Thursday, October 29, 2026

तूफान अर्नब ने मचाई तबाही, तटीय जैव विविधता को पहुंची भारी क्षति

अशोक मिश्र

बंगाल की खाड़ी से उठे अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान अर्नब ने बुधवार सुबह आंध्र प्रदेश के तट पर बापटला और विशाखापत्तनम के बीच यानम के दक्षिण-पश्चिम में दस्तक दी है। इससे आंध्र प्रदेश के तटीय जिलों जैसे काकीनाडा, कोनसीमा, पश्चिम गोदावरी, विशाखापत्तनम, अनकापल्ली, विजयनगरम और श्रीकाकुलम में भारी तबाही मची। सैकड़ों पेड़ उखड़ गए, बिजली के खंभे गिरे, सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, संचार व्यवस्था बाधित हुई और कई जगह बिजली आपूर्ति ठप हो गई। तूफान अर्नब में तीन लोगों की मौत हुई, एक पेड़ गिरने और दो करंट लगने से, जबकि 764 गांव प्रभावित हुए हैं।

लगभग 57 हजार लोगों को आंध्र प्रदेश में और कुल मिलाकर 87 हजार से अधिक को ओडिशा सहित राहत शिविरों में पहुंचाया गया है। तेज हवाओं ने सैकड़ों पेड़ उखाड़ दिए। बिजली के खंभे गिरा दिए। सड़कें क्षतिग्रस्त कीं और बिजली तथा संचार व्यवस्था बाधित कर दी जिससे तटीय जिलों जैसे काकीनाडा कोनसीमा विशाखापत्तनम अनकापल्ली विजयनगरम और श्रीकाकुलम में जनजीवन ठप हो गया। इस तूफान का पर्यावरण पर पहला और सबसे प्रत्यक्ष असर तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर दिखता है। काकीनाडा के पास उप्पाडा तटीय सड़क का समुद्री लहरों और तटीय कटाव के कारण बह जाना सिर्फ एक सड़क का टूटना नहीं है। यह बताता है कि कैसे तेज हवाओं के साथ उठी तीन से चार मीटर ऊंची तूफानी लहरों ने समुद्र तल को कई मीटर अंदर तक धकेल दिया है। विशाखापत्तनम, विजयनगरम, अनाकापल्ली और श्रीकाकुलम जैसे जिलों में सैकड़ों पेड़ उखड़ गए हैं। 

इसमें मैंग्रोव के पैच और कैसुरीना के रोपण भी शामिल हैं जो प्राकृतिक रूप से समुद्र के प्रहार को रोकते हैं। इन पेड़ों के गिरने से पक्षियों के घोसले, छोटे स्तनधारियों के आवास और तटीय जैव विविधता को तत्काल क्षति पहुंची है। लंबे समय में हवा के अवरोध के कमजोर होने से अगले मानसून या तूफान में कटाव और तेज होगा। कई जगहों पर 200 मिलीमीटर से अधिक भारी वर्षा ने नदियों में अचानक बाढ़ ला दी है जिससे मीठे पानी के तालाबों, खेतों और भूजल में खारे पानी का प्रवेश हुआ है। इससे आंध्र की उपजाऊ डेल्टा जमीन, विशेषकर गोदावरी-कृष्णा बेसिन में, लवणता बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है जो अगले एक-दो फसली चक्र तक पैदावार को प्रभावित कर सकता है। साथ ही जलभराव से रुके हुए पानी में कचरा, प्लास्टिक और कृषि रसायन घुल कर लैगून और एश्चुरी में पहुंच रहे हैं, जिससे मत्स्य प्रजनन क्षेत्रों में आॅक्सीजन की कमी और यूट्रोफिकेशन का खतरा बनता है। 

दूसरी ओर, अस्थायी रूप से देखें तो इस तरह के चक्रवात बंगाल की खाड़ी के गर्म पानी को ठंडा करते हैं, वायुमंडल की अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकालते हैं और सूखे पड़े आंतरिक इलाकों में जलाशयों को भर देते हैं, लेकिन यह लाभ तब अर्थहीन हो जाता है जब बाढ़ का पानी इतनी तेजी से आता है कि जमीन उसे सोख ही नहीं पाती। पर्यावरणीय दृष्टि से पेड़ों के उखड़ने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र क्षतिग्रस्त हुआ है जबकि बाढ़ के पानी से मिट्टी का कटाव और जल प्रदूषण का खतरा बढ़ा है। सकारात्मक पक्ष यह है कि समय पर चेतावनी निकासी तथा एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की तैनाती के कारण बड़े पैमाने पर जनहानि नहीं हुई। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने केंद्रीय मदद मांगकर पुनर्वास की प्रक्रिया तेज कर दी है।

कुल मिलाकर यह तूफान भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों की आपदा प्रबंधन क्षमताओं को परखता है तथा जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच तटीय राज्यों की अर्थव्यवस्था कृषि और सामाजिक व्यवस्था पर दीर्घकालिक दबाव डालने की क्षमता रखता है हालांकि तत्काल राहत कार्यों से सामान्य स्थिति बहाल होने की उम्मीद है। आर्थिकी पर इसका असर बहुस्तरीय है। सबसे पहले कृषि और मत्स्य पालन पर दिखता है। उत्तरी आंध्र में इस समय धान की कटाई से ठीक पहले की फसल खड़ी थी, मिर्च, मूंगफली और नारियल के बागान भी तैयार अवस्था में थे। तेज हवा और जलभराव से खड़ी फसल गिर गई है, अनाज में नमी बढ़ गई है और भंडारण में रखे बीज सड़ने लगे हैं, जिससे छोटे किसानों को दोहरी मार पड़ी है, एक तो तत्काल उपज का नुकसान और दूसरा अगले सीजन के लिए कर्ज का बोझ। 

31 मकानों के क्षतिग्रस्त होने का सरकारी आंकड़ा शुरूआती है, जमीनी स्तर पर कच्चे घरों, पोल्ट्री शेड और कोल्ड स्टोरेज को हुए नुकसान को जोड़ें तो आजीविका का नुकसान करोड़ों में पहुंचता है। समुद्र में मछली पकड़ने पर लगी रोक, नावों के टूटने और जेटियों के क्षतिग्रस्त होने से मछुआरा समुदाय, जो पहले ही मानसून के कारण कम दिनों तक समुद्र में जा पाता है, अब कम से कम 15 से 20 दिनों तक बेरोजगार रहेगा। ओडिशा में भी भारी बारिश और तेज हवाओं का असर पड़ा, जहां हजारों लोगों को निकाला गया तथा दक्षिणी जिलों में स्कूल बंद रखे गए। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी में भी अलर्ट जारी रहे तथा कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश की आशंका बनी रही। आर्थिक प्रभाव मुख्य रूप से कृषि, बुनियादी ढांचे और मत्स्य उद्योग पर पड़े। 

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