Tuesday, September 1, 2026

छोटी-छोटी जगहों पर पौधरोपण कर बढ़ाई जा सकती है हरियाली


अशोक मिश्र

फरीदाबाद में हरियाली बढ़ाने और शहरी वन क्षेत्र में वृद्धि करने के लिए डीएनडी-केएमपी (दिल्ली-नोएडा डायरेक्ट फ्लाईवे-कुंडली-मानेसर-पलवल) एक्सप्रेसवे लिंक रोड किनारे पौधे और झाड़ियां उगाई जाएगी, ताकि इन क्षेत्रों में हरियाली आ सके। दरअसल, हरित क्षेत्र बढ़ाने का प्रयास तो पूरे हरियाणा में हो रहा है। इसमें जहां सरकार अपनी ओर से प्रयास कर रही है, वहीं स्वयंसेवी संस्थाओं और स्कूल-कालेजों का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान है। राज्य सरकार वन महोत्सव, कैम्पा फंड, ग्रीन इंडिया मिशन, नगर वन योजना और एक पेड़ मां के नाम जैसी पहलों के जरिए करोड़ों पौधे लगाने का लक्ष्य रख रही है। 

हाल ही में एक करोड़ चालीस लाख पौधों का अभियान शुरू किया गया, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों, पंचायत भूमि, सड़कों और नहरों के किनारे रोपण शामिल है। मियावाकी वन और विरासत पेड़ों के संरक्षण जैसी नई पहलें भी हो रही हैं, ताकि शहरों और गांवों में हरियाली बढ़े। सरकारी प्रयासों से वनक्षेत्र बढ़ाने में सफलता सीमित रही है। दो हजार उन्नीस से दो हजार तेईस के बीच करीब एक हजार करोड़ रुपये केंद्रीय फंड मिलने के बावजूद वन आवरण में सिर्फ बारह वर्ग किमी का इजाफा हुआ। 

दस साल की अवधि में भी वृद्धि तीस वर्ग किमी के आसपास ही रही। घने वनों में कमी आई है जबकि खुले वन और स्क्रब लैंड थोड़े बढ़े हैं। कई जिलों में वन आवरण घटा है। पौधे लगाने के बावजूद उनकी जीवित रहने की दर कम रहना और भूमि की उपलब्धता सीमित होना प्रमुख बाधाएं हैं। हाल में सरकार ने रोपण के बाद रखरखाव पर ज्यादा जोर दिया है और बड़े-बड़े पांच हेक्टेयर के टुकड़ों में रोपण की नीति अपनाई है, ताकि निगरानी आसान हो। अरावली इलाके की स्थिति सबसे चिंताजनक है। 

दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में फैली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली ही रेगिस्तान को रोकने, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता को बचाने की दीवार है, पर अवैध खनन, फार्महाउसों के लिए जंगल कटाई और शहरीकरण ने इसे खोखला कर दिया है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक स्टडी के अनुसार 2001 से 2016 के बीच हरियाणा के अरावली क्षेत्र में वन आवरण में 37 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिसका सीधा संबंध खनन गतिविधियों से है।  

अरावली ग्रीन वॉल जैसी परियोजनाओं से सुधार की उम्मीद है। पहले से ही सड़कों, नहरों और रेलवे लाइनों के किनारे पट्टी वाले वन मौजूद हैं। इन जगहों पर और पौधे लगाकर हरे गलियारे बनाए जा सकते हैं, जो वायु प्रदूषण कम करने और तापमान नियंत्रित करने में मददगार साबित होंगे। शहरी क्षेत्रों में संस्थानों और खाली पड़े स्थानों पर भी रोपण संभव है। भूमि की कमी के कारण बड़े ब्लॉक बनाना मुश्किल है, लेकिन छोटी-छोटी जगहों का भी सही उपयोग किया जाए तो असर दिख सकता है।

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