Friday, October 16, 2026

यह विश्वास हो गया, मैं भी बुद्ध हो सकता हूं

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

यह सच है कि महात्मा बुद्ध ने कोई नया धर्म नहीं चलाया था। बौद्ध धर्म नाम तो उनके परिनिर्वाण के बहुत बाद दिया गया। उन्होंने दुख से बाहर निकलने का रास्ता बताया था। उनके सारे उपदेश अपने अनुभव पर ही आधारित रहे हैं। उन्होंने जीवन के चार सत्य बताए थे। बुद्ध ने कहा कि जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, प्रिय से बिछोह, अप्रिय का मिलना, जीवन में दु:ख है। दु:ख का कारण है तृष्णा और चाहिए और चाहिए की कभी न खत्म होने वाली प्यास। तृष्णा को खत्म किया जा सकता है, तो दु:ख भी खत्म हो सकता है। 

इसी अवस्था को निर्वाण कहते हैं। उस तक पहुँचने का एक स्पष्ट मार्ग है। इन बातों को ही मुख्य आधार बनाकर महात्मा बुद्ध लोगों को उपदेश के माध्यम से परिचित कराते रहे। एक बार की बात है। वह लगभग दस हजार लोगों की भीड़ को उपदेश दे रहे थे।  एक युवक आया। उसने तथागत को देखा, उनके सामने झुका और उन्हें प्रणाम किया। बुद्ध ने पूछा, किस लिए आए हो? युवक ने कहा कि जिस लिए आया था, वह इच्छा पूर्ण हुई। 


अब न कुछ पूछना है, न कुछ जानना है। बुद्ध ने कहा कि क्या पूर्ण हुआ, क्या घट गया। यह और को भी बता दो। उस समय सत्संग में हजारों लोग मौजूद थे। किसी ने भी कुछ घटते या होते नहीं देखा था। युवक ने कहा कि मैं अपने को बदलने आया था। अब मैं बदल गया हूं। 

मुझ में यह विश्वास पैदा हो गया है कि मैं भी बुद्ध हो सकता हूं। जो बुद्ध आज हैं, वह कल मैं हो सकता हूं। मुझ में एक नई श्रद्धा ने जन्म ले लिया है। मैं इसी नई आशा की तलाश में यहां आया था। इसी भरोसे से मैं चरणों में झुका था। जब खड़ा हुआ, तो मैं बदल गया। अब मैं एक विश्वास के साथ वापस जा रहा हूं।

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