बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
एक बार किसी शिष्य ने महात्मा बुद्ध से पूछा कि भंते! जब भय पैदा होता है, तो वह सोचने विचारने की क्षमता क्यों हर लेता है? अपने शिष्य की बात सुनकर महात्मा बुद्ध ने उन्हें एक कथा सुनाई। वाराणसी में एक खरगोश रहता था। वह एक दिन अपनी घनी झाड़ियों में सो रहा था।कुछ देर पहले ही उसने भरपेट भोजन किया था। नींद में उसने सपना देखा कि वह किसी महल में सोया हुआ है। उस महल की छत टूटकर गिर गई है और वह मलबे में दबता जा रहा है। तभी संयोग से पास में ही लगे बेल के पेड़ से एक फल टूटकर गिरा। गिरने पर बड़ी जोर की आवाज हुई। उसने आकाश की ओर देखा। उसने सोचा कि आकाश फट पड़ा है। वह आत्मरक्षा के लिए भाग खड़ा हुआ।
रास्ते में उसे हिरनों का एक झुंड मिला। उसने भागने का कारण पूछा, तो भागते-भागते खरगोश ने कहा कि पीछे आकाश फट पड़ा है। मैं सुरक्षित स्थान पर शरण लेने जा रहा हूं। जान बचानी है, तो तुम भी भागो। हिरनों का झुंड भी भागने लगा। इस तरह रास्ते में भेड़, बकरी, गाय जैसे तमाम जानवर मिलते गए और बिना कोई कारण जाने सब भागने लगे। भागते-भागते वह पहाड़ी घाटी में पहुंच गए।
वहां एक शेर खड़ा हुआ था। उसने उन सबको रोका और पूछा कि तुम लोग भाग क्यों रहे हो? खरगोश ने कहा कि आकाश फट पड़ा है। शेर ने कहा कि ऊपर देखो, आकाश तो वहीं है। सारे जानवरों ने जब ऊपर देखा, तो विश्वास हुआ कि बादल नहीं फटा है। सब खरगोश को कोसते हुए लौट पड़े। यह कथा सुनाकर बुद्ध ने अपने शिष्य से कहा कि जब मन में भय पैदा होता है, तो सोचने-विचारने की शक्ति खत्म हो जाती है। ऐसा ही आध्यात्मिक जगत में भी होता है।
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