीकों से होता है, प्रत्यक्ष छिड़काव के दौरान और अप्रत्यक्ष भोजन, पानी और दूध के जरिये। हरियाणा में किए गए अध्ययन में केवल दो से चार प्रतिशत किसान ही मास्क, दस्ताने और जूते जैसे सुरक्षात्मक कपड़े पहनते हैं, इसलिए त्वचा और सांस के जरिये अवशोषण आम है। जब ये अवशेष लंबे समय तक शरीर में जाते हैं तो वे अंत:स्रावी तंत्र को बाधित करते हैं यानी हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करने वाले रसायनों के रूप में काम करते हैं। 

हरियाणा और पंजाब दोनों में अत्यधिक रासायनिक खादों के उपयोग को कैंसर के मामलों का प्रमुख कारण माना गया है, जिसे पंजाब की कुख्यात कैंसर ट्रेन के उदाहरण से समझा जाता है जो रोगियों को लेकर जाती है। केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री ने भी हरियाणा और पंजाब में कैंसर वृद्धि को अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से जोड़ा है। अत्यधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों से जुड़े रोगों की सूची लंबी है। 

सरकारी स्वास्थ्य निगरानी में कैंसर के अलावा बांझपन, प्रजनन संबंधी विकार, गुर्दे की विफलता, तंत्रिका तंत्र के विकार, सांस की पुरानी बीमारियां, त्वचा रोग, दृष्टि दोष और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं बार-बार सामने आई हैं। एक ग्रामीण स्वास्थ्य अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है कि कीटनाशक विभिन्न पुराने रोगों जैसे कैंसर, बांझपन, गुर्दे की विफलता, प्रजनन समस्याओं और तंत्रिका विकारों से जुड़े हैं। 


Saturday, September 26, 2026

जो चलता ही नहीं, वह थकेगा कैसे?

बोधिवृक्ष़

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध आत्म ज्ञान प्राप्त करने में छह साल लगे। बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। वह सिद्धार्थ से बुद्ध कहे जाने लगे। इसके बाद उन्होंने अपना सबसे पहला उपदेश सारनाथ में दिया। कहते हैं कि जब उन्होंने अपना पहले उपदेश दिया था, तो उस समय केवल पांच शिष्य ही उपस्थित थे। 

इसके बाद तो मानो तथागत को एक तरह का जुनून सवार हो गया। वह चल पड़े पूरे भारतवर्ष को आत्म ज्ञान देने। वह चलते ही रहते थे। जहां रात हो गई, वहीं रुक गए। भिक्षा मांगकर खा लिया। किसी से भिक्षा नहीं मिली, तो भूखे रहकर रात गुजार ली। बस एक ही जुनून सवार था कि सबको आत्म ज्ञान देकर सबको मुक्ति दिलानी है। महात्मा बुद्ध का परम शिष्य आनंद भी उनके साथ गांव-गांव, शहर-शहर डोल रहा था। 

एक दिन उसने महात्मा बुद्ध से कहा कि जब से आपको ज्ञान प्राप्त हुआ है, आप सतत चलते ही रहते हैं। आप इससे थके या उकताए हुए नहीं प्रतीत होते हैं। आप रुकते भी नहीं हैं। क्या आपको नहीं लगता है कि आपको थोड़ा विश्राम करना चाहिए? अपने शिष्य की बात सुनकर बुद्ध ने कहा कि जो चलेगा, वही थकेगा। जो चलेगा ही नहीं, वह थकेगा कैसे? बुद्ध का यह उत्तर सुनकर आनंद चकरा गया। 

उसने कहा कि मैंने आपको नित्य अपनी आंखों से चलते देखा है। यह सुनकर महात्मा बुद्ध मुस्कुराए और बोले, आनंद तुमने जिसको चलते हुए देखा है, वह शरीर है। बाहर से यह चलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर की आत्मा तो स्थिर है। जब आत्मा चली ही नहीं तो थकेगी कैसे? शरीर तो आत्मा की छाया है। छाया के चलने से कोई थकता है क्या? बुद्ध की बात सुनकर आनंद समझ गया कि भंते  उसे क्या समझाना चाहते हैं।

दबे पांव हरियाणा में पांव जमाती जा रही हैं फेफड़े की बीमारियां


अशोक मिश्र

हरियाणा की मिट्टी में हमेशा से मेहनत और संघर्ष की खुशबू बसी रही है। खेतों में काम करने वाले किसान, कारखानों में पसीना बहाने वाले मजदूर, स्कूल जाते नन्हे बच्चे, सबकी सांसों में इस धरती की ताकत समाई हुई थी। लेकिन आज वही सांसें बोझ बनती जा रही हैं। अस्पतालों के गलियारों में खांसी की आवाजें गूंज रही हैं, ऑक्सीजन सिलेंडरों की मांग बढ़ रही है और युवाओं-बच्चों के फेफड़े कमजोर पड़ते जा रहे हैं। यह कोई अचानक आई आपदा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे गहराता जख्म है जो हर घर को छू रहा है। फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां अस्थमा, क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और खासकर ट्यूबरकुलोसिस तेजी से फैल रही हैं। 

इनमें युवा और बच्चे भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। आंकड़े कहते हैं कि फरीदाबाद जैसे स्मार्ट सिटी में ही फेफड़ों के कैंसर के मरीज एक साल में 22 प्रतिशत बढ़ गए, रोगी 1201 से बढ़कर 1515 तक पहुंच गएऔर कई जिलों में एक्यूआई 342 जैसे गंभीर स्तर तक पहुंच गया है, जहां अस्पतालों की ओपीडी में 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है। सर्दियों में पराली का धुआं, दिवाली पर पटाखों का गुबार, पूरे साल फैक्ट्रियों से निकलता जहर और सड़कों पर गाड़ियों का धुआं, ये सब मिलकर एक अदृश्य चादर बन गए हैं। 

यह चादर बिना मास्क के हमारे फेफड़ों में उतर जाती है और वहीं जम जाती है। फेफड़े के रोगों के फैलने के एक नहीं, कई कारण एक-दूसरे में गूंथे हुए हैं। सबसे बड़ा कारण वह हवा है जो हम सांस के साथ पी रहे हैं। दूसरा कारण वह गरीबी और अनदेखी है जो टीबी को पालती है कमजोर पोषण, तंग घर, देर से जांच, और अधूरा इलाज। तीसरा कारण हमारी आदत है, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का और चूल्हे का धुआं। और चौथा, सबसे दर्दनाक कारण, वह चुप्पी है जो हम एक खांसी को दो हफ्ते से ज्यादा खींचने पर भी ओढ़ लेते हैं।  

