बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
गौतम बुद्ध का अंतिम समय जानकर आनंद बहुत दुखी था। आनंद महात्मा बुद्ध का सबसे प्रिय शिष्य और चचेरा भाई भी था। कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध और आनंद का जन्म एक ही दिन और एक ही वर्ष में एक ही कुल में हुआ था। दोनों सम वयस्क थे। जब सिद्धार्थ ने गृहत्याग किया था, तब उनकी आयु 29 वर्ष की थी। गृह त्याग के बाद छह साल लगे थे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त करने में। चचेरे भाई आनंद ने 37 साल की अवस्था में बुद्ध से परिव्रज्या धारण की थी।इसका अर्थ यह निकलता है कि जब गौतम बुद्ध की मृत्यु हुई थी, तब आनंद भी अस्सी साल के हो चुके थे। आनंद बहुत दुखी मन से बुद्ध के पास आए और बोले, आपके जाने के बाद मैं किससे ज्ञान प्राप्त करूंगा? कौन मुझे आगे का रास्ता दिखाएगा। आनंद की बात सुनकर बुद्ध के चेहरे पर क्षीण मुस्कान उभर आई। वह स्नेह सिक्त स्वर में बोले, चालीस साल से तू मेरे साथ है। अब तक तुझे ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, तो चालीस जन्मों में भी तुझे क्या समझ में आएगा।
आनंद! पागल मत बनो। मुझसे पहले न जाने कितने बुद्ध आए। आगे भी अनेक बुद्ध आएंगे। सब अपना अपना काम करेंगे और इस दुनिया से चले जाएंगे। कोई स्थायी तो रहेगा नहीं। आनंद हो सकता है कि तू मेरी वजह से अब तक ज्ञान नहीं प्राप्त कर सका है।
मेरे होने से तेरे सीखने की क्षमता क्षीण हो गई हो। नया गुरु मिलेगा, तो तू आसानी से सीख सकता है। गुरु का मिलना ही पर्याप्त नहीं है, बदलना जरूरी है। तू अपने को बदल। हो सकता है कि तू बुद्धत्व प्राप्त कर ले। इतना कहकर तथागत ने अंतिम सांस ली। बुद्ध के जाने के बाद आनंद ने परम ज्ञान प्राप्त किया। महात्मा बुद्ध का कथन सत्य साबित हुआ।


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