Saturday, October 24, 2026

हरियाणा में बिजली कर्मियों की हड़ताल से नागरिक हुए बेहाल

अशोक मिश्र

गुरुग्राम-नूंह में निजी कंपनी को बिजली सप्लाई का लाइसेंस देने के विरोध में बिजलीकर्मियों की हड़ताल से लोगों की परेशानी बढ़ गई है। हड़ताल के पहले दिन 15 जिलों गुरुग्राम, हिसार, हांसी, कुरुक्षेत्र, महेंद्रगढ़, झज्जर, फरीदाबाद, पानीपत, पंचकूला, रोहतक, जींद, कैथल, करनाल, यमुनानगर और अंबाला में देखने को मिला। जिन इलाकों में फॉल्ट आया, उन्हें बिजली कर्मचारी ठीक करने नहीं पहुंचे। करनाल और फरीदाबाद में परेशान लोगों ने जाम लगा दिया है। हड़ताल का सीधा कारण हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग का 19 अक्टूबर 2026 का वह फैसला है जिसमें निजी कंपनी इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को गुरुग्राम और नूंह जिलों में बिजली वितरण के लिए 25 साल का समानांतर यानी पैरलल लाइसेंस दिया गया है। 

हड़ताली कर्मचारियों का तर्क है कि गुरुग्राम दोनों सरकारी डिस्कॉम के लिए सबसे ज्यादा कमाई वाला इलाका है। अगर वहां निजी कंपनी आकर मुनाफे वाले इंडस्ट्रियल और कॉमर्शियल उपभोक्ताओं को ले जाएगी तो सरकारी निगमों की कमाई काफी हद तक घट जाएगी। फिर गांव, खेत और गरीब उपभोक्ता को सब्सिडी पर बिजली देना मुश्किल हो जाएगा।  बिजली जैसा सेक्टर सीधे निजीकरण नहीं बल्कि धीरे-धीरे कमजोर करने से निजीकरण की तरफ जाता है, जहां पहले समानांतर लाइसेंस, फिर फ्रेंचाइजी और फिर पूरे निगम को निजी हाथ में देने का रास्ता खुलता है और इससे नियमित भर्तियां रुकती हैं। 

आउटसोर्स कर्मचारियों का भविष्य असुरक्षित होता है। वहीं बिजली कर्मचारियों की हड़ताल से परेशान लोगों का कहना है कि बिजली अति आवश्यक सेवा है। इसके बंद होने से अस्पताल, पानी की सप्लाई, स्कूल, छोटे उद्योग और रोजमर्रा की जिंदगी सीधे रुक जाती है। कुरुक्षेत्र, सिरसा, दादरी और भिवानी में पहले दिन ही फीडर बंद और ब्लैकआउट की खबरें इसी का उदाहरण हैं। 

त्योहारी सीजन में इसका असर आम आदमी पर ज्यादा पड़ता है। वैसे भी समानांतर लाइसेंस देना कोई अवैध निजीकरण नहीं है, बल्कि बिजली अधिनियम 2003 की धारा 14 में ही इसका प्रावधान है और अगर आयोग के फैसले से आपत्ति है तो अपीलीय ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी या अदालत में चुनौती दी जा सकती है, हड़ताल से फैसला नहीं बदलेगा। वहीं, सरकार का कहना है कि गुरुग्राम जैसे तेजी से बढ़ते जिले में जहां डेटा सेंटर और बड़ी सोसायटियां हैं, वहां मौजूदा ढांचा अकेले लोड नहीं संभाल पा रहा है। 

निजी निवेश से नई केबल, नए सब-स्टेशन और स्मार्ट सिस्टम आएंगे तो उपभोक्ता को ही फायदा होगा, क्योंकि सरकारी कंपनी भी वहीं रहेगी और उपभोक्ता के पास चुनने का विकल्प होगा। कुल मिलाकर यह टकराव दो अलग-अलग दृष्टिकोणों का है, एक जो बिजली को सार्वजनिक संपत्ति और रोजगार की सुरक्षा के नजरिए से देखता है। दूसरा जो इसे प्रतिस्पर्धा, निवेश और उपभोक्ता विकल्प के नजरिए से देखता है।


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