एक अध्ययन के अनुसार हरियाणा में मौतों का एक बड़ा हिस्सा खराब हवा से जुड़ा पाया गया है। प्रदूषण फेफड़ों की सुरक्षात्मक परत को नष्ट करता है, जिससे संक्रमण आसानी से पकड़ लेता है। बच्चे और युवा, जिनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। हमें समझना होगा कि प्रदूषण और संक्रमण अलग-अलग दुश्मन नहीं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रदूषण फेफड़े को कमजोर करता है, और कमजोर फेफड़े पर संक्रमण आसानी से घर बना लेता है। 

अगर हमें सच में अपने बच्चों को बचाना है तो हमें सिर्फ टीबी की दवा नहीं, साफ हवा का भी इलाज करना होगा, और सिर्फ सरकारी योजना नहीं, एक पड़ोसी का हाथ भी थामना होगा ताकि कोई मरीज अकेला न छूट जाए। हरियाणा की धरती उपजाऊ है, लोग मेहनती हैं। अगर प्रदूषण पर लगाम लगे, पराली प्रबंधन बेहतर हो, जागरूकता घर-घर पहुंचे और इलाज समय पर पूरा हो, तो सांसें फिर से हल्की हो सकती हैं। 


Friday, September 25, 2026

वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग दिया था। उनका गृह त्याग उस युग की सबसे परिवर्तनकारी घटना साबित हुई थी। एक ऐसा राजकुमार जिसके पास सुख-सुविधा के सारे उपकरण मौजूद हों, उस समय की सबसे सुंदर स्त्री उनकी पत्नी हो। एक पुत्र भी हो जिसको अभी राजकुमार सिद्धार्थ ने ठीक से उसे देखा भी नहीं था। 

ऐसे में वह दूसरों के दुखों से द्रवीभूत होकर संन्यासी हो जाए, सचमुच यह एक अद्भुत घटना थी। लोगों के कल्याण के लिए ऐश्वर्य त्याग देना, सचमुच बड़े साहस का काम है। गृह त्याग के बाद सिद्धार्थ ने छह साल तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अपने शरीर को विभिन्न तरह के कष्ट दिए, लेकिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। बोधगया में निरंजना नदी के किनारे पीपल वृक्ष के नीचे 49 दिनों तक कठोर तपस्या की। 

इस तपस्या के ही दौरान एक दिन कुछ महिलाएं बड़े ही मधुर स्वर में गाती हुई जा रही थीं। उन दिनों जब महिलाएं लंबी यात्रा करती थीं, तो थकान मिटाने के लिए कुछ समूह में गाती हुई जलती थीं, ताकि थकान की अनुभूति न हो। वह स्त्रियां गा रही थीं जिसका मतलब था कि वीणा के तारों को इतना ढीला मत छोड़ो कि उससे मधुर ध्वनि ही न निकल सके। वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वह टूट जाएं। 

महिलाओं का गायन सिद्धार्थ के कानों में पड़ा, तो वह समझ गए कि शरीर को कष्ट देना तपस्या नहीं है। उसी दिन उन्होंने बुद्धत्व प्राप्त हुआ और राजकुमार सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए। उन्हें समझ में आ गया था कि अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए शरीर को कष्ट देना उचित नहीं है। संयमित जीवन, खान-पान, विश्राम, निद्रा आदि से आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने सारनाथ में पहला उपदेश दिया।

हर अतिक्रमण के खिलाफ होनी चाहिए लगातार कठोर कार्रवाई


अशोक मिश्र

हरियाणा में सड़कों, बाजारों और गलियों में फैला अतिक्रमण अब एक आम दृश्य बन चुका है। चाहे शहर हो या कस्बा, लगभग हर जगह फुटपाथों पर दुकानें, ठेलों की कतारें, निर्माण सामग्री के ढेर और अनधिकृत निर्माण नजर आते हैं। इससे आम नागरिकों को रोजाना भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। सड़कें संकरी हो जाती हैं, यातायात जाम लगता है और पैदल चलने वालों के लिए जगह नहीं बचती। 

बाजारों में खरीदारी के दौरान भीड़ और अव्यवस्था के कारण समय और मेहनत दोनों बर्बाद होते हैं। यह समस्या सिर्फ व्यवस्था की नहीं है, यह सीधे तौर पर जनजीवन, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी है। सड़कों पर दुकानदारों द्वारा सामान बाहर तक लगा देना, रेहड़ी-पटरी वालों का स्थायी रूप से एक ही जगह घेर लेना, मकान मालिकों द्वारा रैंप और चबूतरे को सड़क तक बढ़ा देना और बिल्डरों द्वारा पार्किंग की जगह पर दुकानें बना देना, ये सब इसी अतिक्रमण के अलग-अलग रूप हैं। 

परिणाम सामने है। सड़कों की चौड़ाई आधी रह जाती है। दो गाड़ियों के निकलने की जगह पर एक भी मुश्किल से निकल पाती है। पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ बचा ही नहीं, इसलिए वे सड़क पर चलने को मजबूर होते हैं और यही छोटी सी लापरवाही बड़े सड़क हादसों का कारण बन जाती है। एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपात सेवाएं जाम में फंस जाती हैं। बाजारों की स्थिति और भी बदतर है। त्योहारों पर तो आलम यह होता है कि ग्राहक दुकान तक पहुंच ही नहीं पाता है। 

भीड़, अतिक्रमण और अव्यवस्थित पार्किंग मिलकर खरीदारी को एक सजा बना देते हैं। बेरोजगारी, बढ़ती आबादी और शहरी योजनाओं की कमी इन प्रवृत्तियों को और मजबूत बनाती है। इनके खिलाफ कार्रवाई सख्त और निरंतर होनी चाहिए। नगर निगम और नगर महापालिका को नियमित अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाना चाहिए। उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाना, बार-बार दोषी पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई करना और जरूरत पड़ने पर निर्माण सामग्री या सामान जब्त करना आवश्यक है। 

ऐसा नहीं है कि जिलों में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है, लेकिन जो होती है, वह ज्यादातर दिखावटी और मौसमी होती है। अगर प्रशासन लगातार निगरानी रखे, दोषियों को समान रूप से सजा दे और वैकल्पिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए तो स्थिति में सुधार संभव है। नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी कि सार्वजनिक जगह किसी की निजी संपत्ति नहीं है। जब तक समाज में यह चेतना नहीं आएगी कि अतिक्रमण न केवल अवैध है बल्कि दूसरों के अधिकारों का हनन भी है, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। हरियाणा जैसे विकासशील राज्य में अगर शहरी प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए और नियमों को बिना भेदभाव लागू किया जाए तो सड़कें, बाजार और गलियां फिर से सुचारु और सुरक्षित हो सकती हैं।

