बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
बौद्ध साहित्य में बुद्ध और बोधिसत्व से संबंधित तमाम कथाएं भरी पड़ी हैं। बोधिसत्व महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं बताई गई हैं। यह कथाएं जीवन में शुचिता, दया, कर्तव्यबोध और अहिंसा जैसे गुणों की पात्रों के माध्यम से व्याख्या करती हैं। इन्हीं बौद्ध साहित्य में शौर पुच्छ बनिक की एक कथा भी कही गई है। कथा के मुताबिक शौर पुच्छ एक बहुत ही धनवान व्यापारी था।वह अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था। वह गौतम बुद्ध का एक अनन्य भक्त था। वह संघ के लिए बहुत कुछ करना चाहता था। एक बार की बात है। गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए धर्मचर्चा कर रहे थे। तभी वहां पर शौर पुच्छ वहां पर आया और उसने बड़ी विनम्रता से कहा कि मेरे पास एक लाख स्वर्ण मुद्राएं हैं। मैं इन स्वर्ण मुद्राओं को संघ को देना चाहता हूं ताकि लोगों के लिए भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था किया जा सके। यह सुनकर बुद्ध चुपचाप वहां से उठे और विश्राम करने चले गए।
वहां पर बैठा शौर पुच्छ काफी देर तक सोचता रहा कि उससे क्या गलती हुई जो बुद्ध बिना कुछ कहे सुने उठकर चले गए। एक दिन संयोग से उसकी मुलाकात फिर हुई। शौर पुच्छ ने तथागत से कहा कि मेरे पास कुछ स्वर्ण आभूषण हैं। यह मैं संघ को देना चाहता हूं। इस बार भी बुद्ध चुप रहे। कुछ दिनों बाद वैशाली में एक विशाल धर्म सभा का आयोजन किया गया। हजारों लोग जमा हुए थे।
सभी लोग किसी ने किसी काम में लगे हुए थे। शौर पुच्छ वहां पहुंचा और बिना किसी से कुछ पूछे वह काम में लग गया। धर्मसभा खत्म हुई। लोग चले गए। शौर पुच्छ बेसुध काम करता रहा। आधी रात को बुद्ध उसके पास पहुंचे और कहा, वत्स! तुमने प्रसाद ग्रहण किया? शौर पुच्छ का गला रुंध गया। उसने बुद्ध को साष्टांग प्रणाम किया। बुद्ध ने कहा कि आत्म कल्याण के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती है। इसके लिए बस निष्ठा की जरूरत होती है। शौर पुच्छ को आत्मकल्याण का मार्ग मिल चुका था।


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