बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा सारिपुत्र या सारिपुत्त गौतम बुद्ध के दो सबसे प्रमुख और ज्ञान में अग्रगण्य शिष्यों में से एक थे। उन्हें बौद्ध परंपरा में 'धम्म-सेनापति' की उपाधि प्राप्त थी। प्राचीन भारत के मगध राज्य (वर्तमान बिहार में नालंदा के पास) में लगभग छठी या पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ था। उनका वास्तविक नाम उपतिस्स था। उन्हें सारिपुत्र इसलिए कहा जाता था क्योंकि उनकी माता का नाम शारी या रूपसारी था।उनके परम मित्र महामौदगल्यायन (मोग्गल्लान) थे, जो बुद्ध के दूसरे प्रमुख पुरुष शिष्य बने। कहा जाता है कि पहले वे दोनों संजय नामक एक संन्यासी के अनुयायी थे। बाद में बुद्ध के शिष्य 'अस्जित' के उपदेश से प्रभावित होकर ये दोनों गौतम बुद्ध के संघ में शामिल हो गए थे। महात्मा सारिपुत्र का परिनिर्वाण (देहावसान) गौतम बुद्ध से कुछ समय पहले ही हो गया था।
उनकी अस्थियाँ सांची स्तूप में सुरक्षित रखी गई हैं। एक बार की बात है। सारिपुत्र कहीं जा रहे थे। उनके पीछे एक ब्राह्मण चला आ रहा था। उस ब्राह्मण ने सारिपुत्र की पीठ पर बहुत जोर का मुक्का मारा। सारिपुत्र ने पीछे नहीं देखा। वह आगे चलते रहे। उनके इस व्यवहार पर वह ब्राह्मण बहुत पछताया। उसने उनसे क्षमा मांगी। सारिपुत्र ने उससे पूछा कि आप मुझसे किस बात की क्षमा मांग रहे हैं।
ब्राह्मण ने कहा कि मैंने आपको मुक्का मारा है। सारिपुत्र बोले कि इससे मेरा कुछ तो बिगड़ा नहीं, तो फिर किस बात की क्षमा मांग रहे हो। ब्राह्मण ने कहा कि यह आपकी महानता है, लेकिन मुझे संतोष तब मिलेगा, जब आप मुझे क्षमा कर देंगे। सारिपुत्र ने कहा कि मैंने आपको क्षमा कर दिया। ब्राह्मण ने कहा कि मुझे संतोष तब मिलेगा, जब आप मेरे घर चलेंगे। सारिपुत्र ने कहा कि यदि तुम्हें इससे ही संतोष मिलता है, तो ऐसा ही सही। सारिपुत्र उस ब्राह्मण के घर गए। उसने उनका खूब सत्कार किया।


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