Thursday, September 24, 2026

मुझे इसकी लीला देखने का सुयोग नहीं मिलेगा

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ, तो पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन ने राज महल को पूरी तरह सजाया। दूर-दूर से राजा, सामंत, श्रेष्ठि और नागरिक राज कुमार सिद्धार्थ के दर्शन करने और आशीर्वाद देने आए। महाराज शुद्धोदन और महारानी महामाया अत्यंत प्रसन्न थे। महात्मा बुद्ध से जुड़े कुछ ग्रंथों के मुताबिक लुंबिनी में एक उद्यान में राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ था और उनकी मां महामाया की तत्काल मृत्यु हो गई थी। 

ज्यादातर लोग मानते हैं कि सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद उनकी मां की मृत्यु हुई थी। खैर, राजकुमार सिद्धार्थ को देखने जब दूर-दूर से लोग आ रहे थे, तो उन्हीं दिनों हिमालय से एक वृद्ध साधु उन्हें देखने आया। जब नवजात सिद्धार्थ को उस साधु के सामने लाया गया। पिता ने साधु के चरणों में सिद्धार्थ को रखते हुए कहा कि महात्मन! इस बच्चे को आशीर्वाद दें कि यह यशस्वी हो, दीर्घायु हो, प्रतापी हो। 

साधु पहले तो कुछ क्षण तक निर्निमेष उन्हें देखता रहा और फिर वह फूट-फूटकर रोने लगा। महाराज शुद्धोदन यह देखकर घबरा गए। उन्होंने आशंकित होकर साधु से पूछा, कुछ अपशकुन की आशंका है क्या, मान्यवर। आप मुझे बताएं क्या बात है? महाराज की बात सुनकर कुछ देर तक चुप रहा और फिर बोला, महाराज! किसी प्रकार के अपशकुन की आशंका नहीं है। आप चिंतित न हों। 

मैं तो यह सोचकर रो रहा हूं कि जिसे खोजते-खोजते सारी उम्र बीत गई, उसका जन्म अब हो रहा है। मैं इस बालक की लीलाओं को नहीं देख पाऊंगा। मैं इनके चरणों में बैठकर आत्म ज्ञान हासिल नहीं कर पाऊंगा, यही सोचकर मुझे रोना आ गया। महाराज, आप धन्य हैं जो ऐसे यशस्वी बालक के पिता हैं। यह कहकर साधु चला गया।

हरियाणा में नार्को टेरर नेटवर्क का पर्दाफाश एटीएस की बड़ी सफलता


अशोक मिश्र

हरियाणा एंटी टेररिस्ट स्क्वाड ने बहुत ही काबिले तारीफ काम किया है। उसने देश के सामने एक अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर नेटवर्क का खुलासा  किया है। घटना 13 सितंबर 2026 की है। इस दिन सुबह पंचकूला के सेक्टर-11 स्थित अलिफ लैला क्लब में फायरिंग हुई। फायरिंग में एक युवती घायल हुई। पुलिस ने मामले की जब जांच शुरू की, तो मामला पहले आपसी झगड़े का लगा, लेकिन जब हरियाणा पुलिस की जांच आगे बढ़ी, तो सारी परतें खुलती चली गईं। इस जांच को गंभीरता को देखते हुए एंटी टेररिस्ट स्क्वाड को जिम्मा सौंपा गया। वहीं से अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर नेटवर्क का खुलासा हुआ। 

एटीएस ने अब तक तीन मौके से, एक एसएएस नगर से और तीन लुधियाना से कुल मिलाकर सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया कि आरोपी अमेरिका सहित विदेश में बैठे हैंडलरों के निर्देश पर काम कर रहे थे। ये हैंडलर स्थानीय लोगों को रहने की जगह, वाहन और पैसा उपलब्ध कराते थे ताकि सीमा पार से ड्रोन के जरिए आने वाले नशीले पदार्थों, हथियारों और ड्रग मनी को निर्धारित जगहों तक पहुंचाया जा सके।  यह घटना बताती है कि नार्कोटिक्स का कारोबार और आतंकी गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ गई हैं। 

नशीले पदार्थों की तस्करी से कमाए गए पैसे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों और हथियारों की खरीद में हो रहा है। स्थानीय नार्को कारोबारी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़कर आतंकियों के लिए काम कर रहे हैं या उनके साथ मिलकर साझा हित साध रहे हैं। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सिर्फ छापेमारी काफी नहीं है। यह बात हरियाणा एटीएस भी जानती है। इसलिए एटीएस ने सबसे पहले फाइनेंशियल और ड्रोन ट्रेल को तोड़ने जैसा काम शुरू किया है। सप्लाई चेन, हथियार के स्रोत और विदेशी हैंडलरों के पैसे का रास्ता खंगाला जा रहा है। 

दूसरी ओर एटीएस ने दक्षिण हरियाणा के नूंह, पलवल, फरीदाबाद, गुरुग्राम बेल्ट में इंटेलिजेंस को मजबूत करना शुरू कर दिया है, जहां सीसीटीवी, किराएदार सत्यापन और साइबर पेट्रोलिंग को एक साथ क्रियान्वित करना शुरू कर दिया है। फरीदाबाद के अल-फलाह जैसे संस्थानों में अपनी जड़ें जमा रहे आतंकियों के मामले दिखाते हैं कि पढ़े-लिखे प्रोफेशनल भी ऑनलाइन ग्रूमिंग का शिकार हो रहे हैं, इसलिए मदरसों, यूनिवर्सिटीज और यूट्यूब इन्फ्लुएंसर इकोसिस्टम पर निगरानी के साथ-साथ सामुदायिक पुलिसिंग जरूरी है। 

एटीएस ने इस पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। हरियाणा एटीएस का गठन जून 2026 में हुआ। यह सीआईडी के अधीन काम करता है। पंचकूला तथा गुरुग्राम में इसके केंद्र हैं। इसमें एनएसजी जैसी कमांडो फोर्स, इंटेलिजेंस विंग, जांच इकाई और काउंटर-रैडिकलाइजेशन सेल शामिल हैं। गठन के कुछ ही महीनों में पंचकूला क्लब फायरिंग मामले में नार्को-टेरर नेटवर्क का पदार्फाश इसकी पहली बड़ी सफलता है। 


Wednesday, September 23, 2026

और राज कुमार बदल गया



बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध के ही जीवनकाल में एक राजा था। वह बहुत ही दयालु और प्रजापालक था। उसकी महारानी भी अपने महाराज के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी। लेकिन इस राज दंपति को एक ही कष्ट था। उनका पुत्र बहुत ही क्रूर और उदंड था। वह अपनी मनमानी हरकतों से पूरी प्रजा को परेशान किए रहता था। राजा ने उसे बहुत सुधारने की कोशिश की। 

