बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
बुद्ध के जीवन की अनेक कथाएं बड़ी चमत्कारिक प्रतीत होती हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बुद्ध अनीश्वरवादी थे। यह बात सत्य भी हो सकती है और नहीं भी। बौद्ध साहित्य में भी बहुत सारी कथाएं बाद में जोड़ी-घटाई गई हैं, ऐसा माना जाता है। ऐसी स्थिति में बौद्ध साहित्य का गंभीर अध्येता ही बुद्ध के बारे में प्रचलित कहानियों का सत्य बता सकता है। कहते हैं कि एक बार कहीं पर वह प्रवचन कर रहे थे।परम प्रिय शिष्य और चचेरे भाई आनंद सहित सभी भिक्षुक प्रवचन का आनंद ले रहे थे। तभी एक घुमक्कड़ साधु वहां आया और उसने बुद्ध को प्रणाम करते हुए कहा कि भगवन! मैं एक साधारण साधु हूं। मेरे पास न बुद्धि है और न ही चातुर्य। मेरे पास न कोई शब्द संग्रह है और न ही किसी से कुशलता से बातचीत करने की कला है। मैं कोई प्रश्न या जिज्ञासा प्रकट कर पाने की भी स्थिति में नहीं हूं। यदि आप मुझे योग्य समझें, तो मेरे ग्रहण करने योग्य कुछ बातें बता दें, ताकि मेरा भी जीवन सफल हो जाए।
यह सुनकर गौतम बुद्ध थोड़ी देर के लिए मुस्कुराए और फिर मौन साध लिया। उधर साधु भी अपनी बात कहकर चुप हो गया। काफी देर तक दोनों मौन रहे। अचानक उसकी आंखों से अश्रु बहने लगे। काफी देर बाद घुमक्कड़ साधु उठा और उसने प्रणाम करते हुए कहा, भगवन! आपने मुझे जो शिक्षा दी, उससे मैं धन्य हो गया।
इतना कहकर वह नाचता गाता साधु चला गया। वहां मौजूद लोग चकित रह गए। आखिरकार, आनंद ने पूछ ही लिया कि आप कुछ बोले भी नहीं और वह संतुष्ट होकर चला गया। बुद्ध ने कहा कि घोड़े कई प्रकार के होते हैं। एक चाबुक से एक वार करने से चल पड़ते हैं। दूसरे घोड़े को बीच-बीच में पीटते रहना पड़ता है।
तीसरे प्रकार के घोड़े को लगातार पीटना ही पड़ता है, तभी वह चलते हैं। चौथे प्रकार के घोड़े के लिए चाबुक की छाया ही काफी है। यह साधु भी चौथे प्रकार साधु था।


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