Saturday, October 17, 2026

देव कन्या बोली, आप गंध चोर हैं


बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र

महात्मा बुद्ध ने हमेशा यही प्रयास किया कि उनके किसी आचरण या व्यवहार से किसी को परेशानी न हो। वह आदर्श व्यवहार करके समाज के सामने एक उदाहरण पेश करें। इसके बावजूद कई बार उनसे भी चूक हो ही जाया करते थे। जब कोई उन्हें उस चूक के बारे में बताता या ध्यान दिलाता था, तो वह उसके प्रति आभारी हो जाया करते थे। एक बार की बात है। वह एक कमल सरोवर के किनारे बैठे हुए ध्यान कर रहे थे। 

कमल सरोवर से होकर आने वाली हवा ठंडी और सुगंधित थी। कमल पुष्प की सुगंध हवा के साथ होकर उन तक आती थी।वह उस समय अत्यंत प्रसन्न और भाव विभोर होकर ध्यान लगा रहे थे। उसी समय कमल सरोवर के पास देव कन्या आई। उसने गौतम बुद्ध से कहा कि आपने कमल का गंध ग्रहण करने के लिए तालाब के स्वामी से इजाजत नहीं ली थी। ऐसी स्थिति में आप सुगंध ग्रहण करके गंध चोरी कर रहे हैं। आप गंध चोर हैं। 

महात्मा बुद्ध कुछ कहते कि उसी समय एक ग्रामीण बाला आई और उसने तालाब में घुसकर कमल पुष्पों को तोड़ने लगी। उसने सरोवर को भी गंदा कर दिया। तब बुद्ध ने कहा कि उस ग्रामीण बाला ने पूरे तालाब को गंदा कर दिया। पुष्पों को भी क्षत-विक्षत कर दिया। फिर भी आप चुपचाप खड़ी हैं। और मुझे गंध चोर कह रही हैं। 

उस देव कन्या ने कहा, आप समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आप धर्म के ज्ञानी हैं, आप नीति के ज्ञाता है। वह लड़की तो अबोध है। अशिक्षित है, उसे ज्ञान नहीं है। इसलिए उसका अपराध क्षम्य है। लेकिन आप नीतिवान होने के बावजूद ऐसा करें, तो वह क्षम्य नहीं है। यह सुनकर बुद्ध का सिर लज्जा से झुक गया। उन्होंने देव कन्या से क्षमा मांगी और भविष्य में ऐसी गलती न करने का वचन दिया।

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