महारानी भी अपने पुत्र को समय समय पर सुधारने का प्रयत्न करती रहती थी। राज्य की प्रजा को अपने राजा और महारानी से बहुत प्रेम था, लेकिन वह राजकुमार से घृणा करती थी। राज्य की जनता में राजकुमार के प्रति विरोध बढ़ता जा रहा था। किसी तरह यह बात महात्मा बुद्ध के कानों तक पहुंची। उन्होंने राजकुमार को सुधारने का फैसला किया। वह उस राजा के राज्य में पहुंचे। 

महात्मा बुद्ध ने राज कुमार को अपने पास बुलाने की अपेक्षा खुद उसके पास पहुंचे। राजा-रानी ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया। मौका देखकर बुद्ध ने राज कुमार बातचीत करते हुए टहलने लगे। वह टहलते-टहलते एक नीम के पौधे के पास पहुंचे और राज कुमार से कहा कि तुम इस पेड़ के पत्ते को देखो तो कैसा है? राज कुमार ने नीम का एक पत्ता तोड़कर मुंह में डाला। चबाते ही उसने क्रोध में आकर उस पौधे को जड़ से उखाड़ डाला।

 महात्मा बुद्ध ने कहा कि इस पौधे क्यों उखाड़ डाला? राज कुमार ने कहा कि जब यह पौधा है, तो इतना कड़वा है। बड़ा होगा, तो यह विष की तरह कड़वा होगा। महात्मा बुद्ध ने कहा कि यदि तुम्हारे व्यवहार से क्रुद्ध होकर जनता भी वैसा व्यवहार करे, जैसा तुमने नीम के साथ किया है, तो क्या होगा? यह सुनकर राज कुमार अवाक रह गया। उसकी समझ में आ गया था कि महात्मा बुद्ध उसे क्या समझाना चाहते हैं। उसी दिन से राजकुमार बदल गया।

अरावली क्षेत्र में शोर शराबा करने वाले बाइक राइडर्स पर अंकुश जरूरी

अशोक मिश्र

सेव अरावली जैसी संस्थाओं ने अरावली पर्वतमाला को बचाने के लिए सराहनीय कार्य किया है। इस संस्था ने अब फरीदाबाद पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर अरावली क्षेत्र के शांत और संवेदनशील वन क्षेत्र में वीकेंड पर स्टंट करने और मॉडिफाइड बाइकों से तेज आवाज करने वाले राइडर्स ग्रुप पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनकी यह मांग जायज भी है। इन बाइक राइडर्स की वजह से अरावली क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है। अरावली पर्वत श्रृंखला जो लगभग 150 करोड़ वर्ष पुरानी है, गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश तक फैली हुई है। 

यह पाँच राज्यों के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करती है। थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकना, मानसून को थामना, भूजल स्तर को बनाए रखना और दिल्ली-एनसीआर जैसे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र के लिए फेफड़ों का काम करना, ये सभी कार्य अरावली करती है। लेकिन आज जो व्यवस्था पूरे उत्तर-पश्चिम भारत को प्रदूषण से बचा रही थी, वही खुद वायु प्रदूषण, धूल, अवैध खनन, कचरा डंपिंग और सबसे नया खतरा ध्वनि प्रदूषण का शिकार बन रही है। खनन, अतिक्रमण, शहरीकरण और बढ़ते मानवीय दबाव के अलावा हाल के वर्षों में सप्ताहांत पर आने वाले ग्रुप बाइकर्स का शोर-शराबा भी इसके संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। 

ट्रस्ट का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर से बड़ी संख्या में आने वाले ये बाइकर्स लगातार हॉर्न बजाते, मॉडिफाइड साइलेंसर से तेज आवाज निकालते और अत्यधिक गति से दौड़ते हुए वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास में ध्वनि प्रदूषण, व्यवधान, भय और तनाव पैदा करते हैं। आसपास के गांवों में भी बुजुर्गों और ग्रामीणों को इससे परेशानी होती है तथा सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। वन्य जीवों पर इस तरह के शोर का प्रभाव बहुआयामी होता है। जानवर शोर को खतरे के संकेत के रूप में ग्रहण करते हैं। वे पहले सतर्क होते हैं, फिर स्थिति का आकलन करते हैं और अंतत: भाग खड़े होते हैं। 

वैज्ञानिक अध्ययनों में देखा गया है कि लगातार ध्वनि प्रदूषण से वन्य जीवों में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता घटती है, हृदय गति बिगड़ती है और वे अपना प्राकृतिक आवास छोड़कर आबादी वाले इलाकों की ओर भागने लगते हैं। आवागमन बढ़ने से सड़कों पर वाहनों की संख्या बढ़ती है, जिससे धूल उड़ती है, मिट्टी का कटाव होता है, वनस्पति नष्ट होती है और वन्य जीव गलियारे खंडित हो जाते हैं। सेव अरावली जैसी संस्थाओं की मांगें इस दिशा में दबाव बना रही हैं कि सामान्य यातायात नियमों से आगे बढ़कर पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ठोस कदम उठाए जाएं। 

बढ़ते आवागमन और शोर से होने वाले सूक्ष्म लेकिन दीर्घकालिक नुकसान को भी गंभीरता से लिया जाना आवश्यक है, ताकि यह पर्वतमाला न केवल मानव आबादी बल्कि वन्य जीवों के लिए भी सुरक्षित बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा तथा संतुलित पर्यावरण उपलब्ध कराया सके।


Tuesday, September 22, 2026

मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

राजकुमार सिद्धार्थ के संबंध में यह बहुप्रचलित घटना है। कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय महाराज शुद्धोदन की दो पत्नियां थीं, महामाया और महाप्रजापति गौतमी। महामाया और गौतमी दोनों सगी बहनें थीं। महामाया ने एक ही पुत्र सिद्धार्थ को जन्म दिया था और कुछ ही दिनों बाद उनकी मौत हो गई थी, जबकि गौतमी ने पुत्र नंद और पुत्री नंदा को जन्म दिया था। एक बार की बात है। 

राजकुमार सिद्धार्थ राजवन में टहल रहे थे। उनके साथ मंत्री पुत्र देवदत्त भी था। इतने में सिद्धार्थ ने राजहंसों को आकाश में उड़ते हुए देखा। उन्होंने देवदत्त से कहा कि देखो, राजहंस आकाश में विचरते हुए कितने सुंदर लग रहे हैं। यह देखकर देवदत्त ने अपने तरकश से तीर निकाला और धनुष पर चढ़ाकर प्रत्यंचा खींच दी। तीर जाकर आकाश में उड़ रहे एक राजहंस के लगा और वह जमीन पर आ गिरा। 

