बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
ऐसा कहा जाता है कि जिस कालखंड में महात्मा बुद्ध पैदा हुए थे, उन दिनों जाति, गोत्र और वर्ण व्यवस्था काफी रूढ़ थी। उच्च वर्ण और गोत्र वाले व्यक्तियों का अभिमान आकाश छू रहा था। वह अपने से नीचे वर्ण वाले लोगों को हेय समझते थे। बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद तथागत ने लोगों को सबसे पहले जाति, वर्ण और गोत्र के अहंकार से मुक्त करने का प्रयास किया।उन्होंने नियम बनाया कि जो भी व्यक्ति संघ में शामिल होगा, भिक्षुक बनेगा उसे अपना नाम बदलना पड़ेगा। नाम भी संघ के अधिकारी निर्धारित करेंगे। एक दिन की बात है। आश्रम में कुछ शिष्य बैठे हुए आपस में चर्चा कर रहे थे। उनकी चर्चा का विषय गोत्र, वर्ण आदि ही थे। एक शिष्य ने कहा कि संघ में आते समय यह शरीर तो पहले वाला ही रहता है, तो फिर वर्ण, गोत्र और जाति कैसे छूट जाएगा।
कहते हैं कि धीरे-धीरे यह बात बुद्ध के कानों तक पहुंची। उन्होंने अपने सभी शिष्यों को धर्म सभा में बुलाया। उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा कि आप लोगों ने सांप को देखा है? सभी शिष्यों ने हां में जवाब दिया। तब महात्मा बुद्ध ने फिर पूछा, आप लोगों ने सांप को केंचुल छोड़ते हुए देखा है? ज्यादातर शिष्यों ने सकारात्मक जवाब दिया। बुद्ध ने पूछा कि जब सांप केंचुल छोड़ता है तो वह कैसा हो जाता है?
एक शिष्य ने कहा कि सांप अंधा हो जाता है। जब उसका केंचुल छूट जाता है, तो वह फिर देखने लगता है। तब बुद्ध ने कहा कि जाति, वर्ण और गोत्र इंसान के केंचुल हैं। जब तक यह उसके साथ रहते हैं, इंसान अभिमान में अंधा बना रहता है। यह सब छूट जाने पर वह नई दृष्टि पाता है। ऐसी स्थिति में संघ में रहने वाले सभी समान हो जाते हैं। उनमें किसी प्रकार का अभिमान नहीं रह जाता है।
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