Monday, October 19, 2026

किसी से सहायता की अपेक्षा मत करना

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

गौतम बुद्ध ने जब यह समझ लिया कि अब उनकी मृत्यु निकट ही है, तब उन्होंने अपने शिष्यों को अंतिम उपदेश देने की बात सोची। वैसे भी अस्सी साल की आयु में शरीर काफी क्षीण हो चुका था। सूकर मद्दव को ग्रहण करने से पेट दर्द, पेचिस और रक्तस्राव हो रहा था। ऐसी स्थिति में कोई भी सामान्य इंसान होता तो भी वह भावी आशंका की कल्पना कर सकता था। सारे शिष्य बुद्ध का अंतिम संदेश को सुनने के लिए सतर्क हो गए। 

पहले उन्होंने गृहस्थों को उपदेश दिया। उन्होंने क्षीण आवाज में कहा कि आप लोग हमेशा धर्म का मार्ग पकड़े रहना। धर्म मर्यादा में रहना सिखाता है। धर्म अनुशासन सिखाता है। जैसे कोई बिना तट की सरिता उच्छृंखल हो जाती है। वह अपना और सबका विनाश करती है, वैसे ही बिना धर्म की मर्यादा में बंधे वह अपना और दूसरों का नुकसान करता है। 

गृहस्थ शिष्यों अपने ऊपर विश्वास करो। किसी दूसरे की सहायता की अपेक्षा मत करो। अपने ऊपर विश्वास करने से तुम्हारे हृदय में ज्ञान का प्रस्फुटन होगा। तुम अपना दीपक खुद बनो। तुम्हें किसी के आदेश-निर्देश की आवश्यकता नहीं होगी। अप्प दीपो भव। कोई अवतार नहीं आएगा, तुम्हें सत्मार्ग की शिक्षा देने। तुम्हें अपना रास्ता खुद ही खोजना होगा। 

इसके बाद उन्होंने विरक्तों से कहा कि तुम एक साथ दो से ज्यादा कभी साथ मत रहना। तीन दिन से ज्यादा एक स्थान पर कभी मत ठहरना। सच्चे साधु का जीवन आजीवन पर्यटन के लिए बना है। जो अच्छी बातें हैं, वह बांटते चले। लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना ही तुम्हारा कर्म है। अपने कर्म से विचलित मत होना। इसके बाद महात्मा बुद्ध ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद ली।

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