घायल हंस को देखकर सिद्धार्थ का मन चीत्कार कर उठा। वह आंखों में अश्रु लिए उस हंस के पास पहुंचे और उसे उठाकर तीर निकाला और उसे बचाने का जो भी उपाय संभव था, वह किया। देवदत्त ने हंस पर अपना अधिकार बताते हुए मांगा। राजकुमार सिद्धार्थ ने हंस को देने से मनाकर दिया। राजपुत्र होने से देवदत्त उस समय तो सिद्धार्थ से कुछ नहीं कह सका, लेकिन उसने हंस पर अधिकार जताने के लिए राजा के यहां मामला पहुंचा दिया। राजदरबार में दोनों ने अपना-अपना पक्ष रखा। 

सिद्धार्थ ने कहा कि मारने वाले से बचाने वाले का अधिकार ज्यादा होता है। अपने ही पुत्र का मामला होने से राजा शुद्धोदन फैसला नहीं कर पा रहे थे। अंत में उन्होंने हंस को मंगाया और उसे राज दरबार में छोड़ दिया। कहा कि यह हंस जिसके पास चला जाएगा, हंस पर उसका अधिकार होगा। अंतत: हंस सिद्धार्थ के पास गया और इस तरह हंस पर राजकुमार सिद्धार्थ का अधिकार हुआ।

शिक्षा व्यवस्था को रोजगार, बाजार से और अधिक जोड़ने की जरूरत

 अशोक मिश्र

लाडवा इलाके के गांवों में रविवार को आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने दावा किया कि पिछले बारह साल में दो लाख से अधिक युवाओं को बिना पर्ची-बिना खर्ची के सरकारी नौकरी दी गई। मुख्य रूप से यह बात सत्ताधारी दल के आधिकारिक बयानों पर आधारित है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और राज्य सूचना विभाग ने बार-बार यह आंकड़ा दोहराया है। 

हालांकि विपक्ष इस दावे पर सवाल उठाता है। वे कहते हैं कि स्थायी नियमित पदों पर भर्ती अपेक्षाकृत कम हुई है और कई नियुक्तियां संविदात्मक या हरियाणा कौशल रोजगार निगम के माध्यम से हुई हैं। रोजगार एक्सचेंजों में पंजीकृत बेरोजगार युवाओं की संख्या चार लाख से अधिक बताई जाती है। इसमें बारहवीं पास युवा सबसे अधिक हैं। इसके बाद स्नातक और स्नातकोत्तर का नंबर आता है। कई जिलों जैसे हिसार, जींद, कैथल और सिरसा में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या विशेष रूप से ऊंची है। 

बेरोजगारी सबसे अधिक शिक्षित युवाओं में दिखती है। स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री धारक, खासकर कला और सामान्य विषयों वाले युवा, नौकरी बाजार में सबसे अधिक संघर्ष कर रहे हैं। इसके विपरीत तकनीकी, व्यावसायिक और कौशल आधारित कोर्स करने वाले युवा अपेक्षाकृत आसानी से रोजगार पा रहे हैं। आईटी, कंप्यूटर एप्लिकेशन, नर्सिंग, पैरामेडिकल, होटल मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स, आॅटोमोबाइल और निर्माण संबंधी डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स वाले युवाओं को उद्योगों और सेवा क्षेत्र में अवसर मिल रहे हैं। हरियाणा में उद्योग, निर्माण, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र के विस्तार के कारण ये कौशल मांग में हैं। 

वर्तमान में सबसे फायदेमंद पढ़ाई वही है जो डिग्री के साथ कौशल जोड़ती हो, जैसे बीसीए के साथ क्लाउड, बीएससी नर्सिंग, जर्मन या जापानी भाषा के साथ केयरगिवर कोर्स, हरियाणा में विदेश रोजगार के लिए ड्राइविंग और हॉस्पिटैलिटी प्रशिक्षण लेना लाभदायक है। केवल डिग्री हासिल करने से रोजगार की गारंटी नहीं रह गई है। बेरोजगारी का राज्य की अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी प्रभाव पड़ रहा है। 

युवा शक्ति का सही उपयोग न होने से उत्पादकता और उपभोग दोनों प्रभावित होते हैं। साथ ही बेरोजगारी भत्ते और कल्याणकारी योजनाओं पर सरकारी खर्च बढ़ता है। कौशल आधारित शिक्षा और बाजार उन्मुख कोर्स वर्तमान समय में अधिक फायदेमंद साबित हो रहे हैं। अर्थव्यवस्था पर बेरोजगारी का दबाव तो है, लेकिन उद्योग और सेवा क्षेत्र के विस्तार से अवसर भी पैदा हो रहे हैं। योजनाएं राहत दे रही हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए शिक्षा व्यवस्था को रोजगार बाजार से और अधिक जोड़ने की जरूरत है। युवाओं के जीवन में स्थिरता तभी आएगी जब मेरिट आधारित स्थायी रोजगार के अवसर और व्यावहारिक कौशल दोनों साथ-साथ बढ़ेंगे।


Monday, September 21, 2026

वैशाली को पराभूत देखना चाहते हैं सम्राट

 बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

मगध के सम्राट बिंबिसार को उनके पुत्र अजातशत्रु ने राज्य हथियाने के लिए उन्हें बंदी बना लिया था। बंदीगृह में उन्हें भूखा रखा गया, प्रताड़ित किया गया। इसी प्रताड़ना के चलते बिंबिसार की मृत्यु हो गई। इसके बाद अजातशत्रु निरंकुश हो गया। महात्मा बुद्ध से प्रभावित होने के बावजूद उसकी राज्य लिप्सा कम नहीं हुई। एक दिन जब महात्मा बुद्ध राजगृह बाहरी इलाके में स्थित गृध्रकूट आश्रम में पधारे, तो अजातशत्रु ने अपने मगध महामात्य वस्सकार को उनकी सेवा में भेजा और उनसे निवेदन करने को कहा। 

काफी देर तक बुद्ध का प्रवचन सुनने के बाद एकांत में कस्सकार ने कहा, भगवन! सम्राट वैशाली गणराज्य को पराभूत देखना चाहते हैं। कोई उपाय बताएं। उसकी बात सुनने के बाद तथागत गंभीर हो गए। उन्होंने पास बैठे अपने परम शिष्य आनंद से पूछा कि यह बताओ, क्या वज्जियों के सन्निपात यानी संसद अधिवेशन बार-बार होते हैं? आनंद ने कहा, हां। 

तब बुद्ध ने फिर पूछा, भंते! क्या वज्जि संघबद्ध रहकर उद्यम करते हैं, वह राष्ट्रीय कर्तव्यों को मिलजुलकर करते हैं? क्या वैशाली का शासक सभा द्वारा नियमपूर्व स्वीकृत हुए बिना कोई आदेश पारित नहीं करते हैं? स्वीकृत विधि विधान का नियमपूर्वक पालन करते हैं? क्या उनके यहां सारे नियमों का पालन होता है? क्या वैशाली राज्य में बुजुर्गों का सम्मान होता है? उनके आदेशों का पालन होता है? क्या वैशाली में कुमारियों और महिलाओं का आदर सम्मान होता है? क्या नौकरों-चाकरों का सम्मान होता है, उनकी रक्षा की जाती है?

