बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
महात्मा बुद्ध के अनेक शिष्यों में वक्कुल का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। जहां सारिपुत्र उपदेश देने में प्रवीण थे, वहीं वक्कुल को यह कला नहीं आती थी। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध की शरण में आने के सात दिन बाद ही इन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया था। आठवें दिन इन्हें शुद्ध अर्हत्व ज्ञान प्राप्त हुआ था। वक्कुल स्थविर के एक मित्र थे अचेल काश्यप जो सदैव नग्न रहते थे। अस्सी वर्ष की आयु में राजगृह में दोनों की मुलाकात हुई। अचेल काश्यप ने स्थविर वक्कुल से वार्तालाप शुरू किया। अचेल ने वक्कुल से पूछा, तुम्हें संन्यासी हुए कितने वर्ष बीत गए हैं, मित्र वक्कुल।वक्कुल ने सहजता से जवाब दिया, अस्सी साल, मित्र। तब अचेल ने पूछा कि इन अस्सी वर्षों में आपने कितनी बार मैथुन किया है? वक्कुल ने जवाब दिया, एक बार भी नहीं। मेरे मन में पिछले अस्सी साल में एक बार भी काम वासना का विचार तक नहीं आया। सच बताऊं। पिछले अस्सी साल में एक बार भी मेरे चित्त में किसी के प्रति द्वेष की भावना तक पैदा नहीं हुई। मैं यह भी नहीं जानता कि लोगों के मन में हिंसा संबंधी विचार कैसे पैदा होते हैं। गृहस्थों के समान मैं वस्त्र पहनना नहीं जानता हूं।
विहारों में जिस तरह भिक्षु वस्त्र पहनते हैं, वैसा ही मैं भी पहन लेता हूं। सुई से सिए वस्त्र कैसे होते हैं, मैं नहीं जानता हूं। गृहस्थों के घर में किस तरह बैठा जाता है, यह भी मुझे नहीं आता है। पिछले अस्सी साल में मैं बीमार कब पड़ा था, यह भी मुझे याद नहीं है। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध के सभी शिष्यों में सबसे स्वस्थ स्थविर वक्कुल ही थे। उन्होंने समाज की सभी तरह की सुख-सुविधाओं को त्याग रखा था। शायद यही वजह है कि बौद्ध ग्रंथों में उनकी आयु 160 वर्ष बताई गई है।


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