आनंद ने कहा, हां भगवन! वैशाली में यह सब कुछ होता है। महात्मा बुद्ध की मुख मुद्रा गंभीर हो गई। वह महामात्य वस्सकार की ओर देखते हुए आनंद से बोले, तो आनंद, यह धर्म गणतंत्र के प्राण तत्व हैं। जब तक लिच्छवि इनका पालन करते रहेंगे, वे अविजेय रहेंगे। यह सुनकर कस्सकार लौट गया।

अरावली क्षेत्र में वन्य जीवों की गणना कराने का फैसला सराहनीय


अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने अरावली क्षेत्र में वन्य जीवों की गणना कराने का फैसला लिया है। यह गणना नौ साल बाद होने जा रही है। राज्य सरकार का यह फैसला सराहनीय और स्वागतयोग्य है। जीवों की गणना का इंतजार पर्यावरण प्रेमियों के साथ-साथ वन विभाग भी कर रहा था। आखिरी व्यापक गणना वर्ष 2017 में हुई थी, जबकि उससे पहले 2012 में हुई थी यानी 2017 के बाद से वैज्ञानिक तरीके से गिनती नहीं हुई है।   

वन्य जीवों की गणना सिर्फ संख्या गिनने का आंकड़ा नहीं होता है, यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का हेल्थ कार्ड होता है। इससे यह भी पता चलता है कि किस प्रजाति की आबादी बढ़ रही है, किसकी घट रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? उनका आवास कितना सुरक्षित है और मानव दबाव का असर कितना है। इसी के आधार पर राज्य सरकार बजट, स्टाफ, वाटर होल, कॉरिडोर और मुआवजा नीति आदि तय करती है। 

अगर गणना न हो तो वन्य जीवों के संरक्षण के लिए बनाई गई योजनाएं अंधेरे में तीर चलाने जैसा साबित होती हैं। 2017 की रिपोर्ट में दक्षिणी हरियाणा की अरावली में तेंदुए, लकड़बग्घा, सियार और कई अन्य प्रजातियाँ दर्ज की गई थीं, परंतु पिछले वर्षों में आवास में बदलाव, शहरीकरण और मानव हस्तक्षेप के कारण स्थिति बदल चुकी है। इसलिए नई गणना जरूरी हो गई है। अरावली क्षेत्र की प्रधानता की बात करें तो यहां का असली शासक तेंदुआ है जो शीर्ष शिकारी के रूप में पूरे तंत्र को संतुलित रखता है, लेकिन संख्या के लिहाज से सबसे अधिक नीलगाय, बंदर और सियार हैं। 

अरावली में कई जीव विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके हैं या संकटग्रस्त हैं। इनमें भारतीय भेड़िया, रेगिस्तानी लोमड़ी, कैरकल, रस्टी स्पॉटेड कैट तथा कुछ स्थानों पर चिंकारा और स्लोथ बियर शामिल हैं। इनके घटने का मुख्य कारण आवास का विखंडन, खनन, शहरीकरण, सड़क निर्माण तथा पानी के स्रोतों का सूखना है। जंगल सिकुड़ने से शिकार की कमी हो जाती है और जानवर मानव बस्तियों की ओर बढ़ने को मजबूर हो जाते हैं जहाँ वे दुर्घटना या संघर्ष का शिकार हो जाते हैं। यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो अरावली की जैव विविधता और अधिक क्षतिग्रस्त हो सकती है। 

नई गणना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत है जो सही आंकड़ों के आधार पर प्रभावी संरक्षण रणनीतियाँ बनाने में मदद करेगी। नौ साल बाद होने वाली यह गणना अगर ट्रैप, ट्रांसेक्ट और ड्रोन तीनों तरीकों से हुई तो यह बताएगी कि अरावली सच में जी रहा है या सिर्फ कैमरे में जीता हुआ दिख रहा है, और उसी के आधार पर तय होगा कि आने वाले दशक में यहां तेंदुआ दहाड़ेगा या सिर्फ कहानियों में रहेगा। फरीदाबाद के धौज गांव में हरियाणा का पहला निगरानी केंद्र भी इसी लिए बन रहा है जहां से हर दो साल में गणना और सतत निगरानी की योजना है। 

Sunday, September 20, 2026

शव देखकर हंसने लगे महात्मा बुद्ध


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

सुजाता बिहार के बोधगया के पास स्थित सेनानी (उरुवेला) गाँव के एक धनी जमींदार की पुत्री थीं। विवाह से पूर्व सुजाता ने एक वट (बरगद/पीपल) वृक्ष के देवता से मन्नत मांगी थी कि यदि उनका विवाह अच्छे कुल में हुआ और उन्हें प्रथम पुत्र की प्राप्ति हुई, तो वह हर वर्ष उस वृक्ष देवता को विशेष खीर (पायस) का भोग लगाएंगी। उनकी इच्छा पूरी हुई। उनका विवाह एक संभ्रांत परिवार में हुआ। 

समय आने पर उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। अपनी मन्नत के अनुसार वह हर साल उस वृक्ष पर खीर अर्पित करती थीं।  अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार सुजाता ने दूध से अत्यंत स्वादिष्ट और शुद्ध खीर तैयार की। तभी उनकी दासी पूर्णा ने आकर उन्हें बताया कि वट वृक्ष के नीचे एक संन्यासी बैठा हुआ है। महात्मा बुद्ध कठोर तपस्या करते हुए कई वर्ष बीत गए थे। उनकी काया अत्यंत कमजोर हो गई थी। 

उन्होंने सुजाता की पायस स्वीकार की, तो उनके शरीर को थोड़ी ऊर्जा मिली। इसके बाद उन्होंने समाधि लगाई जो सातवें दिन टूटी। बीच-बीच में सुजाता आकर बुद्ध को देख जाती थी। निरंजना नदी के किनारे वट वृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ। संयोग से उसी समय एक शव यात्रा निकल रही थी। उसे देखकर बुद्ध हंस पड़े। सुजाता ने पूछा कि कल तक आप शव देखकर दुखी हो जाते थे, आज आप हंस रहे हैं। 

बुद्ध ने कहा कि सुख-दुख तो मनुष्य की कल्पना मात्र है। मनुष्य का मोह ही सभी परेशानियां का कारण है। आज मैंने जान लिया है कि जो जड़ है, उसका तो गुण ही परिवर्तन है। सुजाता तुम ही बताओ, जिसे सनातन वस्तु मिल गई हो जो न परिवर्तनशील हो, न नााशवान, तो फिर उसे कैसा शोक। यह सुनकर सुजाता संतुष्ट हुई और स्वगृह चली गई।

पशुपालन को कारोबार का दर्जा मिलने से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था

अशोक मिश्र

हरियाणा सरकार ने पशुपालन को कारोबार के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। इसके लिए वित्तीय सहायता का दायरा भी बढ़ाया गया है। राज्य में पशुपालन को कारोबार का दर्जा मिलना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक संरचनात्मक बदलाव है। जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। हरियाणा में पशुपालन सदियों से ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। प्राचीन काल से ही यहां के किसान और पशुपालक गाय, भैंस, भेड़-बकरी जैसे पशुओं को परिवार का अभिन्न अंग मानते आए हैं। 

हरियाणा नस्ल की गाय और मुर्रा भैंस देशभर में प्रसिद्ध रही हैं। आज भी यह क्षेत्र दूध उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है, जहां प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। सदियों से पशुपालन को कृषि का सहायक धंधा माना जाता रहा, जबकि सच्चाई यह है कि छोटे और सीमांत किसान के लिए पशु ही उसकी सबसे तरल पूंजी है। कारोबार का दर्जा मिलते ही पशुपालक को वैधानिक पहचान मिलेगी, जो अब तक उद्योग को ही मिलती थी। बीसवीं पशुधन जनगणना 2019 के अनुसार राज्य में कुल पशुधन आबादी लगभग 71.26 लाख है, जिसमें भैंसों की संख्या करीब 43.76 लाख और गायों की लगभग 19.32 लाख है। 

स्वदेशी गौवंश की संख्या 19वीं जनगणना में 8.12 लाख से बढ़कर 9.49 लाख हो गई, जो 16.94 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। दूध उत्पादन भी 2014-15 के 79 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 125.93 लाख टन तक पहुंच गया है, जबकि प्रति पशु प्रतिदिन उत्पादकता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। यह हरियाणा के पशुपालकों की कर्मठता का परिचायक है। पशुपालन को पारंपरिक व्यवसाय से आगे बढ़ाकर कारोबार या उद्योग का दर्जा दिए जाने से पशुपालकों को कई ठोस लाभ मिलेंगे। 

इसके बाद उन्हें बैंक ऋण आसानी से उपलब्ध होंगे। सब्सिडी और बीमा सुविधाएं मिलेंगी। आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा। पशुपालक छोटे स्तर से शुरू करके बड़े डेयरी फार्म स्थापित कर सकते हैं, जिससे नियमित आय सुनिश्चित होती है। यदि पशुपालन को कारोबार माना जाए तो महिला सशक्तिकरण भी स्वाभाविक रूप से जुड़ता है। हरियाणा समेत पूरे उत्तर भारत में पशुओं की देखभाल का 70 प्रतिशत से अधिक काम महिलाएं करती हैं। 

सरकार पशुपालन से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए कई कदम उठा रही है। चारे की उपलब्धता बढ़ाने, बीमा कवरेज विस्तार, समयबद्ध सेवाएं, मोबाइल पशु चिकित्सा वैन और गौशालाओं को सहायता जैसी पहलें जारी हैं। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत स्वदेशी नस्लों का संरक्षण हो रहा है। पशुओं को लावारिस छोड़ने पर जुर्माना और कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।  इससे न केवल पशुपालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी बल्कि हरियाणा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी और अधिक समृद्ध बनेगी।

Saturday, September 19, 2026

तात! अनुमति दे तो संन्यासिनी बनना चाहती हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

कोसल नरेश प्रसेनजित के राज्य का कोषाध्यक्ष सुदत्त की ख्याति बहुत दूर दूर तक थी। बौद्ध ग्रंथों में उन्हें अनाथपिंडक भी बताया गया है। उनकी पुत्री उत्पलवर्णा अत्यंत रूपवती थी। जब उसने षोडस वर्ष की आयु पार की, तो ऐसा लगने लगा कि देवी रति भी उसके रूप-सौंदर्य को देखकर शर्मिंदा हो जाएं। राग तो गौरवर्णी उत्पलवर्णा के अंग प्रत्यंग से मानो फूट रहा हो। 

अधरों पर मानो गुलाब की पंखुड़ियां आ बैठी हों। नयन रतनारे थे और ग्रीवा अत्यंत सुंदर थी। कंठ से इतनी मधुर ध्वनि निकलती थी कि सुनने वाला मोहित हो उठता था। ऐसी रूपवती कन्या से कौन विवाह नहीं करना चाहेगा। आसपास के राज्यों के राजकुमार, नगरश्रेष्ठि और सामंत कुमारों के विवाह प्रस्ताव आने लगे। अपनी अनुपम सुंदरी पुत्री के लिए ढेर सारे विवाह प्रस्ताव आने से पिता काफी चिंतित थे।

वह इस ऊहापोह में थे कि अपनी पुत्री के विवाह के लिए किसका प्रस्ताव स्वीकार करें और किसको मना कर दें। इसी विषय पर वह सोच ही रहे थे कि उनकी पुत्री ने उनके कक्ष में प्रवेश किया। उसने अपने पिता से कहा कि पिता जी, आपने सुना ही होगा। गंगातीर वासी ने पहले विवाह किया। फिर एक दूसरी स्त्री रख ली। उससे एक कन्या पैदा हुई। बाद में उस कन्या को भी अंकशयिनी बनाया। 

ऐसे अमर्यादित समाज में कोई भी विश्वसनीय नहीं है। यदि आप अनुमति दें, तो मैं अविवाहित रहकर समाज को सुधारने का प्रयत्न करना चाहती हूं। पिता ने आशीर्वाद देते हुए अपनी पुत्री को संन्यास लेने की अनुमति दे दी। महात्मा बुद्ध के पास जाकर उत्पलवर्णा ने प्रव्रज्या ग्रहण की। 

पिता तुल्य स्नेह दर्शाते हुए बुद्ध ने उसे ज्ञान से सिंचित किया। भिक्षुणी उत्पलवर्णा ने अपनी साधना से सिद्धावस्था प्राप्त की और समाज को धर्म के पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। महात्मा बुद्ध का वह जीवन भर सहयोग करती रही।

हरियाणा में पिटबुल के काटने की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक


अशोक मिश्र

हरियाणा में पिटबुल कुत्तों के हमलों की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। ताजा मामला सोनीपत के सिक्का कालोनी की है। 14 सितंबर की शाम बुआ अपने छह माह के भतीजे को गोद में लेकर सिक्का कालोनी की गली में टहल रही थी। तभी पड़ोसी का पालतू पिटबुल अचानक दौड़ता हुआ आया और बच्चे पर झपट पड़ा। सीसीटीवी फुटेज देखने पर साफ पता चलता है कि कुत्ता करीब आधा मिनट तक बच्चे को जबड़ों में दबाकर नोचता रहा, घसीटता रहा। लोगों ने डंडे-चप्पल मारकर बड़ी मुश्किल से बच्चे को छुड़ाया। 

हमले में बच्चे के चेहरे, पेट और शरीर पर गहरे जख्म हैं। बच्चे को गोद में लेकर टहलने वाली उसकी बुआ भी घायल हुई है। बच्चे की हालत गंभीर होने पर उसे रोहतक पीजीआई रेफर किया गया है और इलाज जारी है। प्रदेश की यह कोई पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएं अब अक्सर होती रहती हैं। पंचकूला, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, सोनीपत आदि शहरों से ऐसी खबरें लगातार आती रहती हैं। पिटबुल की उग्रता को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि देखनी होगी। पिटबुल टेरियर को मूल रूप से इंग्लैंड में सांडों से लड़ाई और बाद में डॉग फाइटिंग के लिए विकसित किया गया था।

चुन-चुन कर सबसे आक्रामक पिल्लों से पिटबुल ब्रीड तैयार की गई थी। इसलिए इसमें दर्द सहने की क्षमता, जिद्दी पकड़ स्वाभाविक रूप से कुत्तों की अन्य प्रजाति ज्यादा है। पशु चिकित्सकों के अनुसार एक बार पकड़ लेने के बाद पिटबुल अपने शिकार को आसानी से छोड़ते नहीं, इसलिए आधे मिनट का हमला भी जानलेवा बन जाता है। केंद्र सरकार के मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने 12 मार्च 2024 को 23 नस्लों जिसमें पिटबुल टेरियर, अमेरिकन बुलडॉग, रॉटविलर, कैन कोर्सो, डोगो अर्जेंटीनो सहित अन्य शामिल हैं को खतरनाक और उग्र माना था। केंद्र सरकार ने उनके आयात, बिक्री और ब्रीडिंग पर रोक का नोटिफिकेशन जारी किया था। 

लेकिन सरकार के इस नोटिफिकेशन के खिलाफ कुछ डॉग लवर्स ने कई राज्यों की हाईकोर्ट में याचिकाएं दीं। जवाब मांगे जाने पर केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया था कि वह फिलहाल इस बैन पर अमल नहीं हो रहा है। इस मामले में लोगों से आपत्तियां मंगाई गई हैं। नतीजा यह है कि 2026 तक देश में पिटबुल पर कोई लागू होने योग्य राष्ट्रव्यापी बैन नहीं है।  हरियाणा मेंं नगर निगमों ने अपने स्तर पर सख्ती की है। पंचकूला नगर निगम ने पिटबुल और रॉटविलर मिक्स जैसी नस्लों के पालने पर रोक का प्रस्ताव पास किया है। 

प्रस्ताव में कहा है कि इस प्रजाति का कुत्ता घर में मिला तो भारी जुर्माना लगेगा। चंडीगढ़ प्रशासन ने भी अमेरिकन पिटबुल, पिटबुल टेरियर, बुल टेरियर, कैन कोर्सो, डोगो अर्जेंटीनो और रॉटविलर समेत सात नस्लों को बैन किया है। बिना पंजीकरण कुत्ता पालने पर 10 हजार रुपये तक जुर्माना तय किया है। 

Friday, September 18, 2026

भगवन! मैं अपने पाप कर्म से ऊब चुकी हूं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

आम्रपाली वैशाली की नगर वधू थी। रूप और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति आम्रपाली के आगे पीछे वैभव डोलता रहता था। एक दिन सबने देखा कि साधारण वेश में आम्रपाली नंगे पांव महात्मा बुद्ध के आश्रम की ओर स्थिर कदमों में बढ़ती चली जा रही है। लोग आश्चर्य से भर उठे। आकंठ पाप कर्म में डूबी आम्रपाली बौद्ध संघ में क्या करने जा रही है, यह लोगों के बीच कौतूहल का विषय था। कुछ लोग उसके पीछे पीछे चल पड़े। 

वैशाली नगर में आम्रपाली का बौद्ध आश्रम की ओर जाना चर्चा का विषय बन गया। स्थिर कदमों से कई तरह की बातों को सोचती-विचारती आम्रपाली अंतत बौद्ध संघ तक पहुंच ही गई। भिक्षु संघ के प्रवेश द्वार पर आनंद किसी काम से निकल रहे थे। आम्रपाली ने जाकर उनसे विनती की, मैं महात्मा बुद्ध के दर्शन के लिए आई हूं। आनंद तत्काल उल्टे पैर लौट पड़े। उन्होंने भीतर जाकर महात्मा बुद्ध को संदेश दिया। 

तब तक आम्रपाली भी पीछे-पीछे चलकर महात्मा बुद्ध तक पहुंच चुकी थी। करुणा निधान तथागत यह सुनकर खड़े हो गए। उन्होंने मधुर किंतु स्नेहमयी वाणी में कहा, आओ देवि! बुद्ध के स्वर से झरती करुणा में आम्रपाली का गात भी गया। वह फफक कर रो पड़ी। उसने रुदन करते हुए कहा, भगवन! मैं अपने पाप कर्म  से ऊब चुकी हूं। क्या मेरा इस नरक से उद्धार होगा?  

महात्मा बुद्ध ने करुणायुक्त स्वर में कहा, न...न! जिसे तुम पाप जीवन कह रही हो, वह समाज की बनाई हुई व्यवस्था है। देवि! जाग्रत जन ही समाज को नई व्यवस्था देते हैं। और सचमुच तथागत ने उसे नई व्यवस्था का मार्ग सुझा दिया। उस दिन के बाद अपना सब कुछ छोड़कर आम्रपाली भिक्षुणी बनकर इतिहास में सदा के लिए अमर हो गई।